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अफगानिस्तान को गृहयुद्ध से बचाना चाहता है तालिबान तो इन नेताओं से करनी होगी बात

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन में तालिबान नेता.

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन में तालिबान नेता.

तालिबान की सेना ने अफगानिस्तान पर बहुत तेजी से और निर्णायक स्तर पर कब्जा किया. अब बगैर गृहयुद्ध के दूसरी सरकार बनाना उनके लिए काफी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. तालिबान को अहसास है कि स्थिर सरकार बनाने के लिए प्रभावशाली सिपहसालारों और नस्ली समुदाओं के प्रतिनिधियों और हजारा को मिलाकर रखने की ज़रूरत होगी, नहीं तो 1990 की तरह फिर से आंतरिक कलह होने का खतरा बना रहेगा.

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    काबुल. तालिबान (Taliban) की सेना ने अफगानिस्तान (Afghanistan) पर बहुत तेजी से और निर्णायक स्तर पर कब्जा किया. अब बगैर गृहयुद्ध के दूसरी सरकार बनाना उनके लिए काफी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है.  अमेरिकी हमले के बाद बने पहले राष्ट्रपति हामिद करजई और नेता अशरफ गनी जो इस महीने की शुरुआत में देश छोड़ कर भाग गए. उनके बाद अब्दुल्ला अब्दुल्ला जो बेदखल प्रशासन में नंबर 2 की हैसियत रखते हैं, उनके साथ काबुल में बैठक कर रहा है. तालिबान के सद्स्यों में ज्यादातर पश्तून आबादी से हैं जिनका देश के दक्षिणी हिस्से में अच्छा खासा प्रभाव है. इस सभी के बावजूद तालिबान को अहसास है कि स्थिर सरकार बनाने के लिए प्रभावशाली सिपहसालारों और नस्ली समुदाओं के प्रतिनिधियों और हजारा को मिलाकर रखने की ज़रूरत होगी, नहीं तो 1990 की तरह फिर से आंतरिक कलह होने का खतरा बना रहेगा.  ये वो कुछ नेता हैं जिनके साथ तालिबान हाथ मिलाना चाहेगा-

    गुलबुद्दीन हिकमतयार, पूर्व प्रधानमंत्री, 72
    अफगानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और कभी अफगान राजनीति के ताकतवर दल हिज्ब-ए-इस्लामी के नेता रह चुके हैं. पहले मुजाहिदीन योद्धा थे जिन्हें 1980 में शीत युद्ध के दौरान रुस से लड़ने के लिए अमेरिका ने प्रशिक्षित किया था. हिकमतयार पिछले 25 सालों से तालिबान का सहयोगी और दुश्मन दोनों रहा है. उसे अमेरिका ने विशेष वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है. अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान आने के बाद उसने आत्मघाती हमले करवाए और उसके अल कायदा के के साथ करीबी संबंध थे. हाल ही में उसने अफगानिस्तान में अगली सरकार के लिए बातचीत और चुनाव का समर्थन किया था, वो फिलहाल लगातार तालिबानी नेताओं के संपर्क में है. हिकमतयार का पाकिस्तान गुप्तचर संस्थाओं के साथ गहरा नाता उसकी भूमिका को और भी अहम बना देता है.

    हामिद करजई, पूर्व राष्ट्रपति, 63
    हामिद करजई फिलहाल उन्हीं लोगों के साथ बातचीत में लगे हुए हैं जो कभी उनके खून के प्यासे थे. अफगानिस्तान का तेजी से पतन, तालिबान का काबुल पर कब्जा और गनि का देश छोड़ कर भागना. ये सब कुछ पूरी दुनिया ने देखा, ऐसे में करजई ने एक छोटे से वीडियो के ज़रिए संदेश दिया कि वो संकल्प लेते हैं कि वह देश छोड़ कर नहीं जाने वाले हैं. उनके इस संदेश से काबुल में चल रही उथल पुथल पर हल्का सा असर भी पड़ा, ये संदेश इसलिए भी प्रभावशाली था क्योंकि वो अपनी छोटी बेटी के साथ मौजूद थे. भारत में पढ़ाई कर चुके करजई ने अपने राष्ट्रपति काल में सुरक्षा करार पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था कि अमेरिकी सेना 2014 के आगे भी वहां रहेगी.

    अब्दुल्ला अब्दुल्ला, पूर्व सीईओ, 60
    डॉक्टर से राजनेता बने अब्दुल्ला अब्दुल्ला, अहमद शाह मसूद के सलाहकार रह चुके हैं. ये वो नेता है जो रूस और तालिबान से लड़े हैं. अब अब्दुल्ला एक नस्ली ताजिक हैं. जो तालिबान को शांति से सत्ता सौंपने की बातचीत में शामिल है. अफगानिस्तान में शांति वार्ता इतनी आसान नहीं हैं. यह बात अब्दुल्ला के अलावा कुछ ही लोग होंगे जो जानते होंगे. अब्दुल्ला दो बार राष्ट्रपति की दावेदारी प्रस्तुत कर चुके हैं औऱ 2014 में बहुत करीब तक पहुंचे थे.

    अब्दुल राशिद दोस्तम, सिपहसालार और पूर्व उप-राष्ट्रपति, 67
    उजबेकी सिपहसालार और एक और खांटी अफगानी नेता जिसने चार दशक की लड़ाई में कई बार अपनी वफादारी को बदला है. वह उत्तरी गठबंधन का अहम हिस्सा था जिसने तालिबान से तब लोहा लिया था जब पिछली बार 1996 से 2001 तक वो सत्ता में थे. दोस्तम, गनी की सरकार में वापस आए और 2013 से छह साल तक उप राष्ट्रपति रहे. उन पर युद्ध अपराध, सामूहिक हत्या और विरोधी दलों के लोगों का बलात्कार करने का आदेश देने के आरोप हैं. जिसे उन्होंने हमेशा नकारा है. स्वास्थ्य के चलते उन्होंने कई साल तुर्की में गुजारे थे. दोस्तम तब अफगानिस्तान वापस लौटे जब तालिबान तेजी से क्षेत्रों पर कब्जा कर रहा था. और उनसे उम्मीद थी कि वो मजार ए शरीफ जैसे चर्चित उत्तरी शहर की बचा लेते. लेकिन सब कुछ इतना ताबड़तोड़ हुआ कि दोस्तम को कुछ भी करने का मौका नहीं मिला और दोस्तम को वहां से निकलना पड़ा, इस वक्त वो कहां पर है इसकी जानकारी नहीं है.

    अमरुल्लाह सालेह, पूर्व गुप्तचर प्रमुख और उप राष्ट्रपति, 48
    अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति, जिसने खुद को गनी के देश छोड़ने के बाद अफगानिस्तान का जायज संरक्षक घोषित किया है. सालेह ने गनी की सरकार में 2017 में आंतरिक मंत्री और अफगानिस्तार की गुप्तचर संस्था के प्रमुख बने. उन पर तालिबान ने कई बार हमले किए. सालेह की उत्तरी पंजशीर वैली पर मजबूत पकड़ है और उन्होंने ताजिक नेता अहमद मसूद जिन्होंने तालिबान के साथ लोहा लेने की कसम खाई है, के साथ हाथ मिलाया है.

    अहमद मसूद, विद्रोही नेता, 32
    अहमद मसूद, अहमद शाह मसूद के बेटे हैं जिन्होंने शांति के लिए 2019 में अभियान शुरू किया था. अहमद मसूद तालिबान के खिलाफ खड़े होने वालों के तौर पर पहचान रखते हैं. यूके से पढ़ाई कर चुके मसूद ने लिखा था कि उनके लड़ाके एक बार फिर तालिबान से टक्कर लेने को तैयार हैं. बस उनके पास हथियारों की भारी कमी है इसलिए वो चाहते हैं कि पश्चिम के उनके दोस्त हथियारों की बगैर देरी किए आपूर्ति करवा दें. मसूद की फिलहाल तालिबान के साथ बातचीत चल रही है.

    अता मोहम्मद नूर, प्रांतिया नेता, 57
    अता मोहम्मद नूर एक ताजिक नेता हैं. और सोवियत के हमले के दौरान से ही युद्ध का हिस्सा हैं साथ ही तालिबान के सबसे भयानक दुश्मनों में गिने जाते हैं. वह उत्तरी बाल्ख प्रांत के गवर्नर थे. मजार ए शरीफ की प्रांतीय राजधानी के तालिबान के कब्जे में आने के बाद वो कभी उनके प्रतिद्वंद्वी रहे दोस्तम के साथ भाग निकले. इस साल की शुरूआत में जब तालिबान ने कब्जा जमाना शुरू किया था तो नूर उन चंद पहले लोगों में से थे जिन्होंने लोगों को इन हमलावरों के खिलाफ लड़ने की आवाज बुलंद की थी. अफगान सेना के आत्मसमर्पण को नूर ने ट्विटर पर एक सोचा समझी और कायर षडयंत्र करार दिया था, और उन्होंने इसके खिलाफ लड़ने की कसम खाई थी. फिलहाल में उज्बैकिस्तान में है.

    मोहम्मद करीम खलीली, हजारा नेता, 71
    पूर्व उप राष्ट्रपति और हजारा समुदाय के चर्चित चेहरे. खलीली उस वरिष्ठ राजनयिक दल का हिस्सा थे, जो 15 अगस्त को तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद पाकिस्तान गया था. पिछले हफ्ते की अपनी फेसबुक पोस्ट में उन्होंनें कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि तालिबान का शीर्ष नेतृत्व स्थिर राजनीति आदेश पारित करेगा. अफगानिस्तान का भविष्य अब उन पर निर्भर करता है.

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