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Opinion : हम्बनटोटा बंदरगाह पर श्रीलंकाई राष्ट्रपति का कड़ा रुख पीएम नरेंद्र मोदी की बड़ी कूटनीतिक सफलता

Kinshuk Praval | News18Hindi
Updated: November 27, 2019, 5:43 PM IST
Opinion : हम्बनटोटा बंदरगाह पर श्रीलंकाई राष्ट्रपति का कड़ा रुख पीएम नरेंद्र मोदी की बड़ी कूटनीतिक सफलता
श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर चीन को कड़ा संदेश दिया है

राष्ट्रपति गोटाबाया का ये रुख भारत के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर के रणनीतिक क्षेत्र में चीन भारत के काफी करीब पहुंच चुका है

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  • Last Updated: November 27, 2019, 5:43 PM IST
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श्रीलंका-चीन के रिश्तों में हम्बनटोटा बंदरगाह एक मजबूत पड़ाव है. चीन के 8 अरब डॉलर के कर्ज में डूबे श्रीलंका ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस बंदरगाह को चीन को 99 साल के पट्टे पर दिया है. चीन की एक सरकारी कंपनी को इसका नियंत्रण दिया गया. हिंद महासागर में चीन की इस मौजूदगी ने सामरिक लिहाज से भारत की चिंता बढ़ाने का काम किया. लेकिन श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने भारत की चिंता को दूर करने की कोशिश की है. राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने चीन को श्रीलंका का हम्बनटोटा  बंदरगाह सौंपना बहुत बड़ी भूल करार दिया है.

दो साल पहले श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना और तत्कालीन प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे ने न सिर्फ हम्बनटोटा  बंदरगाह बल्कि इसके आसपास की 15 सौ एकड़ ज़मीन भी चीन को सौंप दी थी. दलील ये दी गई थी कि चीन से मिले 8 अरब डॉलर के कर्ज़ को न चुका पाने की वजह से ये फैसला करना पड़ा. साथ ही भरोसा ये दिलाया गया कि चीन इस बंदरगाह का सैन्य इस्तेमाल नहीं कर सकेगा बल्कि व्यवसायिक इस्तेमाल करेगा. जबकि सच्चाई ये थी कि सामरिक लिहाज से महत्वपूर्ण बंदरगाह को चीन को सौंपकर श्रीलंका कर्ज के जाल से मुक्त होने की बजाए चीन की चाल का शिकार जरूर हो गया था.

तभी पिछली सरकार के फैसले का विरोध करते हुए राष्ट्रपति गोटबाया ने खुलकर ये कहा कि वो ऐसा कहने से डरते नहीं हैं कि यह गलती थी. उन्होंने कहा कि रणनीतिक और आर्थिक तौर पर महत्वपूर्ण बंदरगाह देना मंजूर नहीं है और उस पर श्रीलंका का नियंत्रण होना चाहिए. इसलिए वो चीन से पुरानी डील पर दोबारा विचार करने और बेहतर समझौते की अपील करते हैं.

हम्बनटोटा  बंदरगाह पर राष्ट्रपति गोटबायाका रुख चीन के लिए बड़ा झटका है क्योकि ये बंदरगाह चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना का भी एक हिस्सा है.

साफ है कि राजपक्षे के इस बयान के साथ ही श्रीलंका सरकार चीन से हम्बनटोटा बंदरगाह पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ वापस लेने की दिशा में पहला कदम बढ़ा चुकी है. राष्ट्रपति गोटबाया का ये रुख भारत के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर के महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र में चीन भारत के करीब पहुंच चुका है.

ये भारत के लिए इसलिए भी बड़ी कूटनीतिक कामयाबी है क्योंकि श्रीलंका में राजपक्षे खेमे को चीन समर्थित माना जाता है. प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के साल 2005 से 2015 के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान चीन के श्रीलंका से संबंध मजबूत हुए तो कई महत्वपूर्ण निवेश भी हुए. इसी दौरान चीन ने श्रीलंका को बेपनाह कर्ज़ बांटा. उसी दौरान  चीन के प्रति श्रीलंका का झुकाव बढ़ता गया तो भारत-श्रीलंका के रिश्तों में रुखापन भी बढ़ा.

पिछले डेढ़ दशक में भारत और श्रीलंका के रिश्ते महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहे थे. इसके बावजूद भारत ने पड़ौसी प्रथम की विदेश नीति पर चलते हुए श्रीलंका के हितों का हमेशा ख्याल रखा और जरुरत पड़ने पर उसके साथ खड़ा रहा. 21 अप्रैल 2019 को ईस्टर के मौके पर श्रीलंका के चर्च में हुए विस्फोटों से श्रीलंका दहल गया था. आतंकी हमले के बाद पीएम मोदी ही सबसे पहले श्रीलंका का मनोबल बढ़ाने वहां पहुंचे. श्रीलंका की दुख और तकलीफ की घड़ी में पीएम मोदी ने भरोसा दिलाया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत श्रीलंका के साथ खड़ा है.
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पीएम मोदी अपने प्रधानमंत्री काल में श्रीलंका की 3 बार यात्रा कर चुके हैं. इससे पहले साल 2015 और 2017 में उन्होंने श्रीलंका की यात्रा की थी. पीएम मोदी की यात्राओं और भारत की विदेश नीति से श्रीलंका के साथ द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती का आधार इस तरह मजबूत हुआ कि श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोटबाया ने अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में चीन की बजाए भारत को चुना. पीएम मोदी ने खुद उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया जिसे उन्होंने स्वीकार किया. गोटबाया 29 नवंबर को भारत आएंगे.

वहीं श्रीलंका में निवेश में चीनी दबदबे को खत्म करने की दिशा में भी भारत सरकार को बड़ी जीत हासिल हुई है. राष्ट्रपति राजपक्षे ने कहा कि वो श्रीलंका में सिर्फ चीन नहीं बल्कि भारत, जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया का भी निवेश देखना चाहते है और उन्होंने इन देशों को न्योता दिया. चीन के कारोबारी हित को ये बड़ा झटका है.

गोटबाया ने चीन को ये संदेश दे दिया कि वो देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए विदेशी निवेश के लिए सिर्फ चीन के भरोसे नहीं हैं. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो श्रीलंका को एक तटस्थ राष्ट्र के रूप मे देखना चाहते हैं और भारत के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं. ये भारत के लिए बड़ी कामयाबी है कि पिछले डेढ़ दशक से चले आ रहे श्रीलंका के भारत के प्रति रुख में सकारात्मक बदलाव लाने में हुआ है.

भारत और श्रीलंका के बीच बौद्धिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक संबंध हैं. श्रीलंका भारत के करीबी पड़ौसियों में से एक है. हाल के सालों में दोनों ही देशों के बीच शिक्षा, संस्कृति और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा और रिश्तों में प्रगाढ़ता आई. दोनों देशों के बीच निवेश और व्यापार बढ़ा. ऐसे में चीन के प्रति श्रीलंका के रुख में बदलाव भारत की पड़ौसी प्रथम नीति के लिए शुभ संकेत है.

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First published: November 27, 2019, 5:33 PM IST
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