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अफगानिस्तान में सरकार बनाने के लिए पुराने दुश्मनों से उम्मीद लगाए बैठा है तालिबान, जानिए कौन हैं ये नेता

अफगानिस्तान में सरकार बनाने के लिए पुराने दुश्मनों से उम्मीद लगाए बैठा है तालिबान, जानिए कौन हैं ये नेता

तालिबान अफगानिस्तान में एक समावेशी सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. (फाइल फोटो)

तालिबान अफगानिस्तान में एक समावेशी सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. (फाइल फोटो)

Taliban in Afghanistan: अफगानिस्तान में सरकार बनाने के लिए तालिबान काबुल में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद के पूर्व प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ लगातार बैठकें कर रहा है.

    नई दिल्ली. अफगानिस्तान पर हमले और तेज सैन्य नियंत्रण के कुछ दिनों बाद, तालिबान एक और गृहयुद्ध की आशंकाओं के बीच एक समावेशी सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. अफगानिस्तान में सरकार बनाने की अपनी कोशिशों के मद्देनजर तालिबान काबुल में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद के पूर्व प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ लगातार बैठकें कर रहा है. बहुसंख्यक जातीय पश्तून आबादी, जो देश के दक्षिणी हिस्से में सबसे अधिक प्रभावशाली है, को तालिबान की ताकत माना जाता है.

    हालांकि, अपने प्रभुत्व के बावजूद, तालिबान यह मानता है कि किसी भी स्थिर शासन संरचना के लिए शक्तिशाली सरदारों और जातीय उज़बेकों, ताजिकों और हज़ारों की भागीदारी की आवश्यकता होगी क्योंकि इसके बिना देश में फिर उसी तरह का आंतरिक संघर्ष पैदा हो सकता है जो 1990 के दशक में शुरू हुआ था.

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    इस बीच, तालिबान को वैश्विक शक्तियों से मान्यता मिलना और उनका समर्थन हसिल करना भी मुश्किल लग रहा है. संयुक्त राज्य अमेरिका ने तालिबान सरकार के लिए तेजी से मान्यता के किसी भी अवसर को खारिज कर दिया है. तालिबान के लिए देश में सरकार बनाना शायद आसान काम न हो. अफगानिस्तान में एक समावेशी सरकार बनाने के लिए तालिबान को जिन नेताओं से समर्थन की आवश्यकता है, वे ये हैं:

    हामिद करजई:
    अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, जिन्होंने देश में रहने का संकल्प लिया था उस तालिबान के साथ बातचीत में शामिल रहे, जो कभी उन्हें मारना चाहता था. तालिबान के एक कमांडर और हक्कानी नेटवर्क आतंकवादी समूह के वरिष्ठ नेता अनस हक्कानी ने सरकार बनाने के लिए तालिबान के प्रयासों के तहत बातचीत के लिए करजई से मुलाकात की थी. बैठक में 63 वर्षीय करजई के साथ पुरानी सरकार के मुख्य शांति दूत अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी थे. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान ड्रोन के इस्तेमाल और सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने से इनकार की वजह से करजई और अमेरिका में गठजोड़ नहीं हो सका.

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    अब्दुल्ला अब्दुल्ला:
    राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद के पूर्व प्रमुख 60 वर्षीय अब्दुल्ला अब्दुल्ला, उत्तरी गठबंधन के नेता अहमद शाह मसूद के सलाहकार थे, जिन्होंने रूस और तालिबान से लड़ाई लड़ी थी. एक जातीय ताजिक नेता अब्दुल्ला तालिबान के साथ सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण पर बातचीत करने में भी शामिल रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय सुलह के लिए उच्च परिषद का भी नेतृत्व किया, जिसे अंतर-अफगान शांति वार्ता का नेतृत्व करने की उम्मीद थी, जो अब समाप्त हो गई है. अब्दुल्ला दो बार राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हुए और 2014 में दूसरी बार जीतने के करीब भी पहुंचे थे.

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    गुलबुद्दीन हेकमतयार:
    पूर्व प्रधानमंत्री और सरदार गुलबुद्दीन हेकमतयार, जिनके लड़ाकों ने 1990 के खूनी गृहयुद्ध के दौरान काबुल में हजारों लोगों को मार डाला था, 2016 में निर्वासन से लौटने के बाद से एक विभाजनकारी व्यक्ति बने हुए हैं. 72 वर्षीय हेकमतयार ने अगले अफगान सरकार के लिए एक संवाद और चुनाव का समर्थन किया है. इसके साथ ही वे अफगान सरकार और वर्तमान में तालिबान नेताओं के साथ चर्चा में भी भाग ले रहे हैं. उनके पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के साथ गहरे संबंध हैं, जो उन्हें इस पूरी लड़ाई में एक अहम खिलाड़ी बनाते हैं. 2003 में, अमेरिकी विदेश विभाग ने उन्हें अल-कायदा और तालिबान के हमलों में भाग लेने और समर्थन करने का आरोप लगाते हुए एक आतंकवादी के रूप में सूचीबद्ध किया था, लेकिन वॉशिंगटन ने बाद में पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के हेकमतयार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के फैसले का स्वागत किया.

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    अब्दुल रशीद दोस्तम:
    अमेरिका से संबद्ध सिपहसालार और पूर्व उप-राष्ट्रपति अब्दुल राशिद दोस्तम (67) के भी वार्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की संभावना है. दोस्तम को एक राजनीतिक दिग्गज माना जाता है, जिसने चार दशकों की लड़ाई में कई बार अपनी भूमिका बदली है. वे उत्तरी गठबंधन (Northern Alliance) का एक बड़ा हिस्सा थे, जिसने तालिबान से 1996 से 2001 तक सत्ता में रहने के दौरान तालिबान से लड़ाई लड़ी थी. दोस्तम ने अशरफ गनी की सरकार का समर्थन किया और 2013 से छह साल के लिए देश के उप-राष्ट्रपति बने. अपनी सेना से जुड़े एक के बाद एक युद्ध अपराधों के बावजूद, अफगान सरकार को उम्मीद थी कि दोस्तम के सैन्य कौशल और तालिबान के प्रति घृणा से मौजूदा विद्रोही हमले को पीछे छोड़ने में मदद मिल सकती है. हालांकि, तालिबान के तेज नियंत्रण के बीच उन्हें भागने के लिए मजबूर होना पड़ा.

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    अमरुल्लाह सालेह:
    पूर्व जासूस प्रमुख और उप-राष्ट्रपति, 48 वर्षीय अमरुल्ला सालेह ने पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़कर भागने के बाद खुद को अफगानिस्तान का ‘वैध कार्यवाहक राष्ट्रपति’ घोषित किया है. सालेह, जो 2017 में आंतरिक मंत्री के रूप में गनी की सरकार में शामिल हुए थे और अफगानिस्तान की खुफिया एजेंसी का नेतृत्व किया था, तालिबान ने उनकी हत्या करने की कई बार कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके. सालेह पर तालिबान का सबसे ताजा हमला पिछले सितंबर में हुआ था. सालेह वर्तमान में उत्तरी पंजशीर घाटी के अपने गढ़ में है – जो 1990 के गृह युद्ध के दौरान तालिबान के हाथों में कभी नहीं आया और एक दशक पहले सोवियत संघ भी उस पर विजय हासिल नहीं कर सका था. ऐसा लगता है कि उन्होंने ताजिक नेता अहमद मसूद से हाथ मिला लिया है, जिसने तालिबान से लड़ने की कसम खाई है.

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    अहमद मसूद:
    युवा विद्रोही नेता अहमद मसूद, जो कि मारे गए ताजिक मुजाहिदीन कमांडर अहमद शाह मसूद के बेटे हैं, तालिबान के खिलाफ लड़ाई करने के लिए दृढ़ हैं और समूह के खिलाफ विद्रोह के चेहरे के रूप में उभर सकते हैं, लेकिन यह काफी हद तक विदेशी समर्थन पर निर्भर करेगा. मसूद ने फ्रांस, यूरोप, अमेरिका और अरब जगत से मदद की गुहार लगाते हुए कहा कि उन्होंने 20 साल पहले सोवियत और तालिबान के खिलाफ उसके पिता की लड़ाई में मदद की थी. एक प्रवक्ता ने 23 अगस्त को कहा कि मसूद फिलहाल तालिबान के साथ बातचीत कर रहा है, लेकिन चीजें उसके पक्ष में नहीं दिख रही हैं क्योंकि तालिबान पंजशीर घाटी के पास मजबूत स्थिति में था और उसने उत्तरी अफगानिस्तान के तीन जिलों को वापस ले लिया था जिसे पिछले हफ्ते स्थानीय मिलिशिया समूहों ने तालिबान से छीन लिया था. हालांकि दोनों के बीच आगे की लड़ाई की कोई पुष्टि नहीं हुई.

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    अता मोहम्मद नूर:
    प्रांतीय नेता अता मोहम्मद नूर सोवियत आक्रमण के बाद से अफगानिस्तान में होने वाले युद्धों में शामिल रहे हैं और तालिबान के कट्टर दुश्मनों में से एक थे. एक जातीय ताजिक नेता नूर अफगानिस्तान में सबसे समृद्ध उत्तरी बल्ख प्रांत का गवर्नर था, लेकिन 2018 में गनी द्वारा नूर को हटाए जाने के बाद बल्ख प्रांत की समृद्धि भी जाती रही. मजार-ए-शरीफ की प्रांतीय राजधानी के तालिबान के हाथों में जाने के साथ ही नूर अपने एक समय के प्रतिद्वंद्वी और अफगानिस्तान के पूर्व उप-राष्ट्रपति रहे अब्दुल राशिद दोस्तम के साथ भाग गया. इस साल की शुरुआत में जैसे ही तालिबान ने अपनी रफ्तार पकड़ी, तो आतंकवादियों से लड़ने के लिए नए मिलिशिया और लोगों का आह्वान करने वालों में से नूर सबसे पहले शख्स थे. ट्विटर पर, नूर ने आरोप लगाया है कि अफगान बलों का आत्मसमर्पण एक बड़े “संगठित और कायरतापूर्ण साजिश” का हिस्सा था और उन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ने की कसम खाई है. वे इस समय उज्बेकिस्तान में हैं.

    मोहम्मद करीम खलीली:
    पूर्व उप-राष्ट्रपति मोहम्मद करीम खलीली, एक प्रमुख हजारा जातीय नेता हैं और वे उस वरिष्ठ अफगान राजनेताओं के प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, जो 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद पाकिस्तान गया था. खलीली ने पिछले हफ्ते एक फेसबुक पोस्ट में उम्मीद व्यक्त की है कि तालिबान का शीर्ष नेतृत्व एक स्थिर राजनीतिक व्यवस्था बनाएगा और कहा, ‘अफगानिस्तान का भविष्य इसी पर निर्भर करता है.’

    Tags: Afghanistan, Ashraf Ghani, Taliban

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