Analysis : जम्मू-कश्मीर पर भारतीय कदम और पाकिस्तानी प्रतिक्रियाएं

Analysis : जम्मू-कश्मीर पर भारतीय कदम और पाकिस्तानी प्रतिक्रियाएं
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान.

पाकिस्तान (Pakistan) नैतिकता के अभाव से हमेशा ही ग्रस्त रहा है. इस समय महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन मुद्दों पर पाकिस्तान विवाद खड़ा करता है क्या वे मुद्दे पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा किए गए कश्मीर (Kashmir) के लिए लागू नहीं होते?

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 19, 2019, 7:52 PM IST
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भारत की संसद ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) में लागू संविधान के अनुच्छेद 370 (Article 370) और 35A (Article 35a) के प्रावधानों को समाप्त कर दिया. इससे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र के भारत में पूर्ण एकीकरण का मार्ग प्रशस्त होगा. दूसरी ओर इस क्षेत्र के 72 वर्ष से वंचितों का जीवन व्यतीत कर रहे वर्गों जैसे महिलाओं, पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों, प्रदेश की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों और इस प्रदेश के अल्पसंख्यक समुदायों को सही मायनों में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का रास्ता साफ़ हो सकेगा. परंतु भारत के इस कदम ने पाकिस्तान की राजनीति में भूचाल ला दिया है. विपक्षी दल पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पाकिस्तान तहरीक ऐ इंसाफ की सरकार और प्रधानमंत्री इमरान खान पर सीधे-सीधे अकर्मण्यता का आरोप लगा रहे हैं. दूसरी ओर अपनी दरकती राजनैतिक जमीन को बचाने की कोशिशों के तहत इमरान खान विश्व भर के अपने सहयोगियों से मदद की गुहार लगा रहे हैं. साथ ही, भारत को सीधे सीधे युद्ध के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे हैं.

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की भूमिका
जम्मू-कश्मीर सदियों से भारत की प्राकृतिक सीमाओं को अंकित करता आ रहा है. वो भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य अंग रहा है. परन्तु इसे हम विभाजन के तत्कालीन माउंटबेटन प्लान के नजरिये से भी देखें तो यह तत्कालीन महाराजा हरि सिंह के द्वारा संविलियन के पत्र पर 26 अक्टूबर 1947 को किए गए हस्ताक्षर के बाद भारत में विधिवत विलीन किया गया. परंतु इससे पहले पाकिस्तान ने कबायली हमले की आड़ में अपनी सेना द्वारा भारत के 90,972 वर्गकिलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर लिया. तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान ने इसका 5,180 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा 1962 में चीन को हस्तांतरित भी कर दिया जो ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट या शक्सगाम वैली के नाम से जाना जाता है. अब पाकिस्तान अवैध रूप से हथियाए हुए जम्मू-कश्मीर के इस हिस्से पर हथियारों के जोर पर अपना कब्जा बनाए हुए हैं. दूसरी ओर भारत द्वारा अपने वैध क्षेत्र में संवैधानिक और प्रशासनिक परिवर्तनों पर दुनिया भर में शोर गुल मचाए हुए है.

पाकिस्तान की सरकार और सेना का रुख
अमेरिका यात्रा से लौटने के बाद इमरान खान को पाकिस्तान की राजनीति में एक बड़ा वेग और समर्थन प्राप्त हुआ था. लेकिन 5 अगस्त की घटना ने इमरान खान के जमते हुए क़दमों को दोबारा उखाड़ दिया है. इमरान खान ने राजनीति में स्थापित होने के लिए लंबा संघर्ष किया है. अब जब उनके हाथ सत्ता लगी है तो इसे खोने का भय उन पर बुरी तरह हावी हो गया है.



पाकिस्तान के आर्थिक हालात दिवालियापन की कगार तक पहुंच गए हैं. अगर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के मैक्रोइकोनॉमिक इंडिकेटर्स को छोड़ भी दें तो हालत यह है कि दुर्दशा की शिकार पाकिस्तानी जनता का असंतोष चरम पर है और खुले आम सार्वजानिक रूप से उन्हें कोसा जा रहा है. ऐसी स्थिति में इमरान खान के पास सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प यही है कि वह पुरजोर तरीके से भारत के विरुद्ध अभियान छेड़ दें, जो उनसे पूर्व के शासकों द्वारा आजमाया गया सबसे कारगर उपाय रहा है.


इस हड़बड़ी में पाकिस्तान की सरकार ऐसे मूर्खतापूर्ण कदम उठा रही है जो केवल उसके नागरिकों के लिए परेशानियों को बढ़ाने का ही काम कर रहे हैं. राज्यसभा में अनुच्छेद 370 को हटाने संबंधी प्रस्ताव पारित होते ही पाकिस्तान ने तुरंत भारत के लिए अपना वायुक्षेत्र प्रतिबंधित कर दिया और भारत के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को भी निलंबित कर दिया. साथ ही साथ भारत के साथ अपने संबंधों को डाउनग्रेड करते हुए भारत के उच्चायुक्त को देश छोड़ने के लिए कह दिया.

केवल कूटनीतिक उपायों से जनता तक अपना आक्रामक रुख पहुंचाया जाना संदेहास्पद था अत: इमरान खान को कुछ फ़िल्मी तरीके भी अपनाने पड़े. समाचारपत्र डॉन के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इमरान खान ने कहा कि भारत के इस तरह के दृष्टिकोण के बाद, ‘पुलवामा जैसी घटनाएं फिर से होना अवश्यम्भावी हैं’.

खान ने अपने देश की संसद को बताया, ‘मैं पहले ही यह अनुमान लगा सकता हूं (कि अगर ऐसा हमला होता है तो) वे हमारे ऊपर फिर से आरोप लगाने का प्रयास करेंगे. वे फिर से हम पर हमला कर सकते हैं और हम फिर से जवाबी कार्रवाई करेंगे.’


यह सब पाकिस्तान की सेना की शह पर किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि फटेहाल पाकिस्तान के बदहाल प्रधानमंत्री का यह बयान सेना के आधिकारिक बयान के बाद ही आ सका. सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय रावलपिंडी में सेना के प्रमुख कमांडरों के साथ एक बैठक के बाद बयान दिया था कि वे कश्मीरियों व उनके संघर्ष का समर्थन करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाने के फैसले को मानने से इनकार कर दिया है. वहीं पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने ट्वीट कर कहा कि सेना अपनी सरकार के पक्ष को पूरी तरह से समर्थन करती है जिसमें भारत सरकार द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने को स्वीकार नहीं किया गया. (साथ ही साथ गफूर के इस ट्वीट में उसकी लाचारी साफ़ झलकती नज़र आई जब उन्होंने लिखा कि उन्हें कभी नहीं लगा कि कश्मीर से दशकों पुराना कानून 370 या 35 A हटाया जाएगा)

पाकिस्तान के राजनैतिक दल
भारत के साथ विवाद और कश्मीर का मामला कुछ ऐसे विषय हैं जहां पाकिस्तान का कोई भी राजनैतिक दल युद्धोन्माद भड़काने में पीछे नहीं रहना चाहता. इसलिए भारत के इस कदम के बाद पाकिस्तान के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने भारत के विरुद्ध कदम उठाने और “कश्मीरियों के समर्थन” में सरकार के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता दोहराई. परन्तु शीघ्र ही इनकी आपसी खींचतान भी सामने आ गई.
पीएमएल-एन के अध्यक्ष शाहबाज़ शरीफ ने पीटीआई सरकार को अपने पूर्ण सहयोग की पेशकश की, परन्तु उसके तुरंत बाद ही पीएमएल-एन की उपाध्यक्ष मरियम नवाज ने अपने चाचा (शाहबाज शरीफ) को इस मुद्दे पर इमरान खान से हाथ मिलाने की पेशकश का विरोध करते हुए कहा कि विपक्ष से कोई समर्थन ऐसी सरकार को नहीं दिया जाना चाहिए जो न केवल गैर-प्रतिनिधित्व वाली है, बल्कि इसने पाकिस्तान को हर संभव तरीके से घुटने पर ला दिया है. उन्होंने कहा कि इमरान खान सरकार को दिया गया समर्थन और भी बड़ी आपदाओं और गंभीर नुकसान का कारण बनेगा क्योंकि यह सरकार केवल इन परिस्थितियों में आत्मसमर्पण करना जानती है.

इसी तरह की हिचकिचाहट पीपीपी के नेता रजा रब्बानी के वक्तव्य में भी देखी जा सकती है. अब इमरान को केवल कुछ कट्टरपंथी इस्लामिक दलों का समर्थन प्राप्त है जिनका कोई जनाधार नहीं. यह इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत है कि पाकिस्तान की जनता इन नीतियों से उकता चुकी है जिसने भारत का भय दिखा दिखा कर सिवाय बदहाली के उन्हें कुछ और नहीं दिया है. साथ ही राजनैतिक दलों को यह संकेत मिल चुका है कि अब उनका यह “भावनात्मक वोट बैंक” निष्क्रिय होने जा रहा है.


पाकिस्तान की मीडिया का रुख
पाकिस्तान की मीडिया इस समय एक अघोषित सेंसर के दौर से गुज़र रही है. पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट हो या बलूचिस्तान में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष ऐसी चीजों को मीडिया में आने से सख्ती से रोक दिया गया है. PEMRA जैसी मीडिया को नियंत्रित करने वाली एजेंसी के तहत पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल्स केवल वही चीजें दिखा पा रहे हैं जो सरकार और सेना चाहती है. अगर भारत के इस कदम के बाद पाकिस्तान की मीडिया को देखें तो वह भारत के इस कदम को ऐतिहासिक भूल बता रहे हैं और बकौल उनके इस क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ-साथ चीन और संयुक्त राष्ट्र संघ भी महत्वपूर्ण भागीदार हैं.

यदि हम समग्रता में देखें तो पाकिस्तान का मीडिया, कुछ चीजें बार-बार रेखांकित कर रहा है, जैसे 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम बहुलता पर संकट मंडरा रहा है, कश्मीर के लोगों के सम्मुख पहचान का संकट उत्पन्न होने वाला है, केंद्र शासित प्रदेश बन जाने से इसके शासन पर केंद्र सरकार का नियंत्रण बढ़ जाएगा और कश्मीर अपनी “विशेष” स्थिति खो देगा. इसके साथ-साथ पाकिस्तान का मीडिया भारत को गंभीर हिंसक परिणाम भुगतने की धमकियां भी दे रहा है जो उनके राजनैतिक और सैन्य नेतृत्व के सुर में सुर मिलाने जैसा है.

पाकिस्तान की जनता का रुख
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति लगातार बदहाली की ओर अग्रसर है. पाकिस्तान की बहुसंख्य आबादी जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए संघर्ष कर रही है. उसके लिए इस समय का सबसे बड़ा मुद्दा दो वक्त की रोटी है जो लगातार उसकी पहुंच से दूर होती जा रही है. इस वित्त वर्ष में पाकिस्तान की विकास दर मात्र 3.3 प्रतिशत पर सीमित हो गई और पाकिस्तान में सर्वाधिक लोगों का जीवनयापन का आधार कृषि की विकास दर मात्र 0.85 प्रतिशत रह गई है.

बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है और पाकिस्तान के उद्योग धंधे चीन के सस्ते माल की भेंट चढ़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान की आम जनता का एक बड़ा वर्ग जो श्रमजीवी है या राजनैतिक हथकंडों से परे साधारण जीवन यापन करना चाहता है, के सम्मुख अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है. ऐसी स्थिति में वह अपनी सरकार के द्वारा दिखाए जा रहे अतिउत्साह और युद्धोन्माद के प्रति उदासीन है. पाकिस्तान में इस समय जो भी प्रदर्शन देखा जा रहा है उसके पीछे सेना समर्थित इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों की मुख्य भूमिका है, जिनके इस विषय में गहन निहित स्वार्थ जुड़े हुए हैं.


जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान की राजनीति में सदैव कॉर्नर स्टोन की तरह रहा है. पाकिस्तान के राजनैतिक और सैन्य शासकों ने भारत के साथ दुश्मनी को जीवंत रखने के लिए सदैव ही कश्मीर को ईंधन की तरह इस्तेमाल किया. भारत के साथ सदैव बने रहने वाली शत्रुता पाकिस्तान के जन्म को वैधता प्रदान करने वाले द्विराष्ट्र सिद्धांत के “आभासी अस्तित्व” को बनाए रखने के लिए अति आवश्यक थी क्योंकि इसका वास्तविकता में कोई अस्तित्व ही नहीं था.

पाकिस्तान नैतिकता के अभाव से हमेशा ही ग्रस्त रहा है. इस समय महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन मुद्दों पर पाकिस्तान विवाद खड़ा करता है क्या वे मुद्दे पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जा किए गए कश्मीर के लिए लागू नहीं होते? पाकिस्तान के समक्ष यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि 28 अप्रैल 1949 को उसने जम्मू-कश्मीर के हथियाए गए क्षेत्र को कैसे दो भागों में बांट दिया था, जब सरदार मुहम्मद इब्राहिम और चौधरी गुलाम अब्बास के साथ कराची अग्रीमेंट के तहत नॉर्दर्न एरियाज के नाम से गिलगित बल्तिस्तान के इस क्षेत्र से अलग कर दिया गया?

मार्च 1962, में किस अधिकार के तहत ट्रांसकराकोरम ट्रैक्ट चीन को हस्तांतरित कर दिया गया? ऐसे ढेरों विनाशकारी परिवर्तन पाकिस्तान इस क्षेत्र में कर चुका है जो उसके अधिकार से परे हैं.


अब जब पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की सहायता से ले गए अपने प्रस्ताव पर पराजय का सामना कर चुका है, वैश्विक समुदाय पर उसके दुष्प्रचार का कोई प्रभाव नहीं हो रहा. साथ ही जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य होती जा रही है. ऐसे में सर्वाधिक उपुयक्त उपाय यही है कि वह स्थिति को स्वीकार करे. वर्तमान स्थितियों में तनाव को बढ़ावा देना पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हो सकता है, जिसके सर्वाधिक गंभीर परिणाम पाकिस्तान को ही भुगतने होंगे.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)
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