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Coronavirus Update: म्यू और C.1.2: कोरोना वायरस के दो नए वेरिएंट्स, जो बढ़ा रहे हैं विशेषज्ञों की चिंता

C.1.2 को लेकर भी दक्षिण अफ्रीकी शोधार्थियों का मानना है कि इसमें आशिक तौर पर इम्यूनिटी से बचने की क्षमता है लेकिन इसके बावजूद वैक्सीन से बेहतर कोई उपाय नहीं है. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

C.1.2 को लेकर भी दक्षिण अफ्रीकी शोधार्थियों का मानना है कि इसमें आशिक तौर पर इम्यूनिटी से बचने की क्षमता है लेकिन इसके बावजूद वैक्सीन से बेहतर कोई उपाय नहीं है. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

Coronavirus Update: ग्रीक अक्षरों के आधार पर वेरिएंट के लिए WHO की नामकरण प्रणाली के तहत नामित, म्यू पहली बार इस साल के जनवरी में कोलंबिया में पाया गया. इसे यूएन की एक स्वास्थ्य एजेंसी ने 30 अगस्त को वेरिएंट ऑफ इंट्रेस्ट की सूची में डाल दिया था.

  • News18Hindi
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    नई दिल्ली. कोरोना वायरस के दो नए वेरिएंट (Coronavirus New Variants) सामने आए हैं जिसने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है. इनमें से एक है, B.1.621, जो सबसे पहले कोलंबिया में पाया गया था. इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पहले ही वेरिएंट ऑफ इंट्रेस्ट की सूची में डाल दिया है और इसे म्यू नाम दिया गया है. वहीं दूसरा वेरिएंट दक्षिण अफ्रीका में पाया गया था, जो कुछ ऐसे लक्षण दिखाता है जिसे लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि ये चिंता का कारण हो सकता है हालांकि ये अभी तक सीमित है. आइये दोनों वेरिएंट पर एक नज़र डालते हैं.

    ये दोनों वेरिएंट क्यों खींच रहे हैं ध्यान
    ग्रीक अक्षरों के आधार पर वेरिएंट के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की नामकरण प्रणाली के तहत नामित, म्यू पहली बार इस साल के जनवरी में कोलंबिया में पाया गया. इसे यूएन की एक स्वास्थ्य एजेंसी ने 30 अगस्त को वेरिएंट ऑफ इंट्रेस्ट (वीओआई) की सूची में डाल दिया था. दरअसल इसमें म्यूटेशन के वो गुण हैं जिसमें इम्यून से बचने की क्षमता होती है.

    इसका मतलब ये हुआ कि इसमें वैक्सीन या संक्रमण से पैदा हुई एंटीबॉडीज से बचकर निकलने की क्षमता है. डब्ल्यूएचओ का कहना है कि शुरुआती डाटा बताता है कि लोगों को स्वस्थ करने वाले या वैक्सीन को असर को कम करने की ताकत है. हालांकि, साथ में ये भी कहा गया है कि इसे सुनिश्चित करने के लिए अभी आगे अध्ययन की ज़ररूत है. एंटीबॉडीज को हराने के मामले में प्रथम दृष्टया डब्ल्यूएचओ का यह कहना है कि यह बीटा (B.1.351) वेरिएंट के समान है, जो दक्षिण अफ्रीका में व्यापक रूप से पाया गया है और यहां पर इसे पिछले साल दिसबंर में वेरिएंट ऑफ कन्सर्न (वीओसी) की श्रेणी में रखा गया था.

    देश के राष्ट्रीय संचारी रोग संस्थान के शोधकर्ताओं का कहना है कि C.1.2 को अभी तक डब्ल्यूएचओ ने ग्रीक शब्द टैग नहीं दिया है, इसमें कुछ बीटा या डेल्टा वेरिएंट जैसे लक्षण ज़रूर हैं, लेकिन साथ में इस नई वंशावली में अतिरिक्त म्यूटेशन भी मौजूद हैं.

    म्यूटेशन किस तरह का
    कोरोना वायरस में पाया जाने वाला सामान्य म्यूटेशन जो इसे ज्यादा संक्रामक बनाता है वो इसकी सतह पर मौजूद स्पाइक जैसी संरचना में पाया जाता है, जिसका इस्तेमाल ये हमला करके इंसानी कोशिका के साथ लगने में करता है. संक्रमण या वैक्सीन के बाद जो इम्यून सिस्टम एंटीबॉडी पैदा करता है उसका काम इन स्पाइक को ढूंढ कर निष्क्रिय करना होता है. कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में बदलाव इसे एंटीबॉडीज के खिलाफ कम ग्रहणशील बना देता है C.1.2 पर प्रकाशित होने वाले एक पेपर में बताया गया है कि स्पाइक प्रोटीन में घटने और बदलने का जो लक्षण हैं, वो दूसरे वीओसी में भी देखा गया है जो इसकी संक्रामकता को बढ़ाने और न्यूट्रीलाइजेशन की संवेदनशीलता को कम करने का काम करता है. बस इसमें पाया जाने वाला अतिरिक्त म्यूटेशन एक चिंता का विषय ज़रूर है.

    ये वेरिएंट मिले कहां
    डब्ल्यूएचओ ने 29 अगस्त को एक बुलेटिन जारी करते हुए कहा था कि B.1.621 से संबंधित वेरिएंट के 4500 से ज्यादा सैंपल लिए गए. B.1.621.1 दुनियाभर के 39 देशों में पाया गया है. साथ ही बताया गया है कि म्यू वेरिएंट के फैलाव में कमी आई है और फिलहाल ये 0.1 फीसद के नीचे हैं, हालांकि कोलंबिया में ये फैलाव 39 फीसद और इक्वाडोर में 13 फीसद है और लगातार बढ़ रहा है.

    अगस्त की शुरुआत में बेल्जियम के केयर होम में रहने वाले 7 लोगों को म्यू वेरिएंट से संक्रमण हुआ, जबकि सभी सातों मरीजों को वैक्सीन लग चुका था. विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से कुछ पहले से ही बीमार थे. दक्षिण अफ्रीकी शोधार्थियों का कहना है कि C.1.2 मई और अगस्त के दरमियान देश के सभी प्रांतों में पाया गया था. हालांकि इसकी फैलाव की गति बहुत कम थी ( जीनोम का 2 फीसद). यह वेरिएंट कम से कम सात देशों के सैंपल में पाया गया था. जिसमें अफ्रीका, यूरोप, एशिया और ओशिनिया शामिल है. ऑनलाइन वेरिएंट ट्रेकर के मुताबिक ना तो म्यू और ना ही C.1.2 भारत के किसी भी सैंपल में पाया गया है.

    क्या वैक्सीन इन वेरिएंट पर असर करेगी
    म्यू को अब जो वीओआई लेबल मिला है वो उन वेरिएंट से जुड़ा है जिनमें ऐसे अऩुवांशिक बदलाव पाए जाते हैं जिन्हें वायरस के लिए संक्रामकता, बीमारी की गंभीरता, इम्यूनिटी से बचाव, उपचार से बच कर निकलने में सक्षम माना जाता है. वीओआई की श्रेणी में वो भी आते हैं जिनमें सामुदायिक स्तर पर उल्लेखनीय संक्रमण फैलाने या कई देशों में तेजी से फैलने के योग्य माना जाता है. अभी तक पांच वेरिएंट को वीओआई की श्रेणी में रखा है, जिसमें कप्पा, या B.1.617.1 पहली बार पिछले साल अक्टूबर में भारत में पाया गया था, इसी दौरान डेल्टा वेरिएंट (B.1.617.2) भी सामने आया था.

    डेल्टा, वर्तमान में मौजूद चार में से एक है जो वीओसी है, इसका मतलब ये हुआ है कि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इसमें वीओआई की श्रेणी के तमाम लक्षण तो हैं ही, साथ ही कुछ और लक्षण भी हैं, जिसमें संक्रमण में बढ़ोतरी, या कोविड-19 महामारी विज्ञान में खतरनाक बदलाव, या इसकी घातकता में बढ़ोतरी या जो बीमारी से जुड़ी क्लीनिकल जानकारी है उसमें बदलाव मौजूद होते हैं. इसका ये मतलब भी है कि इसकी वजह से सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक आकलन, या उपलब्ध उपचार, वैक्सीन का असर भी कम हो जाता है

    हालांकि वैज्ञानिक और चिकित्सा से जुड़े लोगों का व्यापक स्तर पर ये मानना है कि वैक्सीन कोरोना के किसी भी तरह से वेरिएंट के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है. उधर ब्रेकथ्रू मामले भी असामान्य नहीं हैं, ये वो लोग हैं जिन्हें दोनों डोज लगने के बाद भी संक्रमण हुआ है, विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लोगों में मौत या अस्पताल में भर्ती होने का अनुपात वैक्सीन नहीं लगवाने वालों की तुलना में बहुत कम है.

    C.1.2 को लेकर भी दक्षिण अफ्रीकी शोधार्थियों का मानना है कि इसमें आंशिक तौर पर इम्यूनिटी से बचने की क्षमता है लेकिन इसके बावजूद वैक्सीन से बेहतर कोई उपाय नहीं है. वैक्सीन लोगों को अस्पताल में भर्ती होने या मौत के खतरे से सुरक्षित करती है., इसकी वजह से स्वास्थ्य तंत्र पर दबाव कम होता है और संक्रमण भी धीरे हो जाता है. इसके साथ ही कोविड से जुड़ी अन्य सुरक्षा, मसलन मास्क पहनना, हाथ धोना, उचित शारीरिक दूरी बना कर रखना इसके असर को और कम कर देता है.

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