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खुलासा! चीन, जर्मनी और रूस पर परमाणु बम गिराना चाहता था अमेरिका

News18India
Updated: December 24, 2015, 10:09 PM IST

अंकल सैम, दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका को इस नाम से भी जाना जाता है। दशकों से अमेरिका खुद को विश्व का दादा मानता आया है। हर क्षेत्र में अमेरिका अपनी..

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  • Last Updated: December 24, 2015, 10:09 PM IST
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नई दिल्ली। अंकल सैम, दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका को इस नाम से भी जाना जाता है। दशकों से अमेरिका खुद को विश्व का दादा मानता आया है। हर क्षेत्र में अमेरिका अपनी बादशाहत साबित करना चाहता है। और जब भी उसे किसी मुल्क से चुनौती मिलती है तो वो उसे कभी प्यार से पुचकार कर, या डराकर उसे झुकाने में जुट जाता है। अमेरिकी दादागीरी की जो दास्तान जो आईबीएन7 बता रहा है वो साठ के दशक की है।

द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुए 10 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका था। रूस, जर्मनी और चीन समेत दुनिया के कई देश अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे थे। ये वो वक्त था जब दुनिया कोल्ड वॉर यानी शीतयुद्ध के दौर से गुजर रही थी। इस दौर में दुनिया के तमाम ताकतवर देशों को डराने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने एक खतरनाक साजिश रची। ये साजिश थी दुनिया के कुछ चुनींदा शहरों पर परमाणु बम गिराने की। साजिश थी पोलैंड, चीन, जर्मनी और रूस जैसे मुल्कों को दुनिया के नक्शे से मिटा देने की। इस साजिश का खुलासा अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स एंड रिकॉर्ड्स एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट से हुआ है।

6 अगस्त 1945 और 9 अगस्त 1945 ये वो दो दिन हैं जिन्होंने एक मुल्क की दुनिया खाक कर दी। जब जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिरा दिया। करीब ढाई लाख लोग पल भर में राख हो गए। लाखों लोग अगली कई पीढ़ियों तक बीमारियों के शिकार होते रहे। अमेरिका और उसके समर्थक ये जंग जीत गए लेकिन इंसानियत हार गई। वही अमेरिका, वही अंकल सैम दोबारा भी इंसानियत को मिटा देने पर तुल गया था। जब उसने एक भयानक परमाणु प्लान तैयार कर लिया था। ये वो दौर था जब दुनिया में दो सुपरपॉवर आमने सामने थीं। ये शीत युद्ध या कोल्ड वॉर का दौर था जब अमेरिका और रूस के बीच भयानक तनाव था। उसी वक्त अमेरिका ने तीन देशों पर 12 हजार से लेकर 24 हजार परमाणु बमों की बारिश कर देने का एक भयानक खुफिया प्लान तैयार किया। तीन देशों को झुकाने के लिए अमेरिका उनपर एक के बाद एक इतने परमाणु बम गिराता कि दुनिया के नक्शे से ये मुल्क हमेशा के लिए मिट जाते।

परमाणु बमों का ऐसा तूफान पैदा करने का ये प्लान अमेरिकी राष्ट्रपति आइजन हावर के शैतानी दिमाग से निकल थी। 1956 को तैयार की गई इस खास स्टडी रिपोर्ट में उन हजारों निशानों के नाम भी हैं जहां अमेरिकी परमाणु बमों की बरसात की जानी थी। सालों से ये रिपोर्ट दबा कर रखी गई थी, अब अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स एंड रिकॉर्ड्स एडमिनिस्ट्रेशन ने ये जारी कर दी है। जिससे पूरी दुनिया में खलबली मची हुई है। महातबाही के इस हमले की रिपोर्ट चौंकाती है। अमेरिका ने रूस, चीन और जर्मनी को तबाह करने का प्लान बनाया था। खास निशाने पर थे मॉस्को, सेंट पीटरबर्ग, पूर्वी बर्लिन, बीजिंग और वॉरसॉ। रूस के सैकड़ों शहरों पर परमाणु बमों की बरसात होनी थी, कोशिश ये थी कि रूस को बदला लेने का मौका ही न दिया जाए। निशाने पर न सिर्फ सैनिक ठिकाने थे, बल्कि उद्योग धंधे भी थे और कई जगह तो लाखों लोगों की आबादी भी मारी जानी थी।



सबसे खौफनाक जानकारी ये है कि अमेरिकी एयर फोर्स जिन परमाणु बमों का इस्तेमाल करती वो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान पर बरसाए गए बमों से 630 गुना ज्यादा ताकतवर होते। जी हां, 630 गुना ज्यादा ताकतवर और ये एक या दो बम नहीं होते बल्कि 12 हजार से 24 हजार के बीच होते। इस महाहमले में कुछ देश हमेशा के लिए खत्म हो जाते और अमेरिका विश्व विजेता बन जाता। प्लान ये था कि रूस, जर्मनी और चीन में सैनिक ठिकानों पर परमाणु हमला हो और फिर भी अगर वो सरेंडर न करें तो उनकी आबादी को भी मिटा दिया जाए। ये शैतानी प्लान तैयार करने वाला अमेरिकी राष्ट्रपति आइवनहाइजर दरअसल एक फौजी कमांडर रह चुका था।

अमेरिका की ओऱ से डीक्लासीफाई हुए दस्तावेज बता रहे हैं कि इस महाहमले की प्लानिंग में सबसे बड़े टारगेट थे रूस के बेलारूस और मॉस्को। बेलारूस में मौजूद हवाई बेस पर परमाणु बम गिरते ताकि सोवियत संघ बदला लेने के लिए जवाबी परमाणु हमला न कर सके। लेकिन परमाणु बमों की पहली खेप गिराई जाती उस वक्त के सोवियत संघ की राजधानी मॉस्को में जी हां। अकेले मॉस्को में 149 निशाने चुने गए थे। कहा ये भी जा रहा है कि हर निशाने पर एक से ज्यादा परमाणु बम भी गिराए जा सकते थे।

रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन सोवियत संघ के शहर सेंट पीटरबर्ग में भी 145 निशानों पर परमाणु बम गिराने का प्लान था। उस वक्त उसे लेनिनग्राद नाम से पुकारा जाता था। वहीं चीन के बीजिंग शहर में 23 परमाणु बम गिरते। जबकि पोलेंड के वॉरसॉ में भी 15 परमाणु बम गिराए जाते। पूर्वी बर्लिन में 91 परमाणु बम गिराए जाते, हालांकि ये भी डर था कि उन बमों के हमले से पश्चिम बर्लिन भी तबाह हो जाता जो उस वक्त अमेरिका का दोस्त था। कहा ये भी जा रहा है कि इसी वजह से जर्मनी पर बरसने वाले परमाणु बम कम ताकत के चुने गए थे।

इस महाहमले की रिपोर्ट में हर निशाने को डेसिगनेटेड ग्राउंड जीरो या डीजीजेड नाम दिया गया था। और ये रिपोर्ट कहती है कि परमाणु बमों की पहली खेप गिरती 3400 निशानों पर। जी हां, 3400 निशाने यानि कम से कम 7 हजार परमाणु बम। इनमें से 1100 निशाने एयर बेस थे। यानि इन देशों की हवाई ताकत को खत्म कर दिया जाता। रिपोर्ट ये भी बता रही है कि अमेरिका ने जंग में इलाज में काम आने वाली दवा पेनसिलियम बनाने वाली फैक्टरियों को भी परमाणु बमों से तबाह करने की तैयारी कर ली थी, ताकि जख्मी लोग भी तड़प तड़प कर मरें।

बताया ये भी जा रहा है कि दूसरे परमाणु हमले की लिस्ट में 1209 निशाने तय किए गए थे। इनमें पूर्वी जर्मनी के 1200 शहर शामिल थे। बताया जा रहा है कि अमेरिका ने दो खास विमान इन परमाणु हमलों की बरसात के लिए चुने थे। पहला बी-47 विमान तो दूसरा बी-52 विमान। ब्रिटेन, स्पेन और मोरक्को से परमाणु बमों से लैस होकर अमेरिका के सैकड़ों बी-47 विमानों को महाहमला करने के लिए उड़ान भरती थी।

वहीं ज्यादा दूरी तक बिना तेल भरे उड़ने में सक्षम बी-52 बमवर्षक विमानों को अमेरिका से ही उड़ान भरनी थी। जरा सोचिए अगर अमेरिकी शैतानी राष्ट्रपति आइजन हावर की वो योजना कामयाब हो जाती तो दुनिया के तीन चार मुल्क खत्म हो जाते। क्या होता सोवियत संघ का, क्या होता जर्मनी का, क्या होता चीन का और क्या होता पोलैंड का। करोड़ो लोग मारे जाते, राख बन जाते, और अगर सोवियत संघ पर हुआ कोई हमला चूक जाता तो वो भी जवाबी हमला करता और शीत युद्ध परमाणु युद्ध में तब्दील हो जाता। चौथा विश्व युद्ध छिड़ जाता और शायद ये पृथ्वी ही मिट जाती। लेकिन शुक्र है, आइवनहाइजर का ये महाहमला प्लान फाइल में ही बंद रह गया। उसे अमल में लाने की हिम्मत और जरूरत किसी दूसरे राष्ट्रपति को नहीं हुई और उस भयानक परमाणु हमले से दुनिया बच गई।

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First published: December 24, 2015, 9:36 PM IST
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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