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क्या कोयले का ऑप्शन बनेगा Blue Hydrogen? जापान और ऑस्ट्रेलिया बना रहे प्लान

क्या कोयले का ऑप्शन बनेगा Blue Hydrogen? जापान और ऑस्ट्रेलिया बना रहे प्लान

जापान में कोयले से बिजली पैदा की जा रही है. (File pic)

जापान में कोयले से बिजली पैदा की जा रही है. (File pic)

परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की जगह जापान के गैस से चलने वाले बिजलीघरों पर काफी दबाव है. पुराने कोयला संयंत्रों को बंद करने और रिन्यूएबल एनर्जी पर स्विच करने के बजाय, जापान बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए जलती हुई हाइड्रोजन या अमोनिया पर शिफ्ट होना चाहता है. यहां पढ़ें खास रिपोर्ट

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    टोक्यो. दुनिया भर में पर्यावरण और संसाधनों को बचाने की मुहिम के बीच जापान (Japan) ब्लू हाइड्रोजन (Blue Hydrogen) की संभावनाओं पर काम कर रहा है. बता दें जापान में फिलहाल कोयले से बिजली उत्पादन किया जा रहा है. जापान सरकार ने ऑस्ट्रेलिया से आयातित सस्ते कोयले पर 22 नए कोयले से चलने वाले बिजली स्टेशन बनाने का फैसला किया है. आर्थिक रूप से यह समझदार फैसला कहा जा सकता है लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से यह उचित नहीं है. जापान पर अब कोयले का इस्तेमाल बंद करने का भारी दबाव है. साल 2010 तक जापान की बिजली का लगभग एक तिहाई परमाणु ऊर्जा से आता था और भी बहुत कुछ बनाने की योजना थी. फिर साल 2011 की सुनामी आई और जापान के सभी परमाणु ऊर्जा संयंत्र बंद हो गए. दस साल बाद भी अधिकांश बंद हैं  और उन्हें फिर से शुरू करने का बहुत ही ज्यादा विरोध हो रहा है.

    परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की जगह जापान के गैस से चलने वाले बिजलीघरों पर काफी दबाव है. पुराने कोयला संयंत्रों को बंद करने और रिन्यूएबल एनर्जी पर स्विच करने के बजाय, जापान बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए जलती हुई हाइड्रोजन या अमोनिया पर शिफ्ट होना चाहता है. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार स्वीडन में चल्मर्स यूनिवर्सिटी में ऊर्जा नीति के विशेषज्ञ प्रोफेसर टॉमस काबर्गर ने कहा, ‘कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में बिजली कंपनियों द्वारा किया गया निवेश उनकी बैलेंस शीट की वैल्यू के बिना बेकार हो जाएगा. और यह बिजली कंपनियों के लिए और फिर बैंकों और पेंशन फंड के लिए वित्तीय कठिनाइयां पैदा करेगा. यह जापान के लिए चुनौती है.’

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    कैसे काम करती है यह प्रक्रिया?
    इन संयंत्रों को आसानी से बर्निंग हाइड्रोजन या अमोनिया में बदला जा सकता है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड नहीं पैदा होगा. ऐसे में यह अच्छा समाधान दिख रहा है. लेकिन जापान की सरकार की महत्वाकांक्षाएं हैं इससे कहीं आगे हैं. वह दुनिया की पहली ‘हाइड्रोजन इकॉनमी’ बनना चाहता है.’

    हालांकि इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए जापान की जीरो कार्बन सोसाइटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए हाइड्रोजन कहां है? इसी का जवाब ब्लू हाइड्रोजन माना जा रहा है. रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग करके पानी से हाइड्रोजन बना कर ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ मिल तो सकता है लेकिन यह बहुत ही महंगा है. आज अधिकांश हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस, या कोयले से भी बनाई जाती है. यह सस्ता तो है लेकिन इससे  बहुत सारी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं. हालांकि अगर आप उन ग्रीनहाउस गैसों को नियंत्रित कर जमीन में गाड़ देते हैं, तो इसे ‘ब्लू हाइड्रोजन’ कहा जाएगा. जापान कुछ ऐसा ही करना चाहता है.

    इस साल की शुरुआत में, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने विक्टोरिया राज्य में ब्राउन कोल  को हाइड्रोजन में बदलने के लिए एक संयुक्त परियोजना शुरू की. इसमें हाइड्रोजन को माइनस 253C तक लिक्विफाइड किया जाता है. इसे विशेष रूप से निर्मित जहाज में के जरिए जापान ले जाया जाता है. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि साइट पर निकली ग्रीनहाउस गैसों का क्या होता है?

    अभी की बात करें तो वह सीधा वातावरण में जाते हैं लेकिन जापान और ऑस्ट्रेलिया का वादा है कि भविष्य में लैट्रोब वैली साइट पर निकलीं ग्रीनहाउस गैस पर कब्जा करना शुरू कर देंगे और इसे तट से दूर समुद्र तल में डाल देंगे. इस योजना से जलवायु परिवर्तन पर काम कर रहे लोग भयभीत हैं. उनका कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों को पकड़ने और संग्रहीत करने की तकनीक अभी तक अप्रमाणित है.

    Tags: Australia, Electric Bus, Hydrogen, Japan, World news

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