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दादा के बनाए कानून के शिकंजे में फंसे उमर अब्दुल्ला, जानें क्या है पब्लिक सेफ्टी एक्ट

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Updated: February 7, 2020, 12:54 PM IST
दादा के बनाए कानून के शिकंजे में फंसे उमर अब्दुल्ला, जानें क्या है पब्लिक सेफ्टी एक्ट
उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती पर पीएसए लगाया गया है..

जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 (Public Safety Act 1978 ) राज्य का सबसे कठोर कानून है. इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट और बिना कारण बताए दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है

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  • Last Updated: February 7, 2020, 12:54 PM IST
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जम्मू कश्मीर (Jammu Kashmir) के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ( Omar Abdullah) और महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (Public Safety Act) यानी सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत हिरासत में रखा गया है. ये दोनों नेता जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद पिछले छह महीने से नजरबंद थे. नजरबंदी के आखिरी दिन सरकार ने उनपर पब्लिक सेफ्टी एक्ट लगाकर उन्हें हिरासत में ले लिया है.

सरकार के इस कदम की विपक्ष ने आलोचना की है. पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा है कि 'उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और अन्य के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर बुरी तरह से आहत हूं. ये लोकतंत्र में सबसे घटिया और गंदा कदम है.'

क्या है पब्लिक सेफ्टी एक्ट
जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 राज्य का सबसे कठोर कानून है. इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट और बिना कारण बताए दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है. इसमें कोर्ट ट्रॉयल और चार्जेज लगाना भी जरूरी नहीं है. आमतौर पर पुलिस हिरासत में लिए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है. लेकिन पीएसए एक्ट में बिना कोर्ट में पेश किए किसी व्यक्ति को 2 साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

इस एक्ट के प्रावधान काफी कड़े हैं. इसमें बिना किसी आरोप के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा जा सकता है. हालांकि किसी-किसी मामले में ये प्रावधान होता है कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति अपने ऊपर लगाए गए आरोप की जानकारी मांग सकता है. किसी-किसी मामले में हिरासत में लिया गया व्यक्ति सरकार के फैसले को कोर्ट में चुनौती भी दे सकता है. हालांकि हिरासत में रखने वाला प्रशासन, आरोपों के बारे में जानकारी देने को सार्वजनिक हितों के खिलाफ बताकर, जानकारी देने से मना कर सकता है. ये एक्ट पूरे जम्मू कश्मीर पर लागू है.

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पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती 5 अगस्त से ही नज़रबंद हैं.


पब्लिक सेफ्टी एक्ट के काफी कड़े हैं प्रावधानजम्मू कश्मीर प्रशासन किसी व्यक्ति की आजादी से घूमने-फिरने को राज्य सरकार के लिए खतरा बताकर उसपर पीएसए लगा सकती है. पीएसए आमतौर पर डिवीजनल कमिश्नर या फिर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट लगाते हैं. 2012 में इसके कुछ कड़े प्रावधानों में संशोधन किया गया. 2012 के बाद इस एक्ट को 18 साल से कम उम्र के लोगों के लिए निष्प्रभावी बना दिया गया. 18 साल से कम उम्र के लोगों पर ये एक्ट नहीं लगाया जा सकता है.

नए संशोधन के बाद पीएसए के तहत हिरासत में लिए व्यक्ति को अब 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना होता है. इसके बाद एक नॉन ज्यूडिशियल एडवाइजरी बोर्ड इस बात पर फैसला लेती है कि उस व्यक्ति को हिरासत में रखना सही है या नहीं. उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के मामले में मजिस्ट्रेच ने पीएसए का नोटिस उन्हें थमाया है. इसलिए अब एडवाइजरी बोर्ड ही उनकी हिरासत पर फैसला ले सकती है.

जम्मू कश्मीर में PSA का होता रहा है खुलकर इस्तेमाल
जम्मू कश्मीर में पब्लिक सेफ्टी एक्ट का खुलकर इस्तेमाल हुआ है. पिछले साल उमर अब्दुल्ला के पिता फारुख अब्दुल्ला को भी इस एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया था. उस वक्त ये मामला संसद में भी उछला था. सुप्रीम कोर्ट में फारुख अब्दुल्ला को कोर्ट में पेश कर उन्हें रिहा करने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की गई थी.

पिछले साल ही जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के शाह फैसल को भी इस एक्ट के तहत हिरासत में लिया गया था. शाह फैसल उस वक्त दिल्ली से फ्लाइट लेकर विदेश जाने वाले थे. शाह फैसल को दिल्ली से श्रीनगर ले जाया गया और पीएसए एक्ट लगाकर हिरासत में रखा गया.

हुर्रियत नेता मसर्रत आलम, जेकेएलएफ नेता यासिन मल्लिक को भी इस एक्ट के तहत हिरासत में रखा गया है. पिछले विधानसभा चुनाव में उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि अगर राज्य में उनकी सरकार बनती है तो वो इस कानून को वापस ले लेंगे.

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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद से ही सुरक्षा व्यवस्था सख्त है


उमर अब्दुल्ला के दादा लेकर आए थे ये कानून
दिलचस्प बात ये है कि जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 को उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला लेकर आए थे. उस वक्त इस कानून को बेहद अलग वजह से बनाया गया था. शेख अब्दुल्ला राज्य में लकड़ी की चोरी और तस्करी रोकने के लिए इस कानून को लेकर आए थे. दरअसल उस वक्त जेल में रहकर भी अपराधी लकड़कियों की तस्करी में लगे थे. इसलिए शेख अब्दुल्ला की सरकार ने इसे रोकने के लिए पीएसए जैसा सख्त कानून बनाया था.

पीएसए नेशनल सिक्योरिटी एक्ट की तरह का है. लेकिन ये एनएसए से दो साल पहले ही आ चुका था. पीएसए एक्ट के प्रावधान के मुताबिक सरकार को हिरासत में लिए व्यक्ति को 4 हफ्ते के भीतर एक एडवाइजरी बोर्ड के सामने पेश करना होता है. एडवाइजरी बोर्ड 8 हफ्तों के भीतर हिरासत की अवधि को लेकर फैसला लेती है. अगर बोर्ड को लगता है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखे जाना जरूरी है तो उसे 2 साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

कुछ मामलों में हिरासत को कोर्ट में दी जा सकती है चुनौती
इस एक्ट में हिरासत में लिए शख्स के पास बहुत सीमित अधिकार होते हैं. आमतौर पर हिरासत में लिया गया व्यक्ति कोर्ट में अपने ऊपर लगे आरोपों को चुनौती दे सकता है. लेकिन पीएसए में हिरासत में लिया व्यक्ति एडवाइजरी बोर्ड के सामने तभी अपील कर सकता है, जब उसके पास कुछ पुख्ता सबूत हों, जो ये साबित करते हों कि उसका हिरासत में रहना गैरकानूनी है. ऐसे भी मामले हैं, जिसमें एक्ट लगाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और हिरासत में लिए व्यक्ति को छोड़ना पड़ा.

पीएसए एक्ट के सेक्शन 13(2) के मुताबिक हिरासत में लिए व्यक्ति को ये बताना भी जरूरी नहीं है कि उसे किन वजहों से हिरासत में रखा गया है, शर्त ये है कि अगर हिरासत में रखने की वजह बताने से सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचता हो.

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First published: February 7, 2020, 12:50 PM IST
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