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OPINION : क्या हैं पाकिस्तान में आज़ादी मार्च के मायने

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: November 1, 2019, 6:04 PM IST
OPINION : क्या हैं पाकिस्तान में आज़ादी मार्च के मायने
पाकिस्तान की कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल के हजारों कार्यकर्ता मौलाना फजलुर्रहमान की अगुवाई में इमरान खान के इस्तीफे की मांग करते हुए गुरुवार को इस्लामाबाद पहुंचे.

मौलाना फज़ल-उर-रहमान (Maulana Fazal-ur-Rehman) जो कुछ कह रहे हैं वही पूर्ण सत्य है, ऐसा भी नहीं. पाकिस्तान की राजनीति में भारत का विरोध और कश्मीर एक कॉर्नर स्टोन की तरह है.

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  • Last Updated: November 1, 2019, 6:04 PM IST
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मौलाना फज़ल-उर-रहमान (Maulana Fazal-ur-Rehman) और उनकी राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (JUI-F) आख़िरकार राजधानी इस्लामाबाद (Islamabad) पहुंच ही गए. मौलाना फज़ल-उर-रहमान की अगुआई में हजारों की संख्या में नारेबाजी करते और झंडे लहराते हुए JUI-F के कार्यकर्ताओं से युक्त “आजादी मार्च” ने गुरुवार को पाकिस्तान (Pakistan) की राजधानी में प्रवेश किया. उल्लेखनीय है कि इस मार्च की शुरुआत सिंध प्रांत से हुई थी. इसने बुधवार को पंजाब (Punjab) की राजधानी लाहौर (Lahore) को छोड़ दिया और गुरुवार की रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अपनी यात्रा का समापन किया. इससे पहले, सत्तारूढ़ और विपक्षी दल सरकार विरोधी मार्च को योजना के अनुसार आगे बढ़ने के लिए एक समझौते पर पहुंचे कि सरकार इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी जब तक कि प्रदर्शनकारी इस्लामाबाद में संवेदनशील ‘रेड ज़ोन’ को पार नहीं करते.

उल्लेखनीय है कि देश के मुख्य विपक्षी दल जैसे पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के खिलाफ जेयूआई-एफ के विरोध का समर्थन किया है, जिसने पिछले साल का आम चुनाव जीता था. प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान की लगातार बिगड़ती आर्थिक स्थिति और चुनावी धांधली इस आंदोलन के प्रमुख मुद्दे हैं. इसके अलावा अवामी नेशनल पार्टी और अन्य कई छोटे दल भी इस मुहिम में शामिल हैं. पाकिस्तान की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अनुसार, 25,000 से अधिक लोग JUI-F के इस मार्च में शामिल हैं.

विवाद में घिरा रहा मार्च
मार्च आखिरकार अपनी मंजिल तक पहुंचा, पर विवादों से उसका पीछा छूटता दिखाई नहीं देता. इस मार्च के इस्लामाबाद पहुंचने के पहले पीएमएल-एन नेताओं द्वारा दावा किया गया कि प्रदर्शन शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. यह बयान पीएमएल-एन के वरिष्ठ नेता अहसन इकबाल द्वारा जारी किया गया था, जो रहबर समिति के सदस्य भी हैं.

उनके दावों को पीएमएल-एन के नेताओं मरियम औरंगजेब और उज़मा बुखारी ने दोहराया. परंतु वहीं दूसरी ओर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में JUI-F से जुड़े मौलाना अब्दुल गफूर हैदरी ने कहा कि किसी भी कीमत पर रैली को स्थगित नहीं किया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘हमारे सभी लोग इस्लामाबाद की ओर बढ़ने लगे हैं. हम नहीं जानते कि हम उन्हें इस्लामाबाद में एक और दिन के लिए कैसे समायोजित कर पाएंगे.’

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आंदोलन की शुरुआत से ही विपक्षी दलों में मतभेद साफ दिखे हैं.


शुरुआत से ही नजर आए हैं मतभेद
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विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव इस आंदोलन के शुरू से ही दिखाई देता आया है. पाकिस्तान के राजनीतिक दल इमरान खान के सत्ता में आने को इलेक्शन से अधिक सिलेक्शन का विषय मानते हैं और इसके लिए पूरी तरह से सेना को श्रेय जाता है. यही विपक्षी दलों के विरोध का एक अहम मुद्दा है. लेकिन शुरुआत से अब तक इस आंदोलन के प्रति इन विपक्षी दलों के रुख में उतार-चढ़ाव आता रहा है.
पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन (पीएमएल-एन) ने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ (जेयूआई-एफ) के इस्लामाबाद में 'आज़ादी मार्च' रूपी सरकार विरोधी आंदोलन शुरू करने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति दे दी थी. लेकिन बुधवार को लाहौर में रैली के लिए पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन का कोई भी नेता नहीं पहुंचा, जिसने अनेक कयासों को जन्म दिया है.

वहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने शुरू में इस आंदोलन में किसी भी सहभागिता से साफ इनकार कर दिया था. हालांकि बिलावल ने भी सरकार की कश्मीर नीति की आलोचना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने निर्दोष कश्मीरियों की आवाज बनने की कोशिश नहीं की. उन्होंने कहा, ‘वह (इमरान) हर घोषणा पर यू-टर्न लेता है... न तो हम और न ही कोई अन्य पाकिस्तानी कश्मीर विवाद पर सरकार की अक्षमता को बर्दाश्त कर सकता है.’

हालांकि इसके बाद उनका दल भी इस मार्च में सक्रियता से शामिल हुआ. इसके अलावा, एक अन्य धार्मिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी (JI), जिसने मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल (MMA) की छतरी के नीचे JUI-F के साथ गठबंधन में पिछले साल के आम चुनाव लड़े, ने भी इस आंदोलन का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया.

इमरान खान का भारत कार्ड!
पाकिस्तान के शासक हमेशा ही उनके यहां होने वाली अव्यवस्था के लिए भारत को दोषी ठहराते आए हैं. आज़ादी मार्च में भी यही देखने को मिला. भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर में किए गए संविधान सम्मत परिवर्तनों की पाकिस्तान में गंभीर प्रतिक्रया देखी गई. शुरुआती दौर में पाकिस्तान की सभी राजनैतिक पार्टियों ने अनमने मन से सरकार के समर्थन की बात तो की पर जैसे ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान अलग-थलग पड़ने लगा तो विपक्षियों के असंतोष का लावा फूट पड़ा.

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इमरान खान ने इस आजादी मार्च के पीछे भारत का हाथ बताया


वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने दावा किया है कि उन्हें सेना का पूर्ण समर्थन हासिल है और वह इस्तीफे के लिए विपक्ष की मांग को पूरा नहीं करेंगे. उन्होंने आरोप लगाया कि जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फज़ल-उर-रहमान द्वारा बुलाए गए 'आजादी मार्च' के पीछे भारत का हाथ है. यह पूछे जाने पर कि क्या विदेशी एजेंडे का कोई सबूत मिला है, उन्होंने कहा कि कोई सबूत नहीं है, लेकिन मार्च का समय और क्षेत्रीय स्थिति बताती है कि इसके पीछे ‘भारतीय हाथ’ है.

उल्लेखनीय है इस आंदोलन के बैक फायर का फायदा उठाने की इमरान खान ने भी कोशिश की और सेना के साथ गठजोड़ द्वारा सत्ता प्राप्ति के आरोपों को मरोड़ते हुए राष्ट्रहित के लिए पाकिस्तान की सेना के समर्थन को आवश्यक बताया. उन्होंने यह भी कहा कि सेना सरकार के एजेंडे का पूरी तरह से समर्थन करती है. नागरिक-सैन्य संबंध विश्वास पर आधारित हैं और दोनों एक-दूसरे पर इस भरोसे का आनंद लेते हैं. इमरान ने मौलाना पर सीधे प्रश्न उठाया और कहा कि वह विपक्ष के एजेंडे को समझ नहीं पा रहे हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि महंगाई और बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जिसे उनकी सरकार सुलझाने की कोशिश कर रही है.

आंदोलन के निहित कारण
मौलाना फज़ल-उर-रहमान  का मानना है कि वर्तमान सरकार ने कश्मीर के प्रति गहन अकर्मण्यता का परिचय दिया है. मौलाना ने पीटीआई की अगुआई वाली सरकार पर कश्मीर को बेचने का आरोप लगाया और राष्ट्र से भारत के कब्जे वाले क्षेत्र की आजादी के लिए अपने संकल्प को ताजा करने को कहा. मौलाना ने पाकिस्तान की सरकार पर तंज़ कसते हुए कहा, ‘नकली सरकारें एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती हैं. पाकिस्तान के शासक कश्मीर के विक्रेता हैं और ऐसे शासकों को कश्मीरियों के सामने आने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए.’ उन्होंने कहा कि 5 अगस्त को नरेंद्र मोदी के कदम ने एक नए इंतिफादा को जन्म दिया है और ऐसे वक्त हमें ऐसा नेता मिला है, जिसके नेतृत्व पर पूरा देश शर्मिंदा है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की अगुआई वाली संघीय सरकार ने देश में कयामत बरपा रखी है और हमें इस देश के अस्तित्व के लिए लड़ना होगा.

मौलाना फज़ल-उर-रहमान के आंदोलन के निहितार्थ
मौलाना फज़ल-उर-रहमान जो कुछ कह रहे हैं वही पूर्ण सत्य है, ऐसा भी नहीं. पाकिस्तान की राजनीति में भारत का विरोध और कश्मीर एक कॉर्नर स्टोन की तरह है. सभी दल और नेता भारत विरोध के द्वारा अपनी छवि चमकाने का प्रयास करते ही हैं. वही मौलाना के साथ हो रहा है. आज मौलाना फज़ल-उर-रहमान के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.

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ऐसा भी नहीं कि मौलाना फज़ल-उर-रहमान जो कुछ कह रहे हैं वह पूरी तरह से सच है.


JUI-F का सरकार विरोधी आंदोलन शुरू करने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पीटीआई और इमरान खान की राजनीति ने धार्मिक दलों, खासकर JUI-F को नेशनल असेम्बली के चुनावों में अपूरणीय क्षति पहुंचाई है, जो कभी इसके गढ़ हुआ करते थे. 2018 के राष्ट्रीय चुनावों ने JUI-F को लगभग ख़त्म कर दिया और स्वयं फजलुर्रहमान की हार हुई. इसके साथ ही कश्मीर कमेटी के चेयरमैन की अपनी लंबे समय से कब्जे में रखी हुई पोजीशन को भी खो दिया.

फज़ल-उर-रहमान सत्ता के साथ चिपकने वाले नेता माने जाते हैं. 1990 के दशक की शुरुआत से JUI-F लगभग सभी सरकारों का हिस्सा रहा है, चाहे वह किसी भी दल की हो. उल्लेखनीय है कि JUI-F 2002-2007 तक बलूचिस्तान में पीएमएल-क्यू सरकार का भी हिस्सा थी, जब जनरल परवेज मुशर्रफ का सत्ता पर नियंत्रण था. यह इस तथ्य के बावजूद था कि उन दिनों छह कट्टरपंथी इस्लामिक धार्मिक दलों का गठबंधन, मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) का नेतृत्व जेयूआई-एफ ही कर रही थी जिसका मूल ही मुशर्रफ का विरोध था.

अब फज़ल-उर-रहमान ‘लोकतंत्र और संविधान की खातिर’ पीएमएल-एन और पीपीपी के साथ साथ धुर विरोधी और अधार्मिक अवामी नेशनल पार्टी का समर्थन करते हैं. आज JUI-F का मुख्य मकसद सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करना है. इसके लिए वह कुछ भी करने को तत्पर हैं और किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं, चाहे वह घोषित रूप से इस्लाम का शत्रु ही क्यूं न हो.

विकीलीक्स ने खुलासा किया था कि 2002 के चुनावों में एमएमए की अभूतपूर्व सफलता के बाद पाकिस्तान में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत ऐनी पैटरसन के साथ बैठक में मौलाना फज़ल-उर-रहमान ने उन्हें बताया कि वह वॉशिंगटन की हर इच्छापूर्ति के लिए तैयार हैं बशर्ते अमेरिका उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने में सहायता करे.

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बलूचिस्तान के पश्तून बहुल भाग के साथ खैबर पख्तूवनखवा और फाटा दोनों ही जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ के पारंपरिक गढ़ रहे हैं


पीएम खान की पार्टी ने खैबर पख्तूनखवा में जेयूआई-एफ को बुरी तरह से मात दी है. बलूचिस्तान के पश्तून बहुल भाग के साथ खैबर  पख्तूनखवा और फाटा दोनों ही JUI-F के पारंपरिक गढ़ रहे हैं. यहां बहुसंख्यक कबायली लोगों में शिक्षा का अभाव और वहां के अति-रुढ़िवादी मौलवियों का ज्यादा ही प्रभाव रहा है. JUI-F ने इन क्षेत्रों में अपने सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने में किया है. सत्ता से बाहर रहने से जेयूआई-एफ की हताशा में इजाफा हुआ है और इसलिए यह फिर से अपने प्रभाव में वृद्धि के लिए इस मौके को भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है.

पाकिस्तान की राजनीति की दशा और दिशा
आज पाकिस्तान की राजनीति गहन संकट में फंस गई है. एक तरफ कट्टरपंथी इस्लामिक धड़ा है जो देश को गर्त में ले जा रहा है. वहीं दूसरी ओर एक प्रगतिशील वर्ग भी है जो पाकिस्तान को इस दलदल से निकालकर विकास के पथ पर अग्रसर देखना चाहता है. सेना के अपने अलग हित हैं जिनका आम जनता के हितों से कोई सामंजस्य नहीं, बल्कि दुराव ही अधिक है. आज पाकिस्तान की राजनीति दिग्भ्रमित हो चुकी है. एक और जहां विकास की महती आवश्यकता है वहीं सेना और कट्टरपंथियों के प्रभाव में वह पीछे धकेलने वाली शक्तियों के प्रभाव से भी नहीं निकल पाती. सेना को इस्लामिक कट्टरपंथ पर टिके रहने के लिए इमरान खान जैसा कुशल अभिनेता, मोहरे के रूप में मिल चुका है. ऐसी स्थिति में वह फज़ल-उर-रहमान और उनके जैसे ब्रांडेड कट्टरपंथियों से दूरी बनाए हुए है. यही इमरान खान के सत्ता में बने रहने की वजह है. पर इस सबकी मार झेलने के लिए पाकिस्तान की आम जनता विवश है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: November 1, 2019, 5:23 PM IST
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