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नेपाल: PM केपी ओली को आखिर क्यों दिखाया गया अपनी ही पार्टी से बाहर का रास्ता?

प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (फ़ाइल फोटो)
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (फ़ाइल फोटो)

Nepal Crisis: नेपाल की राजनीति में एक बार फिर से अस्थिरता आ गई है. सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपनी ही पार्टी से बाहर क्यों निकाला गया. नेपाल में अब आगे क्या होगा?

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 25, 2021, 4:44 PM IST
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नई दिल्ली. नेपाल (Nepal) की राजनीति में उथल-पुथल लगातार जारी है. दिसंबर 2020 में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (PM KP Sharma Oli) ने संसद यानी प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया और मध्यावधि चुनावों की घोषणा कर दी. उन्होंने अपनी ही पार्टी के कई नेताओं पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया. ओली पर पार्टी के चेयरमैन पुष्प कमल दहल ने भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए थे. उन पर ये भी आरोप लगे हैं कि हाल के दिनों में उन्होंने अपने पुराने दोस्त भारत को छोड़ कर चीन (China) के साथ नजदीकियां बढ़ा लीं. रविवार को उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. इसके अलावा पार्टी ने केपी शर्मा ओली की सदस्यता को भी रद्द कर दिया.

ऐसे में नेपाल की राजनीति में एक बार फिर से अस्थिरता आ गई है. सवाल उठता है कि आखिर ओली को पार्टी से बाहर क्यों निकाला गया. नेपाल में अब क्या होगा? आइए इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.





कम्युनिस्ट पार्टी में दो फाड़
कम्युनिस्ट पार्टी अब बंट गई है. पार्टी में ओली के खिलाफ बगावत के सुर काफी समय से बुलंद हो रहे थे. एनसीपी के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने पिछले हफ्ते सरकार के खिलाफ एक रैली निकाली थी. इस दौरान उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अवैध तरीके से संसद को भंग किया और देश को मुश्किल हालात में डाल दिया. पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड ने कहा कि ओली ने न सिर्फ पार्टी के संविधान और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया, बल्कि नेपाल के संविधान की मर्यादा का भी उल्लंघन किया.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
संसद भंग होने के बाद से नेपाल में तूफान खड़ा हो गया है. संसद भंग होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में करीब एक दर्जन से ज्यादा लोगों ने अर्जियां लगाई हैं. इतना ही नहीं संसद भंग होने के बाद NCP में भी दो गुट बन गए और दोनों गुट खुद को असली 'पार्टी' बता रहा है. लिहाजा चुनाव चिह्न को लेकर भी लड़ाई शुरू हो गई है. कानून के जानकारों का कहना है कि ओली के फैसले पर फरवरी तक कोई फैसला आ सकता है. 300 से ज्यादा वकीलों ने इस केस की सुनवाई के लिए खुद को रजिस्टर कराया है.

ओली का विरोध
पिछले साल 29 दिसंबर को नेपाल में 25 हज़ार से ज्यादा लोगों ने ओली के ऑफिस के बाहर मार्च निकाला था. इसके अलवा देश के दूसरे हिस्सों में भी विरोध प्रदर्शन हुए थे. उस वक्त दहल ने कहा था कि ओली देश की शांति को भंग करना चाहते हैं.

आगे अब क्या होगा?
ओली के नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनवादी) को पुनर्जीवित करने की संभावना है जिसका तीन साल पहले नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनाने के लिए माओवादियों के साथ विलय कर दिया गया था. ऐसी खबरें हैं कि ओली नेपाली कांग्रेस से समर्थन लेकर सत्ता में बने रहेंगे.

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क्या कह रही हैं विपक्षी पार्टियां
विपक्षी नेपाली कांग्रेस को उम्मीद है कि उन्हें चुनाव में बड़ी जीत मिलेगी. लेकिन उन्हें इस बात का डर है कि अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में बारिश, विरोध और हिंसा का बहाना बना कर चुनाव को आगे बढ़ाया जा सकता है. नेपाली कांग्रेस केंद्रीय समिति के सदस्य शेखर कोइराला ने कहा, 'मुझे संदेह है कि चुनाव निर्धारित तारीखों पर होंगे.'



क्या कहना है नेपाली सेना का?
नेपाल सेना ने ये स्पष्ट कर दिया है कि वो मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम में तटस्थ रहेगी. लेकिन अगर पीएम ओली कानून और व्यवस्था बनाए रखने और विरोध प्रदर्शन करने के लिए सुरक्षा बलों की मदद से शासन करने की कोशिश करते हैं, तो ये देखना दिलचस्प होगा कि वहां की सेना क्या करती है.
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