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लॉकडाउन से नहीं यह शहर खुद बुनता है सन्‍नाटे का साम्राज्‍य, ठहर जाती है रफ्तार

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Updated: March 26, 2020, 2:18 PM IST
लॉकडाउन से नहीं यह शहर खुद बुनता है सन्‍नाटे का साम्राज्‍य, ठहर जाती है रफ्तार
बाली: जहां लॉकडाउन नहीं बल्कि एक त्योहार की वजह से 24 घंटे के लिए ठहर जाती है जिंदगी (Photo: alka kaushik)

ट्रैवेल ब्लॉगर अल्का कौशिक से जानिए बाली के मौन पर्व न्‍यपी के बारे में, जब पूरे 24 घंटे के लिए हर कोई चुप्‍पी का संसार अपने गिर्द बुनता है. यह लॉकडाउन नहीं बल्कि पर्व की वजह से होता है. क्या हम न्‍यपी का एक वर्जन हिंदुस्तान में भी मना सकते हैं?

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  • Last Updated: March 26, 2020, 2:18 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus Outbreak) से लड़ने के लिए कई देशों में लॉकडाउन (Lockdown) हो गया है. लोग अपने घरों में कैद हैं. इससे कुछ तकलीफें हैं तो उससे अधिक सुकून भी मिल रहा है. तो क्या सबकुछ सामान्य होने के बाद भी हम कभी एक-दो दिन के लिए सबकुछ बंद करने का कोई सिस्टम बना सकते हैं? इंडोनेशिया के सबसे शानदार और कल्चरल शहरों शामिल बाली में ऐसा ही कुछ होता है. इसकी वर्षों पुरानी रवायत है. जब पूरा बाली सन्‍नाटे का साम्राज्‍य बुनता है. न कोई खाता है न पकाता है और न बोलता है. न गाड़ियां चलती हैं और हवाई जहाज. पूरा शहर ठहर जाता है. न्‍यपी (Nyepi) नामक यह मौन पर्व बाली (Bali island) के लोगों के जीवन को कैसे नई ऊर्जा और रफ्तार देता है. ट्रैवेल ब्लॉगर अल्का कौशिक ने न्यूज18 हिंदी के साथ इसे लेकर अपने अनुभव साझा किए.

सबकुछ बंद रखने का अनोखा पर्व

मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में बाली द्वीप पर 83 फीसदी हिंदू बसते हैं, जबकि पूरे देश में हिंदू आबादी सिर्फ 1.7% है. नववर्ष शुरू होने पर बाली का हिंदू समुदाय न्‍यपी का अजब पर्व मनाता है. उस दिन पूरे 24 घंटे के लिए हर कोई चुप्‍पी का संसार अपने गिर्द बुनता है. पूरे बाली में जैसे हर शय ठहर जाती है. कोई कुछ नहीं बोलता, सिर्फ ध्‍यान गुनता है. न रसोई में कुछ पकता है न कारखाने ही चलते हैं. उपवास रखा जाता है. सड़कों पर आवाजाही बंद हो जाती है. रफ्तार ठहर जाती है. घरों से लेकर होटलों तक में बत्तियां नहीं जलतीं.

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यह वर्षों पुरानी रवायत है, जब पूरा बाली सन्‍नाटे का साम्राज्‍य बुनता है (Photo: alka kaushik)




और तो और पूरे 24 घंटे के लिए डेनपसार हवाई अड्डा पर भी चुप्‍पी पसर जाती है. हां, इमरजेंसी सेवाएं जारी रहती हैं, जरूरत हो तो आप अपने घरों के भीतर बत्‍ती जला सकते हैं, बस शर्त इतनी होती है कि रोशनी बाहर न झांके. लोग दिन भर मौन रखते हैं. आग और रोशनी कतई नहीं होती. घरों में खाना नहीं पकाया जाता. कोई यात्रा और मनोरंजन नहीं भी नहीं होता.

यही नहीं शहर में बसने वाले दूसरी आस्‍थाओं जैसे मुस्लिम और इसाई धर्म के लोग अपने हिंदू हमवतनों की इस परंपरा का पूरा सम्‍मान करते हैं. इसलिए मैं हमेशा से बाली के सफर पर जाना चाहती हूं वो भी न्‍यपी के मौके पर.

पालन करवाने के लिए कम्युनिटी पुलिस

कौशिक कहती हैं कि चुप्‍पी के इस पर्व का पालन करवाने के लिए कम्‍युनिटी पुलिस (Pacalang) मुस्‍तैद रहती है. ताकि समुद्रतटों से लेकर सड़कों तक पर शांति बनी रहे.

आत्मावलोकन का दिन

कौशिक कहती हैं कि यह निराला पर्व हमारे आत्मावलोकन का दिन होता है. जब लोगों को जिंदगी की भागदौड़ से कुछ वक्त का विश्राम मिलता है. वाणी को आराम मिलता है. प्रकृति को सुकून मिलता है. यह पर्व दरअसल, शुद्धता को धारण करने का अवसर लेकर आता है. लोगों का मानना है कि न्यपी समूचे संसार और आत्मा की शुद्धिकरण का पर्व है. मस्तिष्‍क, वाणी, पेट को डिटॉक्‍स करने का दिन. यह थम जाना दरअसल थम जाना नहीं बल्कि को आगे के जीवन को ऊर्जावान बनाए रखने और उसे रफ्तार व दिशा देने का अवसर होता है.

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हम न्‍यपी का एक वर्जन हिंदुस्तान में भी मना सकते हैं. जिसमें 24 घंटे के लिए सबकुछ बंद रखकर प्रकृति को उसका दिया हुआ लौटाएं. इससे हम संक्रमण वाली बीमारियों से बच सकते हैं. इससे जीवन में नई ऊर्जा का संचार होगा.

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First published: March 26, 2020, 2:16 PM IST
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