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ANALYSIS: आखिर कहां हैं पाकिस्तान में विरोध की आवाज के तौर पर मशहूर गुलालाई इस्माइल

इस्माइल ने पाकिस्तान के अंदर जबरन विवाह, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध सैन्य बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की.

इस्माइल ने पाकिस्तान के अंदर जबरन विवाह, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध सैन्य बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की.

इस्माइल ने पाकिस्तान के अंदर जबरन विवाह, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध सैन्य बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की.

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आज 21वीं सदी में एक ऐसा भी देश है, जो महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक समझता है. कई इलाकों में तो उन्हें जीवन जीने की मानवोचित दशाएं भी उपलब्ध नहीं कराता, क्योंकि कहीं न कहीं पाकिस्तान का रुढ़िवादी और सामन्ती ढर्रे पर चलने वाला सामाजिक नेतृत्व इसे पसंद नहीं करता. यही नेतृत्व है, जो अपने देश की सेना और कट्टरपंथियों का घनिष्ठ सहयोगी है, जिनका सामना करने में पाकिस्तान की सरकारें स्वयं को सदैव असहाय ही महसूस करती आई हैं.

विडंबना यह है कि जब कोई उनके हक में आवाज उठाता है तो अक्सर यह आवाज दबा दी जाती है. इस दमन के भुक्तभोगियों में सआदत हसन मंटो और फैज़ अहमद फैज़ से लेकर हबीब जालिब और मलाला युसुफजई तक एक लम्बी श्रृंखला रही है जिसमें एक नया नाम गुलालाई इस्माइल का है.

कौन हैं गुलालाई इस्माइल?
गुलालाई इस्माइल पाकिस्तान की प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो विशेषकर महिला अधिकार के लिए आवाज उठाती आई हैं, जो पाकिस्तान में एक टैबू ही माना जाता रहा है. इस्माइल ने पाकिस्तान के अंदर जबरन विवाह, सामूहिक बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध सैन्य बलों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की.

गुलालाई जब मात्र 16 वर्ष की थीं, तब 2002 में अपनी छोटी बहन सबा के साथ मिलकर एक गैर सरकारी संस्था अवेयर गर्ल्स की स्थापना की, जो मानवाधिकार के क्षेत्र में ख्यातिलब्ध नाम है. उनके शानदार काम ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई और विश्व भर में उन्हें सम्मानित किया गया. फॉरेन पालिसी पत्रिका ने 2013 में उन्हें विश्व की 100 प्रमुख विचारकों की सूची में स्थान दिया. इस्माइल को 2015 के एशिया रीजन कॉमनवेल्थ यूथ अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन डेवलपमेंट वर्क, 2016 में शिराक़ प्राइज फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ कनफ्लिक्ट और 2017 में, अन्ना पोलितकोवस्काया पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
इस्माइल पर आरोप क्या हैं!

प्रतीकात्मक तस्वीर


महिलाओं के हक की आवाज उठाने वाली यह महिला पाकिस्तान में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. बताया जा रहा है कि पिछले दो महीनों से उनका कोई अता-पता नहीं है. जुलाई के मध्य में खैबर पख्तूनख्वा काउंटर-टेररिज्म डिपार्टमेंट (CTD) ने इस्माइल और उसके माता-पिता पर आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण का आरोप लगाया. पेशावर की आतंकवाद विरोधी अदालत में अन्य सहायक दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत पहली सूचना रिपोर्ट के अनुसार, CTD पेशावर ने दावा किया कि इस्माइल, जो दो एनजीओ अवेयर गर्ल्स और सीड्स फॉर पीस की चेयरपर्सन है, की गतिविधियों से पाकिस्तान की सुरक्षा को ख़तरा उत्पन्न हो गया है.

इससे पहले दिसंबर, 2018 में एंटी-टेररिज्म एक्ट (एटीए) 1997 की धारा 11-एन के तहत गुलालाई इस्माइल पर इसी तरह का एक अन्य मामला दर्ज किया गया था, जो आतंक के वित्तपोषण से संबंधित अपराधों से जुड़ा है. CTD ने गुलालाई के माता-पिता, इस्माइल और उसकी पत्नी उज़लिफ़त इस्माइल पर भी गंभीर आरोप लगाए, जो खैबर पख्तूनख्वा के स्वाबी जिले के निवासी हैं. इसमें कहा गया कि भारत सहित अनेक देशों से उनके बैंक खातों में बड़े पैमाने पर अवैध लेन-देन होते थे और उनका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जाता था.

इसके साथ ही अपनी रिपोर्ट में, CTD ने दावा किया कि आरोपी गुलालाई इस्माइल, जो पश्तून तहफुज़ मूवमेंट (PTM) की एक कार्यकर्ता भी है, ने विदेशों से अपने एनजीओ के नाम पर बड़ी धनराशि प्राप्त की. फिर एक आतंकवादी संगठन की सहायता के लिए इस धन का इस्तेमाल किया. रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि अभियुक्तों की इन गतिविधियों ने पाकिस्तान की प्रतिष्ठा का भी बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई है. उल्लेखनीय है सीटीडी ने गैर-सरकारी संगठनों और व्यक्तियों द्वारा संदिग्ध लेनदेन की जांच के लिए पिछले साल एक आतंकवाद-रोधी वित्त इकाई की स्थापना की थी.

पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट से निकटता
गुलालाई इस्माइल पर उनकी पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट के साथ घनिष्ठता को लेकर भी निशाना साधा जा रहा था. PTM अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा के पास कबाइली क्षेत्र में पाकिस्तान के सैन्य बलों की कार्रवाइयों में बड़े पैमाने पर किए अत्याचारों के लिए जवाबदेही की मांग करते हुए एक साल से अधिक समय से विरोध प्रदर्शन कर रहा है. लेकिन, उनकी मांगों को सुनने के बजाय, सेना और सरकार दोनों ने इस आंदोलन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. मीडिया को उनके किसी भी विरोध प्रदर्शन को कवर नहीं करने के लिए दबाब डाला जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर


PTM नेताओं को अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया है. इस आंदोलन से जुड़े दो सांसदों, मोहसिन डावर और अली वज़ीर को हाल ही में एक सैन्य चेक पोस्ट पर हमला करने के आरोप में कैद किया गया था. जबकि इस घटना के वीडियो साक्ष्य से स्पष्ट हो गया है कि सैनिकों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों के साथ गुज़र रहे इन नेताओं पर गोलियां बरसाईं.

सेना के साथ संघर्ष
अब गुलालाई का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उन्होंने पाकिस्तान की सर्वशक्तिमान सेना को चुनौती दी है जो पाकिस्तान में एक अत्यंत विरल घटना है. इस्माइल पिछले कुछ समय से महिलाओं के खिलाफ पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर करती आ रही हैं.
इस वर्ष के आरम्भ में जनवरी में, उन्होंने अपने फेसबुक और ट्विटर अकाउंट के द्वारा सार्वजनिक रूप से आरोप लगाए थे कि पाकिस्तान के सैन्यबलों के सदस्य कई पश्तून महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन शोषण की घटनाओं में संलिप्त रहे हैं. इसी वर्ष मई माह में उसने 10 साल की एक लड़की के साथ बलात्कार और हत्या की घटना का जोरदार विरोध किया था.

गुलालाई इस्माइल जिस मुद्दे को उठा रही थी, उसी विषय पर जून माह के प्रारंभ में बीबीसी ने एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी. ‘Uncovering Pakistan's secret human rights abuses’ शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया कि आतंक के खिलाफ युद्ध के दौरान दस हजार लोग मारे गए हैं. उनमें से कई सैनिकों और विद्रोहियों द्वारा मारे गए और उनके हाथों अत्याचार का शिकार हुए.

लगातार दबाई जाती रही हैं विरोध की आवाजें
इस बीच लगातार ऐसी अफवाहें सामने आती रहती हैं कि उन्हें देखा गया या गिरफ्तार किया गया था. परन्तु पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि वे हिरासत में नहीं हैं और वह लगातार उनकी तलाश कर रहे हैं. परन्तु पाकिस्तान के लिए ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं. यहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बलपूर्वक अपहरण और गायब कर देने के अनेक मामले सामने आते रहते हैं. अभी कुछ दिनों पूर्व गुल बुखारी, कदाफी ज़मान जैसे अनेक पत्रकारों को सेना के हाथों गंभीर रूप से प्रताड़ित होना पड़ा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर


यहां जिन अधिकारों का संरक्षण और परिरक्षण राज्य को करना चाहए था, वह अपनी भूमिका को नहीं निभा पा रहा है. जब उसे इनके बारे में स्मरण कराया जाता तो वही राज्य एक शत्रु की भूमिका में आ जाता है, जैसा गुलालाई इस्माइल के मामले में हुआ. परन्तु यह व्यवहार अनोखा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि पाकिस्तान में इसकी एक लम्बी परम्परा है.

जो भी तत्व “The Establishment” के रास्ते में आने की कोशिश भी करता है, उसे रास्ते से हटाने के पुरजोर प्रयास किए जाते हैं. अक्सर ये प्रयास सफल भी होते हैं. इस्माइल के मामले से यह स्पष्ट पता चलता है कि पाकिस्तान एक आभासी लोकतंत्र है जहां इसकी विधायिका हो अथवा कार्यपालिका, ये गहरे डर में रहते हैं जैसे 1958, 1977 और 1999 की घटनाएं अभी कल ही की बात हैं.

पिछले महीने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की बैठक के बाद पाकिस्तान पर आतंकी समूहों के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए दबाव बढ़ा है. पाकिस्तान ने कुछ आतंकी सरगनाओं और कट्टरपंथियों की गिरफ्तारी कर भारत के साथ तनाव को कम करने की कोशिश भी की है. परन्तु इसकी आड़ में वह अपने राह के कांटों को हटाने की व्यवस्था करने में लगा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि पाकिस्तान आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग राजनीतिक मांगों के लिए किए जा रहे शांतपूर्ण प्रदर्शनों के विरुद्ध भी करता आया है.

इस्माइल के साथ हो रहे इस समस्त घटनाक्रम पर पाकिस्तान में एक बड़े वर्ग का मानना है कि वह जो कह रही हैं वह कठोर परन्तु सत्य है. इस मामले में कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और सरकारें भी प्रयासरत हैं. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने के लिए पिछले सप्ताह होने वाली इमरान खान की अमेरिका यात्रा से पहले, अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों ने गुललाई के मामले पर और अधिक प्रकाश डालने के लिए एक पत्र पर हस्ताक्षर किए जो कहता है- ‘यह पत्र पाकिस्तान में शांतिदूतों और मानवाधिकार रक्षकों पर बढ़ती हिंसा पर चिंता व्यक्त करता है, विशेष रूप से अवेयर गर्ल्स की सह-संस्थापक और एफएपी सदस्य गुलालाई इस्माइल के मामले में.’

प्रतीकात्मक तस्वीर


पहले भी प्रताड़ित किया जाता रहा है गुलालाई को
यह पहली बार नहीं था जब अधिकारियों द्वारा गुलालाई इस्माइल को प्रताड़ित किया गया हो. 2017 और 2018 में कट्टरपंथियों सेना और सरकार द्वारा उन्हें लक्षित किया गया था. पिछले साल पाकिस्तान की सरकार ने गुलालाई की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध तक लगा दिया था. पाकिस्तान 2017 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के लिए चुना गया था, परन्तु अपने चरित्र के अनुरूप गंभीर मानवाधिकार स्थितियों पर एक मजबूत रुख अपनाने में सदैव विफल रहा है.

जहां पाकिस्तान के अन्दर महिलाओं, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं आम हो गई हैं. धार्मिक अल्पसंख्यक जैसे अहमदिया, जिकरी, हज़ारा हिन्दू और क्रिस्चियन बदहाल जीवन जीने को विवश हैं परन्तु पाकिस्तान उसे लगातार नजरअंदाज करता आया है. वहीँ दूसरी ओर सितंबर 2017 में, इसने म्यांमार की सेना द्वारा रोहिंग्याओं के खिलाफ जातीय हिंसा अभियान के बारे में चिंताओं को व्यक्त करने में परिषद में इस्लामिक सहयोग संगठन के सदस्य देशों का नेतृत्व किया. यह पाकिस्तान की रीति और नीति में निहित द्वंद्व को प्रकट करता है. इसी तरह के हालात की वजह से 1971 में पृथक बांग्लादेश का जन्म हुआ था.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं )

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