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बुजुर्गों से पहले बच्चों को वैक्सीन देने की बात क्यों कर रहे हैं चीनी वैज्ञानिक? जानें कारण

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

New Study: इस स्टडी से मिली जानकारी के आधार पर रिसर्चर्स ने कहा कि भले ही बच्चों को कोरोना वायरस (Corona Virus) की चपेट में आने का खतरा कम है, लेकिन बुजुर्गों के मुकाबले ये ज्यादा तेजी से वायरस फैला सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2021, 12:33 PM IST
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बीजिंग. भारत (India) के अलावा कई अन्य देशों में भी वैक्सीन प्रोग्राम (Vaccination) शुरू हो गया है. लगभग हर जगह यह काम अलग-अलग चरणों में किया जा रहा है. खास बात है कि कई जगह वैक्सीन लगाने के मामले में स्वास्थ्य कर्मियों के बाद बुजुर्गों और बीमार लोगों को तरजीह देने की बात कही जा रही है. लेकिन वुहान के शोधकर्ताओं ने इस बात पर संदेह जताया है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को भी पहले वैक्सीन दी जानी चाहिए, क्योंकि वे बुजुर्गों से ज्यादा तेजी से वायरस फैला सकते हैं.

द लैंसेट में प्रकाशित स्टडी में दावा किया गया है कि बच्चे वायरस को काफी तेजी से फैला सकते हैं. इस स्टडी में शामिल 20 हजार से ज्यादा परिवारों पर की गई है. जिसमें वुहान सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानि सीडीसी की तरफ से पुष्टि किए गए कोरोना के लक्षण और एसिम्प्टोमैटिक लोगों को शामिल किया गया था. शोधकर्ताओं की मकसद इस स्टडी के जरिए यह जानना था कि घरों में SARS-CoV-2 फैलाने का खतरा किससे सबसे ज्यादा हो सकता है.

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वहीं, इस स्टडी से मिली जानकारी के आधार पर रिसर्चर्स ने कहा कि भले ही बच्चों को कोरोना वायरस की चपेट में आने का खतरा कम है, लेकिन बुजुर्गों के मुकाबले ये ज्यादा तेजी से वायरस फैला सकते हैं. ऐसे में पात्र बच्चों और उनकी देखभाल करने वालों को पहले वैक्सीन दी जानी चाहिए. चूंकि बच्चे वायरस को ज्यादा तेजी से फैला सकते हैं, इसी के चलते जानकारों ने स्कूलों को दोबारा खोले जाने को लेकर भी चिंता जताई है.

स्टडी में पता चला कि प्री सिम्प्टोमैटिक मरीज ज्यादा संक्रामक होते हैं. जबकि, सिम्पटम्स वाले व्यक्ति के मुकाबले एसिम्प्टोमैटिक कम संक्रामक होते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन्क्यूबेशन पीरियड के दौरान लक्षण नजर आने वाले लोग ज्यादा संक्रामक होते हैं. स्टडी के मुताबिक, बच्चों और किशोर बड़ी उम्र के लोगों की तरह ही कोरोना के लक्षणों का सामना करते हैं, लेकिन उनमें गंभीर बीमारी की चपेट में आने की संभावना कम ही होती है.
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