OPINION: क्या चीन के हित साधने के लिए प्रदूषण का केंद्र बन रहा है पाकिस्तान?

चीन की तरफ झुकने की बजाय क्या पाकिस्तान को नवीकरणीय ऊर्जा की ओर नहीं चाहिए, जो हर तरह से व्यवहारिक है?

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Updated: July 8, 2019, 6:14 PM IST
OPINION: क्या चीन के हित साधने के लिए प्रदूषण का केंद्र बन रहा है पाकिस्तान?
पाकिस्तान के इसके बजाय नवीकरणीय ऊर्जा साधनों की ओर जा सकता है जो हर तरह से व्यवहारिक भी है. REUTERS/Amit Dave (
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Updated: July 8, 2019, 6:14 PM IST
संतोष के.वर्मा

आज विश्व ग्लोबल वार्मिंग के खतरों का सामना कर रहा है और दुनिया भर में ऐसे उपाय अपनाने के प्रयास चल रहे हैं जिनसे इस खतरे को कम से कम किया जा सके. आज तापमान बढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका हाइड्रोकार्बनस का विवेकहीन तरीके से इस्तेमाल की है. आज विश्व में विकास के साथ ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढती जा रही है और ऊर्जा के लिए आज भी सबसे ज्यादा जीवाश्म ईंधन ही इस्तेमाल किये जा रहे हैं. परन्तु अब पर्यावरण के प्रति अनुकूलता रखने वाले ऊर्जा के नवीनीकृत स्त्रोतों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है जो इस प्रकार के खतरों से रहित हैं.

परन्तु पाकिस्तान इस मामले में प्रगतिशील रवैया अपनाने के बजाय प्रतिगामी नीतियाँ अपना रहा हैं. वर्तमान में, पाकिस्तान में उत्पादित बिजली का 60 प्रतिशत से अधिक जीवाश्म ईंधन,गैस,कोयले और फर्नेस आयल से आता है, और इसका अनुपात कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहा है. और अब पाकिस्तान की सरकार चीन द्वारा वित्तपोषित कोयला आधारित तापविद्युत परियोजनाओं द्वारा विद्युत् उत्पादन करने जा रही है,जो समस्याओं को और भी जटिल बना सकता है.

पाकिस्तान एक एसा देश है जो बिजली की कमी से लगातार जूझता रहा है. कराची लाहौर और इस्लामाबाद जैसे महानगरों में बड़े पैमाने पर बिजली की कटौती एक आम बात है. 2014 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने शी जिन पिंग के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल होने का फैसला किया तो सड़कों और बंदरगाहों के विकास साथ साथ बिजली की कमी से निपटने की इच्छा भी सम्मिलित थी.

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और अब चीन, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के अंतर्गत 21 ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश कर रहा है. इस निवेश का अधिकांश हिस्सा कोयले द्वारा चालित बिजली परियोजनाओं में लगाया जा रहा है. 13.8 गीगावॉट की कुल क्षमता का 70 प्रतिशत बिजली परियोजनाएं ऐसी हैं जिनका परिचालन कोयले से होना है. सामान्यत: कोयले पर आधारित परियोजनाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण खोजना मुश्किल काम होता है, परन्तु यहाँ चीन निवेश करने को सहर्ष तत्पर था.

चीन के निहित स्वार्थ
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चीन एक तरफ अपने देश में ने जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है वहीँ दूसरी ओर वह अन्य देशों को पर्यावरण प्रदूषण के गर्त में धकेल रहा है. इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस के अनुसार, पिछले साल चीन के बाहर 399 गीगावाट स्थापित क्षमता वाली कोयले से चलने वाली विद्युत् उत्पादन क्षमता के विकास में से लगभग एक चौथाई चीनी वित्तीय संस्थानों और निगमों द्वारा समर्थित था. 2014-17 के दौरान, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के अंतर्गत आने वाले देशों में बिजली परियोजनाओं के लिए सिंडिकेटेड ऋणों में 25.7 अरब डॉलर के ऋण प्रदान किये गए, जिनमे चाइना डेवलपमेंट बैंक और चाइना एक्जिम बैंक सहित छह चीनी बैंकों ने भाग लिया, जिनमे कोयले से चलने वाली परियोजनाओं के लिए 10 अरब डॉलर अथवा 40 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया गया . इससे पता चलता है कि चीन दुनिया भर में कोयले पर आधारित परियोजनाओं के लिए कितनी बड़ी मात्रा में धनराशि उपलब्ध करा रहा है.



फाइनेंसियल टाइम्स के अनुसार पिछले तीन वर्षों में जिन चार बैंकों ने कोयला खनन और कोयला आधारित बिजली कंपनियों के लिए सबसे अधिक वित्तपोषण प्रदान किया है वे सभी चीनी हैं, जिनमें बैंक ऑफ चाइना और चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक शामिल हैं. जर्मन उरगेवल्ड समूह के अनुसार, दुनिया के दो सबसे बड़े कोयला आधारित संयत्रों के निर्माता चीन के नेशनल एनर्जी इन्वेस्टमेंट ग्रुप और चाइना हुआडियान कारपोरेशन हैं.

ये सब तथ्य इस बात को रेखांकित करते हैं कि कैसे चीन ने कोयला उत्पादन, कोयला आधारित ताप विद्युत् संयंत्रों के निर्माण और इन परियोजनों के वित्तीयन का सकेन्द्रण अपने पक्ष में कर लिया है और दुनिया भर में इन गतिविधियों से न केवल आर्थिक बल्कि लम्बे समय में राजनैतिक और सामरिक लाभ अर्जित करना चाहता है.

पाकिस्तान की विवशताएँ

जहाँ एक ओर चीन के अपने स्वार्थ हैं वहीँ दूसरी ओर पाकिस्तान के पास विवशताओं का अम्बार. सर्वप्रथम पाकिस्तान के पास आर्थिक संसाधनों की अत्यंत कमी है, और वहीँ ऊर्जा परियोजनाओं की उसे सर्वाधिक आवश्यकता है. ऐसी स्थिति में उसे बड़े पैमाने पर ऋण पाना आसान नहीं होता. दूसरी ओर चीन जो चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है उसकी ऊर्जा परियोजनाओं का वित्तीयन करने को तैयार हो गया.

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परन्तु जब चीन पाकिस्तान से बड़ी मात्रा में वित्त प्राप्त कर रहा है तो ऐसी स्थिति में उसका चीन की कुछ शर्तों को मानना भी स्वाभाविक ही है. चीन जो स्वयं अपनी भूमि पर इस तरह की परियोजनाओं से दूर रहा रहा है पर पाकिस्तान जैसे देशों को वह अपनी इस अप्रचलित तकनीकी खपाने में बड़ी सहायता मिलती है. एक चीनी एनजीओ ग्रीनोवेशन हब की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चीनी वित्तपोषित कोयला संयंत्रों ने पाकिस्तान को एक उच्च उत्सर्जन मार्ग पर धकेल दिया है.



चीन का ऐसा मंतव्य भी है कि पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाली इस तकनीकी के इस्तेमाल से पाकिस्तान प्रदूषण सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय मानकों को पूरा करने मे असफल हो जाएगा ऐसी स्थिति में भविष्य में उसे विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष समेत ऐसे अंतराष्ट्रीय संस्थानों से वित्तीय सहायता और ऋण प्राप्त करने में भारी अडचनों का सामना करना पड़ सकता है.

ऐसी स्थिति में चीन और उसके वित्तीय संस्थान ही होंगे जो पाकिस्तान को मनमानी शर्तों पर यह उपलब्ध कराएँगे. इसके साथ ही साथ पाकिस्तान अब तक बिजली उत्पादन के लिए गैस आधारित ऊर्जा संयत्रों पर निर्भर था जो बलूचिस्तान के सुई गैस फील्ड और क़तर से आयात के द्वारा प्राप्त होती है. परन्तु पाकिस्तान के पास थार क्षेत्र में एक विशाल कोयला भण्डार है. और पाकिस्तान का मानना है कि इसका इस्तेमाल अपनी बिजली उत्पादन करने के लिए कर सकता है.

परियोजनाओं का भविष्य

परन्तु पाकिस्तान की ये कोयला आधारित परियोजनाएं सफल रही हों ऐसा भी नहीं है. इनमे से कई शुरू होने के कुछ समय बाद ही बंद होने के कगार पर आ खड़ी हुई हैं. अप्रैल में, पंजाब प्रांत के साहिवाल में 1,320MW क्षमता का कोयला आधारित बिजली संयंत्र, जो CPEC के तहत पहली ऊर्जा परियोजना के रूप में चीन की हुआनेंग शेडोंग रुई समूह द्वारा विकसित किया गया है, बंद होने कगार पर है क्योंकि सरकार डेवलपर को 13 करोड़ डॉलर का भुगतान करने में असमर्थ रही.

इसी प्रकार मई में, कराची में 1,320 मेगावाट क्षमता का पोर्ट कासिम पावर प्लांट, जो कि चीन की पावरचाइना और कतर की अल मिराकब कैपिटल द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया था, बढ़ते कर्ज और आयातित कोयले की बढ़ती लागत के कारण परिचालन शुरू होने के ठीक एक साल बाद भी वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहा है और इसके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. यह उल्लेखनीय है कि इन संयंत्रों के रख रखाव पर आने वाली लागत बहुत ज्यादा है और CPEC के अंतर्गत किये गए समझौतों के तहत सरकार हर महीने एक निश्चित राशि का भुगतान करती है जो कि उनकी स्थापित क्षमता के आधार पर होती है बजाय इसके कि कितनी मात्रा में बिजली का उत्पादन हुआ.

दुर्दशा के बावजूद इसका प्रयोग जारी

परन्तु इस दुर्दशा के बावजूद इसका प्रयोग जारी है. आयातित कोयले का उपयोग करने वाले दो और संयंत्र 2019 में भी आ रहे हैं. बलूचिस्तान प्रांत के हब में चीन पावर हब जेनरेशन कंपनी का 1,320 मेगावाट क्षमता का कोयला आधारित संयंत्र इस साल अगस्त तक वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर देगा. 1,320 मेगावाट का एक और संयंत्र सिंध में जमशोरो में स्थापित किया जा रहा है, जिसमें 80 प्रतिशत आयातित कोयला और 20 प्रतिशत स्थानीय स्तर पर उत्पादित थार लिग्नाइट का प्रयोग किया जाएगा .



इसके अलावा, दो और 330 मेगावाट क्षमता के कोयला आधारित संयंत्र थार ब्लॉक II में एंग्रो पावरगेन थार और चाइना मशीनरी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन द्वारा जो स्वदेशी कोयले के उपयोग पर आधारित हैं, विकसित किये जा रहे है . उल्लेखनीय है दुनिया में सबसे बड़े अप्रयुक्त कोयले के भंडार में से एक है और यहाँ का कोयला आयातित कोयले से काफी हद तक सस्ता हो सकता है. परन्तु यह कोयले कई प्रकार की अशुद्धियों से युक्त है और इसकी ऊर्जा क्षमता भी अत्यंत कम है जिसके कारण बिजली उत्पादन के अनुपात में अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है. तो इस प्रकार उसके पास आयातित कोयले पर निर्भर रहने के लावा कोई विकल्प नहीं है, जो किसी भी दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता.

पाकिस्तान के नेताओं की शह पर ....

अब तक इस सारे मामले के केंद्र में चीनी विशेषज्ञता और प्रौद्योगिकी का उपयोग, चीनी वित्त के द्वारा करने की योजना ही काम कर रही है और पाकिस्तान के नेताओं की शह पर देश हितों की सरासर अनदेखी की गई. परन्तु अब पाकिस्तान में भी, इन परियोजनाओं का भविष्य विवादों के घेरे में है. वर्तमान में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को भारी वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, और पाकिस्तान की सरकार ने इस वर्ष जनवरी में इस तरह की 2 अरब डॉलर की परियोजनाओं के कार्यान्वयन से इन्कार कर दिया है.

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पाकिस्तान के इसके बजाय नवीकरणीय ऊर्जा साधनों की ओर जा सकता है जो हर तरह से व्यवहारिक भी है. इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (IRENA) का अनुमान है कि 2020 तक नवीकरणीय ऊर्जा की कीमतें, जीवाश्म ईंधन की तुलना में वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी होगी और इस्लामाबाद भी पाकिस्तान की बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना को अपना रहा है. अगर ऐसा होता है तो पाकिस्तान की आर्थिक और राजनैतिक स्थिति के साथ साथ क्षेत्र के पर्यावरण के लिए भी अच्छा होगा.

REUTERS/Thomas Peter/Pool


(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी विचार हैं )

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First published: July 8, 2019, 4:48 PM IST
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