Analysis: क्यों बदतर होती जा रही है पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति?

Analysis: क्यों बदतर होती जा रही है पाकिस्तान में महिलाओं की स्थिति?
अपने हक के लिए पाकिस्तानी महिलाएं काफी समय से प्रदर्शन कर रही हैं. यह तस्वीर भी लाहौर में किए गए महिलाओं के प्रदर्शन की है.

आज पाकिस्तान में महिलाएं दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीवन यापन को अभिशप्त हैं. केंद्र और राज्यों में इस बड़ी ‘राजनैतिक सहभागिता’ के बावजूद महिलाएं, महिलाओं की दशा सुधारने के लिए नीतियां और कार्यक्रम तक बना पाने से भी वंचित हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 15, 2019, 4:33 PM IST
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यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं कि अगर आज हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं तो विज्ञान और तकनीकी से लेकर जीवन के हर पहलू का विकास आप तक पहुंच ही गया होगा. विश्व के अनेक हिस्से ऐसे हैं जो आज भी ‘मध्यकालीन दुर्दशा’ के शिकार हैं. अगर हम पाकिस्तान की बात करें तो वह इसका एक उपयुक्त उदाहरण है. पाकिस्तान को अस्तित्व में आए सात दशकों से ज्यादा समय हो चुका है परन्तु यह विकास की राह में रोड़े अटकाने वाले दकियानूसी तंत्र को अब तक छोड़ नहीं पाया है. इसके कारण इसकी बहुसंख्यक जनता का, जो मुश्किल से अपना जीवन यापन कर पा रही है, जीवन नर्क बन चुका है. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और धार्मिक अल्पसंख्यक भी हैं.

पाकिस्तान में महिलाओं की नारकीय स्थिति इसका जीता-जागता उदाहरण है. अब यह दुर्दशा एक अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती जा रही है. अगस्त के पहले सप्ताह में वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पुत्री और सलाहकार इवान्का ट्रम्प ने पाकिस्तान में महिला सशक्तिकरण पर आयोजित एक कार्यक्रम में, पाकिस्तान में महिलाओं की दशा सुधारने और उसके लिए उपयुक्त क़दमों पर जोर दिया.

पाकिस्तान : ग्लोबल जेंडर गैप के आंकड़े
हम पाकिस्तान सरकार के आधिकारिक आंकड़ों पर ही विश्वास करें तो भी महिलाओं की दुर्दशा का हाल ज्ञात हो ही जाता है. पाकिस्तान की जनगणना रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्तमान में पाकिस्तान वैश्विक आबादी में 2.6 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ दुनिया का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला देश है. यदि हम लिंग के आधार पर जनसंख्या का वर्गीकरण करें तो इस जनसंख्या का लगभग 49.2 फीसदी महिलायें हैं. लेकिन पाकिस्तान के कुल श्रम शक्ति में महिलाओं की सहभागिता केवल 22 प्रतिशत है, जो उनकी तुलनात्मक आर्थिक निर्भरता को दिखाती है.
समय-समय पर विभिन्न सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों से हमें पाकिस्तान की महिलाओं की दशा का ज्ञान होता है. दिसम्बर 2018 में विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट एक ऐसा ही दस्तावेज है जो पाकिस्तान में महिलाओं की दशा के विषय में महत्वपूर्ण खुलासे करता है. यह रिपोर्ट 149 देशों को चार विषयगत आयामों में लैंगिक समानता की दिशा में उनकी प्रगति के बारे में बताती है: ये हैं - आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा की उपलब्धता, स्वास्थ्य और जीने के अनुकूल स्थितियां और राजनीतिक सशक्तीकरण.




इसके अलावा, इस वर्ष के संस्करण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संबंधित लिंग अंतराल का भी अध्ययन किया गया है. पाकिस्तान, विशेष रूप से, इन सभी आयामों में सबसे निचले पायदान पर रहा है. इसने 149 देशों की सूची में 148वां स्थान प्राप्त किया है. राजनीतिक सशक्तीकरण को छोड़कर में इसे 97वां स्थान दिया गया है. लैंगिक समानता में तो यह विश्व के दूसरे सबसे खराब देश के रूप में सामने आता है. यहां तक कि सीरिया जैसे देश से भी पीछे है. इसके पीछे एकमात्र देश है, युद्ध-ग्रस्त यमन. साथ ही साथ, यह दक्षिण एशिया में सबसे निचले पायदान पर है. यहां तक कि भूटान जैसे आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर देश की तुलना में भी.

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पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी इमरान खान महिलाओं के अधिकारों के लिए कुछ खास नहीं कर पाए हैं.


दुर्दशा का कारण
इतने बड़े अनुपात में महिलाओं के होने के बाद भी, देश में महिलाओं की स्थिति क्या है? पाकिस्तान की स्थिति से स्पष्ट है कि यह अपनी महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता. इसका कारण उन परंपराओं को माना जा सकता है, जिन्हें इस देश ने अपनी विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक स्थितियों के कारण प्राप्त किया है. इनमें से एक स्थापित सत्य यह है कि मुस्लिम दुनिया में महिलाओं की स्थिति खराब है. इन देशों में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है. और तो और, सरकार द्वारा इस वर्ग को उन सामाजिक सेवाओं की आपूर्ति नहीं की जाती है जो पुरुष आबादी के लिए उपलब्ध हैं. मलाला यूसुफजई पर हुआ हमला इसका सटीक उदाहरण है. मलाला को मारने की कोशिश की गई वह भी इस बात पर कि उसने लड़कियों को शिक्षित करने के महत्व के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना शुरू कर दिया था!
पाकिस्तान में महिलाओं की निम्न स्थिति के गंभीर जनसांख्यिकीय कारण भी हैं और परिणाम भी. पाकिस्तान की सरकार इस मुगालते में थी कि पाकिस्तान ने जनसांख्यिकीय संक्रमण के चरण में प्रवेश कर लिया है परन्तु 2017 की जनगणना ने उसे बड़ा झटका दिया. जनसंख्या में वृद्धि की दर सरकार के अनुमान की तुलना में एक तिहाई अधिक थी यानी 1.8 प्रतिशत के बजाय 2.4 प्रतिशत. यद्यपि सामान्य स्थिति में कुल आबादी में महिलाओं का अनुपात पुरुषों की तुलना में थोड़ा अधिक ही होता है. यह काफी हद तक महिलाओं की लंबी जीवन प्रत्याशा के कारण है. परन्तु पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ है और इसका कारण पाकिस्तानी समाज में महिलाओं की अपेक्षाकृत निम्न स्थिति है. यह स्थिति पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में बहुत भीषण हो चुकी है.

खैबर पख्तूनख्वा और फाटा जैसे क्षेत्रों में, महिलाओं का जीवन अत्यधिक कड़े सामाजिक और पारिवारिक नियमनों के द्वारा नियंत्रित होता है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसी चीज के लिए कोई जगह नहीं बन पाती. पाकिस्तान में महिलाओं को अपने जीवन में अनगिनत अड़चनों का सामना करना पड़ता है. यहां तक कि उनमें से 65 प्रतिशत को पीने के साफ पानी की भी कमी है. 40 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को अपने जीवन में घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है.
पाकिस्तान में महिलाओं को प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति अत्यधिक भयावह है. पाकिस्तान में हर 20 मिनट में गर्भधारण की जटिलताओं के कारण एक महिला की मृत्यु हो जाती है. लगभग 55 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं के पास प्रशिक्षित कर्मचारी या महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता तक उपलब्ध नहीं हैं. उनमें से अधिकांश घर पर असुरक्षित तरीके से अपने बच्चों को जन्म देती हैं.


वट्टा सट्टा जैसे आदिम रिवाज आज भी प्रचलन में हैं जिसमें लड़कियों का दो परिवारों के बीच विवाह हेतु विनिमय होता है. ऑनर किलिंग पाकिस्तान में एक आम बात है. पिछले वर्ष इसी तरह के एक घटनाक्रम में कंदील बलोच की हत्या उसके ही भाई ने कर दी थी. सिंध के ग्रामीण क्षेत्रों में कारो-कारी जैसी अमानवीय प्रथाओं द्वारा अवैध संबंधों के आरोपों में बड़ी संख्या में महिलाओं को मारा जा चुका है और यह लगातार जारी है.

कानून और महिलाएं
जहां एक ओर महिलाओं के साथ गंभीर अपराध होते रहते हैं परन्तु पाकिस्तान का न्यायिक तंत्र में मौजूद द्वैध भाव महिलाओं से भेदभाव पूर्ण व्यवहार पर उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाता है. पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 25(2) लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव का प्रतिषेध करता है वहीं दूसरी ओर यही संविधान देश में शरिया कानूनों को मान्यता भी देता है.

इसके साथ समय-समय पर ऐसे अनेक कानून बनाए गए, जिन्होंने महिलाओं की स्थिति को बद से बदतर बनाने का काम किया. जिया उल हक के शासन में बनाए गए हुदूद आर्डिनेंस या कानून ए शाहदत ऑर्डर जैसे कानूनों ने महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया. हुदूद के अंतर्गत आने वाले ज़ीना प्रावधानों के तहत बलात्कार की पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलना दुश्वार कर दिया गया था. ज़िया के समय ही लाए गए किसास और दियात जैसे इस्लामिक दांडिक विधानों को सक्रिय किया गया और दियात के तहत बदले और मुआवजे के प्रावधानों को पुनर्जीवित किया गया. परन्तु हैरत की बात यह थी कि इन कानूनों के तहत अगर अपराध महिला के विरुद्ध किया गया है तो मुआवजे की राशि पुरुषों की तुलना में आधी तक कर दी गई थी, जो महिलाओं की दुर्दशा का परिचायक है.

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान एक तरह से उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जैसा दूसरी सरकारें करती थीं.


शिक्षा की स्थिति
पाकिस्तानी महिलाओं की शैक्षिक स्थिति दुनिया में सबसे बदतर मानी जा सकती है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए साक्षरता दर बहुत कम है. पाकिस्तान की महिलाओं के लिए औसत साक्षरता दर 44.3 फीसद है परन्तु इसे विस्तार से देखे जाने की जरूरत है. ग्रामीण महिलाओं में शहरी महिलाओं की तुलना में साक्षरता दर केवल 20 प्रतिशत तक ही है. महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था ठीक न होने के कारण वह कभी एक उच्च कोटि का मानव संसाधन नहीं बन पाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी आर्थिक स्थिति भी सदैव बाधित ही बनी रहती है और आर्थिक स्वावलंबन के अभाव में महिलाओं की स्वतंत्रता और सशक्तिकरण की बातें ही बेमानी हो जाती हैं.

आज भी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में महिलाओं का अपहरण, हत्या और बलात्कार हो रहे हैं. पाकिस्तान के एक गैर सरकारी संगठन ‘औरत फाउंडेशन’ के अनुसार पाकिस्तान की कुछ आधारभूत सरंचनाओं में कमी, धार्मिक और सामाजिक रूढ़िवादिता, भ्रष्ट पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों, अप्रभावी न्यायिक प्रणाली के चलते महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर रोक लग पाना बहुत मुश्किल है. परन्तु बात जब अल्पसंख्यक महिलाओं की आती है तो स्थिति कहीं अधिक भयावह है. पाकिस्तान में सक्रिय मानवाधिकार संगठन मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस (MSP) के अनुसार, पाकिस्तान में हर साल लगभग 1,000 ईसाई और हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण कर लिया जाता है, जिन्हें बलपूर्वक धर्मांतरित कर मुस्लिम पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है.


बिना आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के राजनैतिक सशक्तिकरण का कोई अर्थ नहीं रह जाता है. लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारें महिलाओं और पुरुषों, दोनों के प्रति सामान रूप से उत्तरदायी हैं. परन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो पाकिस्तान की राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के लिए उन्हें पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ का अधिक आभारी होना चाहिए, जिन्होंने राष्ट्रीय और प्रांतीय असेम्बलियों में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित कराए और इसे कड़ाई से लागू कराया. परन्तु इस सशक्तिकरण की वास्तविकता पूरी तरह से भिन्न है. पाकिस्तान की विधायिका में जो महिलाएं हैं उनमें से कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश की स्थिति ‘टोकन’ की तरह ही है जिनके सारे राजनैतिक फैसले उनके पिता, पति या इसी तरह परिवार के किसी पुरुष द्वारा लिए जाते हैं. बाकी जगहों पर जहां इस तरह कानूनी बाध्यता नहीं हैं, वहां महिलाओं की सहभागिता नगण्य ही है फिर चाहे वह सिविल सेवा हो या कॉरपोरेट जगत.

आज पाकिस्तान की आबादी का बहुलांश, प्रताड़ित जीवन जीने को विवश है. परन्तु उस पर भी पाकिस्तानी शासक नैतिकता और मानवीयता के उपदेशक की भूमिका निभाने को सदैव लालायित रहते हैं. आज पाकिस्तान में महिलाएं दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीवन यापन को अभिशप्त हैं. केंद्र और राज्यों में इस बड़ी ‘राजनैतिक सहभागिता’ के बावजूद महिलाएं, महिलाओं की दशा सुधारने के लिए नीतियां और कार्यक्रम तक बना पाने से भी वंचित हैं. यही पाकिस्तान में महिलाओं की दुर्दशा का यथार्थ है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)
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