अफगानिस्तान की इस कलेक्टर ने एक महीने में करा दिया 125 आतंकियों का आत्मसमर्पण

एक ही महीने में 125 तालिबानी आतंकियों का आत्मसमर्पण करा चुकी हैं सलीमा. ( फोटो साभार: द नेशनल)
एक ही महीने में 125 तालिबानी आतंकियों का आत्मसमर्पण करा चुकी हैं सलीमा. ( फोटो साभार: द नेशनल)

अफगानिस्तान में सलीमा मजारी नाम की एक कलेक्टर से बातचीत के बाद बीते अक्टूबर में कुल 125 तालिबानी आतंकियों ने हथियार डालकर शांति की राह पर चलने का फैसला किया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 20, 2020, 1:40 PM IST
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काबुल. अफगानिस्तान (Afghanistan) की एक ऐसी सिविल सर्वेंट हैं जो आजकल ख़ूब चर्चाओं में हैं. आतंकवाद से जूझ रहे अफगानिस्तान में सलीमा मजारी (Salima Mazari) नाम की एक कलेक्टर अपने प्रयासों से तालिबानी (Taliban) आतंकियों को अमन की राह पर लाने की कोशिशें कर रहीं हैं. सलीमा की इन कोशिशों का ही नतीजा है कि बीते अक्टूबर में कुल 125 तालिबानी आतंकियों ने हथियार डालकर शांति की राह पर चलने का फैसला किया.

यूएई के अखबार 'द नेशनल' की एक रिपोर्ट के मुताबिक सलीमा के इस काम को मुल्क की पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों का भी समर्थन मिल रहा है. सलीमा ने एक इंटरव्यू में कहा- मैं अपने मुल्क में अमन लाना चाहती हूं और इसके लिए हर मुमकिन कोशिश करूंगी. 39 साल की सलीमा का जन्म बतौर शरणार्थी ईरान में हुआ. वे वहीं पली-बढ़ीं थी लेकिन, सलीमा ने ठान लिया कि वे बतौर रिफ्यूजी पूरी जिंदगी नहीं काटेंगी. सलीमा ने करीब 9 साल पहले मुल्क लौटने का फैसला किया. वे कहती हैं- मैं यूनिवर्सिटी कोर्स पूरा किया. ईरान में अच्छी नौकरी भी मिल गई. फिर 9 साल पहले पति और बच्चों के साथ अफगानिस्तान लौटने का फैसला किया ताकि अपने मुल्क को बचा सकूं. यहां अमन कायम कर सकूं. वे आरोप लगाती हैं कि स्थानीय युवाओं को पाकिस्तान भड़काता है. उन्हें वहां ट्रेनिंग देकर आतंकी बनाता है. बाद में ये लोग अपने ही लोगों की जान लेने में शान समझने लगते हैं.
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (कलेक्टर) हैं सलीमा
सलीमा बताती है कि मैनेजमेंट का अच्छा अनुभव होने के चलते वे सिविल सर्विस के जरिए नौकरी में आई और अब अपने जिले चारकिन्त में तैनात हूं. डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (कलेक्टर) के तौर पर उन्हें दो बॉडीगार्ड्स भी मिले हैं. सलीमा के मुताबिक उन्होंने इससे पहले बंदूकों को इतने करीब से कभी नहीं देखा था लेकिन गोलियों की आवाज सुनने की आदत हो चुकी है. मैं लोगों और सिक्योरिटी फोर्सेज के बीच कोऑर्डिनेशन बनाना चाहती थी. अफगानिस्तान में करप्शन बहुत है इसलिए काम करना बेहद मुश्किल होता है. सलीमा बताती हैं कि उनके जिले में कई पोस्ट्स पर आतंकी कब्जा कर लेते थे और वे आम लोगों से टैक्स वसूली करते थे. सुरक्षाबलों के हथियार लूटकर ले जाते थे.
सलीमा ने आगे कहा- हम जिंदगीभर जंग नहीं कर सकत. मैं तालिबान से भी यही कहती हूं. एक महीने पहले तालिबान ने यहां के एक गांव पर हमला किया. टैक्स से इनकार करने वाली महिलाओं और बच्चों को भी मार डाला. मैं दहल गई. फिर गांव के कुछ बुजुर्गों के जरिए तालिबान से संपर्क किया. उन्हें अमन के लिए मनाया. मैंने उनसे कहा- हम और आप एक ही इस्लाम को मानते हैं. आप चाहते हैं महिलाएं हिजाब पहनें तो इसमें मुझे कोई दिक्कत नहीं. इस्लाम कत्ल करना नहीं सिखाता. इसका नतीजा ये हुआ कि एक महीने में ही 125 आतंकियों ने सरेंडर कर दिया है, अब उन्हें माफी दिलवाउंगी.




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