पर्यावरण दिवस विशेष: गौरैया से लेकर गिलहरी तक... देखते-देखते कितनी चीजें गायब हो रही हैं!

आंगन में चहकती गौरैया याद आती है. अब शायद आंगन खाली दिखते होंगे. यहां तक कि बचपन में मुंडेर पर बैठे जिस कौवे की कर्कश आवाज परेशान करती थी, वो आवाज भी अब कम ही सुनाई देती है.

News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 8:08 AM IST
पर्यावरण दिवस विशेष: गौरैया से लेकर गिलहरी तक... देखते-देखते कितनी चीजें गायब हो रही हैं!
आंगन में चहकती गौरैया याद आती है.
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Updated: June 5, 2019, 8:08 AM IST
दिल्ली-एनसीआर के किसी अपार्टमेंट में रहने वालों के लिए एक सवाल है? खासतौर पर उनसे, जिन्होंने अपना बचपन किसी छोटे शहर या गांव में बिताया है. जब आप अपने गांव को याद करते हैं, तो क्या महसूस करते हैं? क्या ऐसा नहीं लगता कि जिंदगी से कुछ चला गया है? कोई आवाज, कोई शक्ल, कोई आहट.. या कुछ भी? जरूर महसूस करते होंगे.

याद कीजिए, गांव के किसी आंगन में नीम के पेड़ को, जिस पर गिलहरी दिन भर कुलांचे मारा करती थी. अब भी गिलहरी दिखती हैं. तादाद कम हो गई है. याद कीजिए, उस पेड़ की किसी शाख पर बैठी कोयल की कूक. वो कूक अब भी आती होगी. आवाज मद्धम हो गई है. आंगन में चहकती गौरैया याद आती है. अब शायद आंगन खाली दिखते होंगे. यहां तक कि बचपन में मुंडेर पर बैठे जिस कौवे की कर्कश आवाज परेशान करती थी, वो आवाज भी अब कम ही सुनाई देती है. कम से कम दिल्ली-एनसीआर में उसकी जगह जंगली कबूतरों ने ले ली है.

कम होते पक्षी
कौवों का कम होते जाना पर्यावरण के लिए किसी भी लिहाज से अच्छा नहीं है. कौवे हमारे-आपके बीच की गंदगी को कम करते थे. अब भी करते हैं. लेकिन उनकी तादाद कम होती जा रही है. दूसरी तरफ, उनकी जगह ले रहे जंगली कबूतर गंदगी फैलाने का काम करते हैं. लेकिन सड़क पर कबूतरों को दाना खिलाते लोग दिखेंगे. कौवों के लिए नहीं.

इसी तरह गौरैया हमारी संस्कृति के साथ जुड़ती हैं. बच्चा आंगन में जिस पहले पक्षी को देखता रहा है, वो गौरैया थी. अब वो गायब हो रही है. लगातार ऊंचे होते जा रहे मकानों ने उन्हें छीन लिया है. खेत कम होते जा रहे हैं. तालाब सूखते जा रहे हैं. ऐसे में गौरैया बचेंगी भी कैसे!

तमाम और पक्षी भी कम हो रहे हैं. ऐसे एक पक्षी का नाम याद आता है, जिसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहते हैं. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड राजस्थान का स्टेट बर्ड है. जमीन पर रहने वाला यह देश का सबसे बड़ा पक्षी है. वाइल्डलाइफ में इनकी संख्या अब 250 से भी कम रह गई है.


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विलुप्त होते जा रहे हैं जानवर
जानवरों के रहने की जगह पर हम घर बनाते जा रहे हैं. हम शिकायत करते हैं कि कोई जंगली जानवर रिहाइशी इलाके में आ गया है. दरअसल, हम उन जानवरों के इलाकों पर कब्जा कर रहे हैं. वो हमारी तरफ नहीं आ रहे, हम उनकी जगह का अतिक्रमण कर रहे हैं. इसका नतीजा भी दिख रहा है. तमाम जानवर खत्म होते जा रहे हैं.

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जो जानवर खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं, उनमें 'कस्तूरी मृग' भी है. कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन मांहि.. सुनने-सुनाने वाले लोग अब ध्यान दें कि मृग अब कस्तूरी नहीं ढूंढता, अब तो हम और आप मृग ढूंढते रह जाएंगे. कस्तूरी मृग जम्मू कश्मीर का राज्य वन्य पशु है. यह दुर्लभ है. इसे हांगुल और कश्मीरी स्टैग के नाम से भी जाना जाता है. आज इनकी संख्या 200 से भी कम है.

क्लाइमेट चेंज का जंगलों पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है. क्लाइमेट चेंज के कारण जल स्तर बढ़ रहा है. इस वजह से दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रूव जंगल, सुंदरबन अगले 50 सालों में डूब जाएगा. ये दुनिया में बचे चार हजार से कम रॉयल बंगाल टाइगर्स का भी घर है. सुंदरबन डूबेगा, तो वहां रहने वालों का क्या होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. इसी तरह अंधाधुंध शिकार के चलते हम दुनिया के आखिरी बचे नॉर्दन व्हाइट राइनो 'सूडान' को भी मार्च, 2018 में खो चुके हैं. नॉर्दन व्हाइट राइनो अब इस दुनिया से विलुप्त हो चुके हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार 1970 से 2012 के बीच जानवरों की संख्या में 58 फीसदी कमी आई है. यह कमी 2020 तक 67 फीसदी हो जाएगी. यह रिपोर्ट डबल्यूडबल्यूएफ और लंदन जूलोजिकल सोसाइटी ने तैयार की है.



खत्म होते तालाब
याद है, बचपन में गांव में तालाब हुआ करता था? या यूं कहें, तालाब हुआ करते थे. गांव क्या, दिल्ली जैसी जगहों में कुछ दशक पहले तमाम तालाब थे, जो सूख चुके हैं. बड़े शहरों के कुछ तालाबों को ठीक करने की कोशिश हुई भी है. लेकिन चंद तालाबों से वो कमी पूरी नहीं होगी. उन तालाबों को सुखाकर घर बना लिए गए हैं. समस्या यही है कि घर तो बन गए, लेकिन जब कुछ समय बाद पानी विलुप्त हो जाएगा, तो हम क्या करेंगे.

पानी की समस्या नदियों को बांधने से भी जुड़ी है. नदियों की जगह पर कब्जा करके घर बनाने की वजह से पिछले कुछ समय में भयानक त्रासदी देखी गई है. तमिलनाडु से लेकर उत्तराखंड तक आई बाढ़ ने बहुत कुछ बरबाद किया है. वजह पर्यावरण से ही जुड़ी है. नदियों की जगह पर अगर आप कब्जा करके घर बनाएंगे, तो उसका पानी कहीं न कहीं से तो अपनी जगह भी बनाएगा.

पर्यावरण पर कम ध्यान से बहुत कुछ छिन रहा है. छिनने की रफ्तार बढ़ रही है. किसी एक दिन मानव जीवन ही न छिन जाए. वक्त बहुत तेजी से निकल रहा है. लेकिन कुछ तो सुधारा जा ही सकता है.

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First published: June 5, 2019, 8:04 AM IST
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