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चीन का दावा- बना लिया दुनिया का पहला 'डिजाइनर बेबी', नहीं होगा HIV से पीड़ित

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Updated: November 26, 2018, 12:17 PM IST
चीन का दावा- बना लिया दुनिया का पहला 'डिजाइनर बेबी', नहीं होगा HIV से पीड़ित
चीन में पहली बार जेनेटिकली मोडिफाइड इंसानी भ्रूण विकसित किए जाने का दावा किया गया है.

दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग पर चिंता जताते हुए इसे विज्ञान और नैतिकता के खिलाफ प्रयोग बताया है, क्योंकि इससे भविष्य में ‘डिजाइनर बेबी’ जन्म ले सकते हैं.

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  • Last Updated: November 26, 2018, 12:17 PM IST
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चीन में पहली बार जेनेटिकली मोडिफाइड इंसानी भ्रूण विकसित किए जाने का दावा किया गया है. चीन के एक रिसर्चर का दावा है कि उन्होंने दुनिया का पहला जेनिटिकली मोडिफाइड इंसानी भ्रूण अमेरिका से पहले तैयार कर लिया है. उनके मुताबिक, मानव भ्रूण को बदलने के लिए CRISPR नाम की एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया हुआ, जो जीन्स में काट-छांट कर सकती है. लेकिन अब तक इंसानी भ्रूण को इंसान के भीतर छोड़ा नहीं गया है. यह भी दावा किया गया है कि यह एचआईवी से पीड़ित नहीं होगा.

दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग पर चिंता जताते हुए इसे विज्ञान और नैतिकता के खिलाफ प्रयोग बताया है, क्योंकि इससे भविष्य में ‘डिजाइनर बेबी’ जन्म ले सकते हैं. यानी बच्चे की आंख, बाल और त्वचा का रंग ठीक वैसा होगा, जैसा उसके माता-पिता चाहेंगे. वहीं, इस तकनीक के विकसित होने तक इसे रोकने की गुहार लगाई गई है, जिससे इस प्रयोग के खतरनाक परिणाम सामने न आएं.

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चीन के एक मशहूर अखबार ने पिछले हफ्ते इस पर एक रिपोर्ट पब्लिश की थी. लेकिन, इसकी विस्‍तृत जानकारी रविवार को जर्नल 'नेचर' में सार्वजनिक की गई. मैगज़ीन के मुताबिक, CRISPR यानी क्लस्टर्ड रेगुलरली इनर्सपेस्ड शॉर्ट पिलंड्रोमिक रेपिट्स से इस तरह के इंसानी भ्रूण तैयार किए जाते हैं.


क्या है CRISPR तकनीक?
'नेचर' के मुताबिक, इस प्रयोग में क्रिस्पर/कैस-9 तकनीक का इस्तेमाल किया है. इसमें कोशिका के स्तर तक जाकर डीएनए से रोगाणुओं वाले जीन को बाहर निकाल दिया जाता है. 86 भ्रूण पर यह प्रयोग किया गया. इसके बाद दो दिन के लिए उन्हें नियंत्रित वातावरण में रखा गया, क्योंकि CRISPR तकनीक को काम करने में दो दिन लगते हैं. दो दिन बाद 71 भ्रूण ही बच सके.

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साल 2015 में भी चीन के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उन्होंने खून में गड़बड़ी करने वाले जींस को सही करने के लिए मानव भ्रूण के जींस में संशोधन किया है. लेकिन, इसकी पूरे तौर पर पुष्टि नहीं हो पाई.


इससे पहले ब्रिटेन में वैज्ञानिकों को भ्रूण के डीएनए यानी जींस में संशोधन करने की इजाज़त मिली थी. इसका मक़सद मानव जीवन के शुरुआती लम्हों को ज़्यादा बारीकी से समझना था. लेकिन इसपर आगे काम नहीं हो पाया.

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First published: November 26, 2018, 11:30 AM IST
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