युद्ध से बर्बाद हुए यमन को मिला गधों का सहारा, एक लाख रियाल तक मिल रही है कीमत

युद्ध से बर्बाद हुए यमन में गधों की खरीद-बिक्री रोजगार बन चुकी है.
युद्ध से बर्बाद हुए यमन में गधों की खरीद-बिक्री रोजगार बन चुकी है.

यमन में इस समय गधों के भाव (Donkey) बहुत बढ़ गए और उन्हें मुंहमागी कीमत मिल रही थी. यमन के निवासी गधों को आवश्यक वस्तुएं ढोने के काम में ला रहे हैं. गधों से पानी और सामान ढोने का काम लिया जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 22, 2020, 4:57 PM IST
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सना. युद्ध से बर्बाद हो चुके यमन (Yemen Torn Due to War) में इस समय तेल के मूल्यों में बेतहाशा बढ़ोतरी होने और मुद्रा के अवमूल्यन (Depriciation of Currency) हाने से वहां पशु अनिवार्य वस्तु बन चुकी है. यमन में इस समय गधों के भाव (Donkey) बहुत बढ़ गए और उन्हें मुंहमागी कीमत मिल रही थी. यमन के निवासी गधों को आवश्यक वस्तुएं ढोने के काम में ला रहे हैं. गधों से पानी और सामान ढोने का काम लिया जा रहा है. गौरतलब है कि पांच साल से ज्यादा वक्त तक युद्ध में उलझे रहने के चलते यमन की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और अब यहां एसयूवी जैसी गाड़ियों लोगों की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं.

आसमान छू रही है महंगाई

यमन के दक्षिण में स्थित पोर्ट सिटि अदन में रहने वाले मोहम्मद ने बताया कि तेल की कीमतों में लगातर बढ़ोतरी होने के चलते यहां जीवनयापन का खर्च काफी बढ़ गया है और यही वजह है कि यहां गधों की मांग में इजाफा होता जा रहा है. यमन का कोई भी हिस्सा युद्ध से अछूता नहीं रह पाया. ईरान समर्थित हूथी विद्रोहियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार से उत्तर के स्वाथों पर कब्जा कर लिया है. इस बीच, भारी मुद्रास्फीति के चलते ज्यादातर अनिवार्य वस्तुओं को दुर्लभ और महंगा बना दिया है.



यमन में गहराया संकट
यमन बहुत गहरे संकट में डूबता जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान का है कि यहां 2.9 करोड़ आबादी में से एक तिहाई लोग आर्थिक सहायता पर जीवन गुजार रहे हैं. यमन के संकट को दुनिया में मनुष्य के सबसे गंभीरतम संकटों में गिना जा रहा है. यहां एक पेट्रोल की अब $0.50 में बेचा जा रहा है जबकि यह तेल उत्पादक देश है. यहां एक शिक्षक की मासिक आय 25 डॉलर से भी कम है. यमन की मुद्रा का लगातार अवमूल्य हो रहा है. जनवरी महीने में यहां एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 610 रियाल थी जो बढ़कर अब 800 रियाल हो गई.

गधों से सामान ढोने का काम लिया जाने लगा है

अदन ज्वालामुखी से निकले लावों से निर्मित शहर है और यहां पुराने समय से गधों से सामान ढुलवाने का प्रचलन रहा है. हालांकि आधुनिकता के चलते यहां गधों की जगह गाड़ियों ने ले ली थी. हाालंकि अब 21वीं शताब्दी बच्चे भारी सामान और पानी का बड़ा बर्तन गधों पर ढोते हुए आसानी से दिख जाते हैं. मोहम्मद ने बताया कि यहां दो-दो हफ्तों तक गैसोलिन की आपूर्ति नहीं होती है. ऐसे में लोग सामान्य चलन की ओर लौटने लगे हैं.

गधों की बिक्री से हर रोज 8,000 रियाल की आमदनी

नौ बच्चे के पिता मोहम्मद 38 साल के हैं, जो अपनी उम्र से ज्यादा दिखते हैं. मोहम्मद की नौकरी दो साल पहले छूट गई और वे गधों की खरीद-बिक्री के धंधे में लग गए. उनका धंधा लगातार फल-फूल रहा है. वह पड़ोस के अबयान प्रांत से पशु खरीदते हैं. वहां से पशु खरीदना उन्हें सस्ता पड़ता है. वे इन पशुओं को अदन में लाकर बेचते हैं. उन्होंने बताया कि हम रोज का 7,000 से लेकर 8,000 रियाल का मुनाफा कमा लेते हैं जबकि गधों को चारा खिलाने का खर्च बहुत कम आता है.

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उन्होंने बताया कि हम इस तरह बढ़ती महंगाई में बच्चों का भरन-पोषण कैसे करेंगे. मैंने नौकरी खोजने में बहुत वक्त लगाया लेकिन एक नहीं मिली. ईश्वर का धन्यवाद. गधों का धन्यवाद कि मेरी आमदनी हो रही है. एक गधे की कीमत 70 हजार से लेकर एक लाख रियाल तक है. गधे खरीदना अब गरीबों के बस में नहीं रह गया है.
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