योगेंद्र यादव ने गिनाई अमेरिकी लोकतंत्र की खामियां, कहा- दोनों बड़ी पार्टियां करती हैं फंड का बंदरबांट

डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन
डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन

US Presidential Election 2020: अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए मगंलवार को मतदान कराए गए और बुधवार को मतगणना जारी है. माना जा रहा है कि परिणाम जल्द आ सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 4, 2020, 10:45 PM IST
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नई दिल्ली. अमेरिका में मंगलवार को राष्ट्रपति चुनाव 2020 (US Presidential Election 2020) के लिए मतदान किए गए. भारतीय समयानुसार बुधवार को चुनाव परिणाम आ जाएंगे. इसी मुद्दे पर स्वराज पार्टी के नेता योगेंद्र यादव (Yogendra Yadav) ने एक लेख के जरिए अमेरिकी लोकतंत्र की खामियों का जिक्र किया है. उनका इशारा इस ओर है कि पश्चिमी यानी अमेरिकी लोकतंत्र की ओर सबकी निगाहें होती है. हम उसे आदर्श मानते हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है. यादव ने दैनिक भास्कर में अमेरिकी चुनाव पर लेख लिखा है, जिसमें वह कहते हैं कि, अमेरिका में चुनाव आयोग सरीखी कोई संस्था नहीं है. वहां कौन मतदान करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा, मतगणना कब होगी, इसके लिए सभी 50 अलग राज्यों में अलग-अलग नियम है. उन्होंने कहा कि टीवी चैनल भले ही बुधवार को परिणामों का ऐलान कर दें, लेकिन औपचारिक तौर पर वोटों की गिनती होने में 1 महीने तक का वक्त लग सकता है.

उन्होंने लिखा है कि अमेरिका में करीब एक चौथाई नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं होते. वहां सरकार नहीं, बल्कि नागरिकों की ही जिम्मेदारी है कि वह अपना नाम खुद जुड़वाएं. जिसके चलते करीब 5 करोड़ लोग इलेक्शन में वोटिंग नहीं कर पाते. उनका दावा है कि वोट देने से वंचित रहने वालों में गरीब और अश्वेत लोगों की संख्या ज्यादा होती है.





'कंपनियां जीते हुए उम्मीदवारों से खुलकर दाम वसूलती हैं'
यादव ने कहा कि अमेरिका में चुनावी खर्च की कोई सीमा नहीं. लेख में यादव ने दावा किया कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार 11,000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करेंगे. हिन्दी दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख में उन्होंने लिखा है- 'चुनाव में चंदा मुख्यतः हथियार बनाने वाली, औषधि बनाने वाली व तेल कंपनियों से मिलता है. चुनाव के बाद ये कंपनियां जीते हुए उम्मीदवारों से खुलकर दाम वसूलती हैं.'

लिखा कि चुने हुए सांसद खुलकर कंपनियों, उनके दलालों, दबाव समूह व विदेशी सरकारों के एजेंटों तक से पैसा लेते हैं और बदले में संसद में सवाल पूछते हैं, वोट डालते हैं. वहां इसे भ्रष्टाचार नहीं ‘लॉबिंग’ कहते हैं. राष्ट्रपति और संसद में स्थाई खींचतान चलती रहती है. बजट पास करवाने के लिए राष्ट्रपति को संसद से और कानून पर दस्तखत करवाने के लिए संसद को राष्ट्रपति से लेन-देन करना पड़ता है. यह किसी राष्ट्रपति के व्यक्तिगत चरित्र का मामला नहीं है बल्कि अमेरिका की संस्थागत बनावट का परिणाम है.

यादव ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति खुल्लम-खुल्ला पार्टी की पक्षधरता के आधार पर होती है. जजों की ‘रिपब्लिकन जज’ या ‘डेमोक्रेट जज’ के रूप में गिनती होती है. चुनाव से दो महीने पहले राष्ट्रपति ट्रम्प ने सुप्रीम कोर्ट में एक ‘रिपब्लिकन’ जज की नियुक्ति कर कोर्ट के संतुलन को बहुत साल तक अपने पक्ष में झुका लिया.

अमेरिकी दलीय व्यवस्था पर यादव ने लिखा कि पार्टियां खाली लिफाफे जैसी हैं, जिसमें जब चाहे जो मजमून डाल दिया जाए. पार्टियों की न कोई विचारधारा है, न जमीन पर मजबूत संगठन. रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी, दोनों मिलकर सुनिश्चित करती हैं कि कोई तीसरी पार्टी न घुस पाए. दोनों मिलकर अपनी संस्थाओं में सरकारी फंड बंदरबांट करते हैं.

'महिला उम्मीदवारों को मर्दसत्ता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं'
उन्होंने लिखा कि अश्वेत लोग आज भी गुलामी का दंश झेलते हैं, सड़कों पर पिटते हैं, बिना वजह पुलिस के डंडे और गोली खाते हैं, और शिक्षा, रोजगार, मकान और स्वास्थ्य बीमा जैसी न्यूनतम सुविधाओं से वंचित रहते हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका बने 250 वर्ष हो गए. लेकिन आज एक भी महिला राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति नहीं बनी. जब औरत चुनाव मैदान में उतरती है तो उसे चरित्र हनन से लेकर मर्दसत्ता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं.



यादव ने लिखा कि अगर बराक ओबामा जैसे असाधारण व्यक्तित्व को छोड़ दें तो आमतौर पर औसत बुद्धि व संदिग्ध चरित्र वाले ही राष्ट्रपति पद तक पहुंच पाते हैं. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रम्प अपने कार्यकाल में 20,000 झूठ बोल चुके हैं. वे खुलकर नस्ली नफरत व हिंसा की भाषा बोलते हैं. उनके खिलाफ टैक्स चोरी और यौनाचार के गंभीर आरोप है. सवाल यह है कि ऐसा व्यक्ति दुनिया के इस ‘महान लोकतंत्र’ में राष्ट्रपति कैसे बना? इसे आप दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र कहेंगे? शायद ऐसे ही मौके पर कभी मिर्जा गालिब ने कहा था: ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है’.
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