#जीवनसंवाद: करुणा और कोमलता!

  • July 2, 2020, 10:34 pm
रोहतक और लखनऊ के बीच लंबी दूरी है. दूरी और भी बढ़ जाती है जब खाने के पैसे न हों, बैठने को गाड़ी न हो. बस चलते ही जाना हो. ऐसे ही चलते जा रहे एक परिवार की ऐसे लोगों ने मदद की है जो उसी रास्ते पर कई लोगों को लूट चुके थे. मनुष्य के भीतर भावना की कितनी परतें होती हैं, इसका अंदाजा बड़े से बड़ा त्वचा विशेषज्ञ भी नहीं लगा सकता. एक ही व्यक्ति बहुत कम समय में कैसे हिंसा और क्रोध से प्रेम को उपलब्ध हो जाता है, ठीक-ठीक कह पाना संभव नहीं. इसी रास्ते पर अनेक लोगों को लूट चुके इस समूह ने इस परिवार को पांच हजार रुपए दिए. उन्हें अपने रास्ते पर आगे बढ़ने में मदद की.

भीतर बैठी कोमलता ने करुणा की आवाज सुन ली. उसने कठोरता की भावना को हृदय से बाहर निकाल दिया. खामोशी से! मन की कोमलता भावना की किस गली से निकल कर दूसरे के लिए अमृत बन जाए, कह पाना संभव नहीं. लेकिन इतना तो विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि हर मनुष्य में मनुष्यता का दीया जलता रहता है.

हां, यह जरूर होता है कि अनुभव की कठोरता, हिंसा से मुठभेड़ और दूसरों का छल-प्रपंच उसे कई बार ऐसे रास्ते पर भटका देता है जहां वह जाना नहीं चाहता. किसी के अपराधी होने और न होने के बीच बहुत महीन परत होती है, इसको पार करते ही कोई भी हिंसक हो सकता है. करुणा, कोमलता हम तक हिंसा और क्रोध को पहुंचने से रोकते हैं. इनके कमजोर होती ही मन हिंसक, कठोर होता जाता है.


हमारा मन किन चीजों से नियंत्रित होता है अगर इसे थोड़ा होश पूर्वक और सजगता से देखा जाए तो अनेक प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं. एक बार 'जीवन संवाद' के एक व्याख्यान में बहुत सुंदर प्रश्न उपस्थित हुआ. प्रश्न था- क्या कारण है कि बड़े बड़े घरों में रहने वाले लोग जानवरों से तो बहुत प्रेम करते हैं, लेकिन उसी घर में काम करने वालों से इतनी कठोरता से पेश आते हैं. आपने भी यह सब देखा ही होगा. ऐसा क्यों होता है! इसका उत्तर बहुत सरल नहीं है. हां, लेकिन थोड़ी सावधानी से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह मन की बाजीगरी है

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि एक मन दूसरे मन से दुखी होता है. मनुष्य दूसरे से मिले अनुभव, कठोरता और हिंसा का बदला किससे लेगा! दूसरे इंसान से ही लेगा. लेकिन सीधे-सीधे तो ले नहीं ले सकता. वह दूसरे तरीके से बदला लेता है. वह जानवरों से प्रेम करता है. उनकी देखभाल करता है. उनसे अनुराग रखता है, ऐसा करते हुए वह अंतर्मन से उनसे नाराजगी जता रहा होता है, जिन्होंने उसे दुख दिया है.

मैंने ऐसे बहुत कम लोग देखे हैं, जो जानवरों और मनुष्यों से एक जैसा प्रेम करते हैं. कुत्तों से बेइंतहा मोहब्बत करने वाले एक मित्र ने एक बार कहा था, यह भी बच्चे जैसा ही है. बस, बच्चे की तरह बोल नहीं सकता. यह इस अर्थ में मनुष्य के बच्चे से बेहतर है कि हमें इसके भविष्य की चिंता नहीं करनी. मैं समझ गया था उनके भीतर गहरी गुफा है, जहां प्रेम का बीज सूख गया है. मैंने ज्यादातर ऐसे ही लोगों को पालतू पशुओं के प्रेम में डूबे पाया है, जो किसी ना किसी कारण से मनुष्य से रूठे हुए हैं! आसानी से बताएंगे नहीं, व्यक्त नहीं करेंगे, लेकिन कुछ ऐसा है जो मनुष्य में उन्हें नहीं मिलता. हो सकता है बहुत से लोग ऐसे ना हों लेकिन उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं है.


अपने भीतर हमें करुणा और कोमलता को टटोलने की जरूरत है. कहीं ऐसा तो नहीं कि इन दोनों का उपयोग न कर पाने के कारण इनकी परत शरीर और आत्मा से बहुत दूर चली गई हो! शुभकामना सहित .....

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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