#जीवनसंवाद : यादों का दुख!

  • July 13, 2020, 11:43 pm
सबसे भारी, वजनी क्‍या है. हम सबसे अधिक कहां रुकते हैं. कहां से आगे बढ़ना मुश्किल होता जाता है. इन सभी सवालों के जवाब जिस एक चीज़ में हैं, उसका नाम यादों की पोटली. अतीत की गठरी. यादों का भार. याद का दुख.

हम अतीत में इतने अधिक बंधे रहते हैं कि उससे बाहर निकल कर नई रोशनी की ओर बढ़ना कई बार मुश्किल नहीं असंभव हो जाता है. अतीत, हमारे पांव कुछ वैसे ही बांधे रहता है, जिस तरह एक पतली रस्‍सी से बड़ा/ बलवान हाथी बंधा रहता है. जिस तरह उस हाथी को भीतर से यह अहसास होता है कि इस रस्‍सी को नहीं तोड़ा जा सकता, ठीक उसी तरह मन के भीतर भी एक रस्‍सी है, जो हमें आगे बढ़ने से रोके रखती है.

जो एक जगह अटके हैं, थमे हैं, वह किसी दूसरे भय के कारण नहीं, बल्कि अपने भीतर के डर से. निर्णय नहीं ले पाने से. अतीत से चिपके रहने की बीमारी मन को लगने वाले सबसे खतरनाक रोगों में से एक है. मन अक्‍सर ऐसी चीज़ों में अटका रहता है, जिससे उसको दूसरों की सहानुभूति मिलती रहे.

हमें गहरा अभ्‍यास कराया गया है, दुख में सुखी रहने का. इसलिए बहुत से लोग कभी नहीं कह पाते – हां, मैं सुखी हूं. वह तुरंत ही दुख गिनाने लगते हैं. एक होड़ सी है, खुद को पीड़ित दिखाने की.


घर, परिवार में किसी के साथ हादसा हो जाने पर कुछ दिन के लिए उसे कुछ दिन के लिए बहुत से काम से छुट्टी मिल जाती है. इस दौरान उससे केवल प्रेम जताया जाता है. उसे चीज़ों के लिए कुसूरवार नहीं ठहराया जाता. लेकिन यह सब कितने दिन चलता है. कुछ दिन, महीने. उसके बाद उससे अपेक्षा होती है कि वह अपने काम पर वापस आ जाए.

लेकिन यादों के भंवर से लौटना आसान नहीं. एक बाद आप यादों के भंवर में रास्‍ता भटके तो पूरी एक उम्र लग सकती है, इससे उबरने में. मज़ेदार बात यह है कि इसमें समय की कोई सीमा नहीं. ऐसे लोगों की कमी नहीं जो संबंधों की टूटन को उम्र भर लादे फि‍रते रहते हैं. इसके कारण वह अपने परिवार, मित्र और उन सबकी उपेक्षा करते रहते हैं, जिनके सहारे वह यहां तक पहुंचे.

किसी एक रिश्‍ते में इस तरह उलझे रहना जिससे बाकी अपनों का जीवन प्रभावित होता रहा, किसी स्‍वस्‍थ मन का काम नहीं हो सकता. ऐसे अस्‍वस्‍थ मन हमारे आसपास बड़ी संख्‍या में हैं. ऐसे लोग हमेशा अपने को पीड़ित के रूप में बनाए रखते हैं. जिससे सभी को यह लगता रहे कि इनके साथ बड़ा दुखद हुआ.

अरे! दो लोग साथ थे. इसमें से एक ने अपना अलग रास्‍ता चुन लिया तो इसमें दुख क्‍या है. दुख असल में इस बात का है कि रास्‍ता उसने कैसे चुन लिया. आपने क्‍यों नहीं चुना. आपको चुनने का अवसर क्‍यों नहीं मिला.यह असल में कोई दुख नहीं . यह मन का रचा हुआ खेल है.


हिंदी सिनेमा के इस ‘टूटे दिल सिंड्रोम’ ने लाखों लोगों को अपनी चपेट में लिया हुआ है. इसकी सबसे बड़ी पहचान यही है कि इसमें पीड़ित स्‍वयं को नायक/ हीरो की तरह समझने लगता है. यह मन को दुखी बनाने की पुरानी कहानी है. बार-बार दुहराई जाने वाली. बस इसके किरदार बदल जाते हैं. कहानी, वैसे ही चलती रहती है.

हमारे समाज की बनावट कुछ ऐसी है कि यहां दुखी अपने को एकदम सुरक्षित समझता है. लोग उसकी ओर से बड़े ही चिंता मुक्‍त होते हैं कि यह उनसे आगे नहीं जा सकता. यह तो खुद ही दुखी है. हम अपने से दुखी को देखकर अक्‍सर सुखी होते रहते हैं. यह मन का विचित्र स्‍वभाव है. इससे अपने को दुख के घेरे व्‍यक्ति को साहस तो मिलता है लेकिन वह अपने को वैसी ही जंजीरों से बांध लेता है, जिनसे हम हाथी को बांधे रखते हैं. एकदम कमजोर लेकिन हाथी को भारी और मुश्किल लगने वाली जंजीरें. जिस तरह से बचपन से जंजीर में बंधा हाथी बड़ा होने पर पतली जंजीर नहीं तोड़ पाता वैसे ही हम भी याद की गठरी मन पर लादे जिंदगी पर बोझ बढ़ाते रहते हैं.

इसलिए, जब कभी कोई ऐसा दुख आपको घेरने की कोशिश में हो, जिसके असली पर होने पर जरा भी संदेह हो तो सबसे पहले खुद को समय देना आरंभ कीजिए. यह दूसरों को समय देने जैसा ही जरूरी काम है. यादों को इतना भारी होने से बचाइए कि वह जिंदगी पर बोझ बनने लगें. यादों की गठरी हमारे मन को दूसरे किसी बोझ के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावित करती है.

दयाशंकर मिश्र
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