जीवन संवाद : प्रेम से दूरी!

  • September 30, 2020, 12:04 am
हम सुख में अधिक खिलते हैं/ मुश्किल में ज्यादा मजबूत होते हैं/ उस समय साहस रखते हैं, जब इसे सहेजना मुश्किल हो/ करुणा और प्रेम से कभी दूर नहीं होते! इनमें से किन पलों में हम सबसे सुंदर, स्वस्थ और कोमल होते हैं. अपने-अपने सुझाव हो सकते हैं. मेरे ख्याल में वही पल सबसे बेहतर है, जब हम कठिनतम पलों में भी स्वयं को प्रेम, करुणा से दूर न करें. कोरोना के कारण ‘शरीर और मन’ दोनों पर एक साथ भारी संकट आ गया है.

कोरोना ने हमारी सोचने समझने और प्रेम करने की क्षमता को एक साथ प्रभावित किया है. कोरोना के कारण सब कुछ सीमित करने का भाव गहरा होता दि‍ख रहा है. इसलिए मन के भीतर करुणा, प्रेम और आनंद की मात्रा जांचते रहिए. संवाद का दायरा बढ़ाते रहिए. कभी-कभी डॉक्टर जब बहुत अधिक भरोसे के होते हैं तो हम न चाहते हुए भी उनके कहने पर कुछ दवाइयां, परहेज कर लेते हैं. कुछ वैसा ही अपने मन के साथ करने का समय है.

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मन को भरोसे में लेने का समय है. मन करुणा, स्‍नेह और प्रेम से दूर जाने को कह सकता है, लेकिन हमें संवाद बनाए रखना है. संवाद ही वह पुल है, जो जीवन को इनसे जोड़े रखता है. इस बात को समझने का समय है कि अगर इस समय कोई हमसे दूर चला गया तो उसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी. हम मानसिक रूप से कमजोर हो रहे हैं. निराशा दिमाग पर हावी होती जा रही है. अनिश्‍चितता का भाव कहीं गहरा होता जा रहा है.

अंतत: प्रेम ही बचाएगा. प्रेम मन में दूसरे के लिए नमी, कोमलता बनाए रखने से अधिक हमारे लिए करुणा की परत बिछाए रखता है. जिसके मन में जितना अधिक प्रेम बाकी रहेगा, उसके जीवन में कोमलता, स्‍नेह को उपलब्‍ध होने के उतने ही अधिक अवसर होंगे.


एक छोटी सी कहानी आपसे कहता हूं. संभव है, इससे मेरी बात अधिक स्‍पष्‍ट हो सके.
जापान के क्‍योतो प्रांत में जे़न गुरू कीचू से मिलने वहां के नए राजा पहुंचे. मठ के दरवाजे पर पहुंचकर राजा ने अपने सेवक को भीतर संदेश देने को भेजा. सेवक ने गुरू से कहा, क्‍योतो के राजा आपसे मिलने आए हैं. कीचू ने भोलेपन से कहा, लेकिन मुझे तो उनसे कोई काम नहीं. और न ही मैं राजा के किसी काम का हूं. इसलिए उनको आदरपूर्वक वापस भेज दीजिए.

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घबराए सेवक ने लौटकर राजा से यह बात कही. राजा के मन में प्रेम की कोपलें फूटीं थी. राजा होने के बाद भी उसके भीतर अहंकार की बेल नहीं उपजी थी. उसने अपने सेवकों को मठ से दूर भेज दिया.अपनी भव्‍य सवारी से उतरा. नंगे पांव कीचू की झोपड़ी के बाहर पहुंचकर उसने आवाज दी. मैं कितागाकी (उसका नाम) हूं, आपसे मिलना चाहता हूं. जे़न गुरू ने प्‍यार से उत्‍तर देते हुए कहा, कितागाकी ! बाहर क्‍यों ठहरे हो मेरे भाई, भीतर आ जाओ!

अब थोड़ी देर ठहरकर, कितागाकी और अपने मन के बारे में सोचिए. हम कैसे-कैसे कवच अपने अहंकार को पहना देते हैं. न जाने क्‍या-क्‍या कहानियां अपने होने के बारे में पाल लेते हैं. अपने भीतर प्रेम बढ़ रहा है या अपने कुछ होने का अहंकार! इस बात को हमेशा जांचते रहिए.

आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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