#जीवनसंवाद: परिवार और दुख का सामना!

  • October 2, 2020, 1:25 am
आज संवाद की शुरुआत एक छोटी कहानी से. एक बार अपना पूरा कारोबार गंवा चुके व्यक्ति सूफी संत के पास पहुंचे. उन्होंने कहा, 'मैं परिवार को दुखी नहीं देख सकता, इसलिए जीवन से मुक्त होना चाहता हूं. जब परिवार को सुख नहीं दे पाया, तो उसको दुख में नहीं देख सकता. पत्नी और बच्चे इतने कष्ट में रहे यह मुझसे नहीं देखा जाएगा. मैंने कभी उनको इस तरह के अभाव में नहीं रखा.'

महात्मा ने उनकी ओर गहरी करुणा से देखते हुए कहा, 'दुख सहने के लिए क्या हम दूसरा परिवार लाएंगे! जिस परिवार को आपने सुख दिए, कभी दुख का सामना नहीं करने नहीं दिया, उसे ही दुख भी सहना होगा. दुख सहने दूसरा परिवार नहीं आएगा! सुख और दुख के लिए अलग-अलग परिवार नहीं लाए जाते.'

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उनकी बात पूरी होते-होते उनके पास पहुंचनेे वाले व्यक्ति भावुक हो गए. उनकी आंखों से आंसू बहने लगे. खुद को संभालते हुए उन्होंने कहा, 'लेकिन परिवार यह सह नहीं पाएगा.' महात्मा ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, 'आप असल में उनकी सहनशक्ति से नहीं, अपने कमजोर मन से डर रहे हैं. अपने भीतर के सबकुछ खुद सहने, परिवार को दुख से दूर रहने के भाव से डर रहे हैं. यह भाव होना बहुत सहज है, लेकिन इससे जीवन बहुत अधिक मुश्किल में रहता है. परिवार केवल सुख सहने के लिए नहीं होता. अगर परिजन आपसे प्रेम करते हैं, तो वह हर स्थिति में आपका साथ देंगे.

अगर वह ऐसे हैं कि आपके संकट को नहीं समझते, तब भी दुखी होने की जरूरत नहीं. बल्कि अपनी जिम्मेदारियों को सीमित करने की जरूरत है. सबकुछ संभाल लेने का भाव कभी-कभी हमारे अहंकार का भी कारण बन जाता है! खुद को इससे बचाने की जरूरत है. जो भी संकट आया है. उसका सामना मिल-जुलकर करना होगा. अकेले-अकेले लड़ने से संकट भारी होता जाएगा और हमारा मन अकेेेला और कमजोर'!


जीवनसंवाद को लॉकडाउन के बाद से बड़ी संख्या में इसी तरह के सवाल मिल रहे हैं. जिसमें परिवार के वह सदस्य सबसेे अधिक परेशान, बेचैन महसूस कर रहे हैं, जिनके ऊपर परिवार की पूरी जिम्मेदारी है. उनके भीतर स्वयं को लेकर अपराधबोध और शर्मिंदगी का भाव गहरा होता जा रहा है. आर्थिक रूप से मुश्किल वक्त का सामना किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं हो सकती. इसको लेकर शर्म और ग्लानि का भाव तो मन के लिए और भी अधिक घातक है. मन पहले ही अर्थव्यवस्था के कठिन प्रश्नों से जूझ रहा.

जब पूरी दुनिया पर संकट गहरा आएगा, तो उसकी छाया हम पर पड़नी स्वाभाविक है. इसलिए स्वयं और परिवार को तकलीफोंं का सामना करने के लिए तैयार करना होगा. मुश्किल वक्त को अपने स्वाभिमान, अभिमान और सामाजिक पहचान के संकट से दूर रखें.

लोग क्या कहेंगे! इस तरह की बातों का कोई अर्थ नहीं है. जो लोग आपको मुश्किल वक्त में सहारा नहीं दे सकते, उनकी टिप्पणियों का आपके जीवन के लिए कोई अर्थ नहीं. हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि जीवन को तनाव और अवसाद से बचाना ही इस समय सबसे बड़ा काम है.


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कोरोना के कारण जो भी संकट है उसमें अगर आप गांधी की थोड़ी समझ मिला दें. तो आप पाएंगे कि उनका सामना करना आसान हो जाएगा. गांधी केवल दो अक्टूबर को याद करने के लिए नहीं हैं. उनके विचार हमें दुख, तकलीफ और संकट से जूझने की शक्ति देते हैं. गांधी को केवल किताब मत मानिए, वह जीवनशैली हैं, जिन्हें ओढ़-बिछाकर मुश्किलों का सामना किया जा सकता है. गहरी जीवन आस्था का नाम ही गांधीमार्ग है.

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