#जीवनसंवाद: स्वभाव!

  • October 27, 2020, 11:51 pm
अपना स्वभाव बहुत मायने रखता है. नीम और आम साथ रहते हुए भी एक-दूसरे के लक्षण नहीं लेते. दोनों अपने-अपने स्वाद के साथ हमारी जिंदगी का हिस्सा होते हैं. अलग स्वभाव के बाद भी दोनों होते एक-दूसरे के निकट हैं. हमारे लिए आम और नीम की मित्रता विभिन्नता के बावजूद एक-दूसरे का साथ निभाते रहने के लिहाज से बड़े काम की है. आम को स्वाद का अहंकार नहीं. नीम अपनी निरोगी काया, गुणों का खान होने के बाद इतराता नहीं. फलदार वृक्ष झुकते ही जाते हैं.

संभवत: मनुष्य ही ऐसा जीवधारी है, जो थोड़े से फल देने के बाद इतराने की ओर बढ़ जाता है. उसकी विनम्रता घटती जाती है. दूसरों के दोष देखने और उनमें कमियां निकालने की ओर निकल जाता है. आम और नीम पड़ोसी तो बने रहते हैं, लेकिन अपना स्वभाव नहीं बदलते. अपना स्वभाव बदले बिना भी दूसरे के साथ आनंद से रहा जा सकता है.

#जीवनसंवाद: दोहरी जिंदगी!

कोरोना वायरस ने जीवन और अर्थव्यवस्था को गंभीर चुनौती दी है. दुनिया में बहुत कुछ बदलने को है. ऐसे में जीवन को व्यापक अर्थ में समझना जरूरी है. नौकरी, बिजनेस और शिक्षा बहुत तेजी से बदलने वाले हैं. हमें खुद को इस बदलाव के लिए तैयार करना है. नए क्षेत्रों के प्रति ललक, नई राहों के प्रति साहस का रवैया हमारे जीवन को हमेशा के लिए बदल सकता है. अब समय है कि दूसरों के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ने की जगह अपने स्वभाव के अनुकूल चला जाए.


हमने शिक्षा को कुछ इस तरह से ग्रहण किया है कि वह नौकरी मिलते ही समाप्त हो जाती है. नैतिक मूल्य, प्रेम और स्नेह सरीखी बातों को हम अप्रासंगिक करते जा रहे हैं. इस अर्थ में हम शिक्षा के पास नहीं उससे दूर जा रहे हैं. पंचतंत्र की कहानियां याद हैं! नीतिशास्त्र पढ़ाने के लिए शिक्षक प्ंडित विष्णु शर्मा ने कहानियों का सहारा लिया. उनकी शिक्षा जीवन से अलग नहीं थी, जबकि हमारी शिक्षा जीवन से दूर चली गई है. वह हर दिन की जिंदगी में काम नहीं आती.

पंचतंत्र की कहानियां असल में हमारे व्यवहार, मनोविज्ञान, नौकरी से लेकर व्यापार तक के सिद्धांतों से परिचय कराती हैं. पंचतंत्र कहानियों में मनुष्य के साथ पशु-पक्षियों को भी कथा का पात्र बनाया गया. थोड़ा ठहरकर सोचिए, क्या जमाना था जब कहानियों से समाज, शासन करने वालों को तैयार किया जा रहा था. आज हम जैसे ही जिंदगी में प्रवेश करते हैं, सबसे पहले नैतिकता और मूल्य को छोड़ने के लिए बेचैन रहते हैं.

भीतर कुछ और बाहर कुछ. यही दोहरे जीवन की शुरुआत है. जिंदगी में हमेशा सबकुछ हासिल करने के लिए ही नहीं, कभी कुछ कीमत अपने को बचाए रखने के लिए भी चुकानी होती है. जो अपने को बचाए रखते हैं, वही जीवन को उपलब्ध होते हैं!


एक छोटी-सी कहानी आपसे कहता हूं. संभव है, इससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो जाएगी...

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एक ज़ैन साधु के पास एक शिक्षक पहुंचे. उन्होंने कहा, कभी-कभी मुझे बहुत गुस्सा आता है. मैं जो नहीं हूं, वह हो जाता हूं. मेरी मदद कीजिए. ज़ेन साधु ने कहा, जो कभी-कभी आता है, वह तुम्हारा स्वभाव नहीं. उसके लिए परेशान मत हो. जो स्वभाव है, उस पर ध्यान दो. अपने स्वभाव को विस्तार दो. इससे गुस्से की खरपतवार अपनेआप ठीक हो जाएगी.

हम जो नहीं हैं, जो कभी-कभी हो जाते हैं, उसके लिए अधिक परेशान होते हैं. बजाए उसके जो हम हैं! हमेशा बने रहते हैं. हम सबको अपने स्वभाव को पहचानने, उसे संभालने की जरूरत है. कोरोना जैसे संकट स्वभाव की परिपक्वता से ही संभाले जा सकते हैं.

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