#जीवनसंवाद: हमदर्द!

  • September 29, 2020, 11:54 pm
हर वक्त हम किसी की मदद को उपलब्ध रहें यह जरूरी नहीं कि संभव हो पाए, लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि उसके दर्द को महसूस कर पाएं. उससे कह सकें कि तुम अकेले नहीं हो! हम तुम्हारे साथ हैं, डूबते को तिनके का सहारा नहीं, बल्कि उसे नाव में बिठाने जैसा है. हमारे जीवन की गति इस समय इतनी तेज है कि हमदर्द होना भी आसान नहीं. जिंदगी की चाही-अनचाही जरूरतों के बीच हम उलझे हुए हैं. हमारा ध्यान केवल स्वयं पर केंद्रित है. दूसरों के मन को समझना, टटोलना भी भारी काम लगता है!




कोरोना के कारण पहले लॉकडाउन, उसके बाद घर पर अघोषित कैद से जिंदगी के दायरे बहुत सीमित हो गए हैं. सामाजिकता का रस हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा था. पहले तकनीक और अपनी व्यक्तिगत व्यस्तता में फंसे होने के कारण हमारे पास सबके लिए समय नहीं था. अब समय तो बढ़ता दिख रहा है, लेकिन अवसर नहीं हैं. हर किसी का फोन व्यस्त है. हर कोई अपने संकट से अकेले-अकेले लड़ रहा है. संकट, हमारी समझ, क्षमता के मुकाबले कहीं गहरा है. अगर हम मिलकर इसका मुकाबला करते, तो संभव है कि इसे सरलता से पराजित किया जा सकता था, लेकिन अब अकेले-अकेले लड़ने के कारण हमारी क्षमता घटती जा रही है.

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अगर हम सब एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग के लिए तैयार हों, तो हम समझ पाएंगे कि हमारी जीवनशैली कहां जा रही है. हर दिन अपने स्मार्टफोन से होने वाली बातचीत का खुद ही एक ब्योरा तैयार कीजिए. आप जो कह रहे हैं. घंटों-घंटों बातचीत कर रहे हैं. उसकी विषयवस्तु क्या है? वह बातचीत क्या है! इससे हम समझ पाएंगे कि हमारा ध्यान पूरी तरह उन चीजों पर है जो हमें समझाई गई हैं कि हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं.

उदाहरण के लिए दो दोस्त अपनी नई कार पर एक घंटे तक बात करते हैं. बच्चों को किस तरह की चीजें पसंद हैं, इस पर खूब बात होती है. बहुत बात होती है बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर. उनके स्कूल और कॉलेज को लेकर. यह सब जरूरी तो है, लेकिन यह अपनेपन से दूरी का संवाद है. यह जीवन संवाद नहीं. 'जीवन संवाद' मनुष्य और मनुष्यता के बिना अधूरा है.


अपनेपन के पराग के बिना जीवन का शहद तैयार नहीं होता. हमें ध्यान से देखना होगा कि हमारी बातचीत का कितना हिस्सा हमारी जरूरत और कितना हमारे मन से जुड़ा है!

अहमदाबाद से एक महीने पहले देवेंद्र शाह ने हमें लिखा कि दिनभर व्यापार के सिलसिले में लोगों से बातचीत करते रहते हैं. कोरोना के दौरान यह बातचीत कई गुना बढ़ गई, लेकिन तभी उनको एहसास हुआ कि कुछ ऐसा है जो छूट रहा है. मेरा सुझाव था कि उनको अपने कुछ मित्रों से नियमित रूप से अपने मन, जीवन और व्यापार से अलग विषयों पर बात करनी चाहिए. इससे मन के भीतर की पीड़ा बाहर आएगी. मन का ठीक तरह से स्नेहन (लुब्रिकेशन) करना होगा.


यह लिखते हुए प्रसन्नता हो रही है कि उन्होंने हर दिन होने वाली बातचीत में जबसे मन का हिस्सा बढ़ाया, तब से वह आनंदित हैं. खुश हैं. हम अपने मन, भीतर की घुटन को अक्सर ही टालते रहते हैं. आज नहीं, कल.




यह जानते हुए भी कि जो अभी नहीं हो सकता, उसका कभी होना तय नहीं. हमें अपने मन, जीवन को ऐसे लोगों का सहारा देना है जिनके भीतर हमदर्दी और करुणा का भंडार हो. जब तक हम दूसरों से प्रेम, करुणा और आनंद साझा नहीं करेंगे. हमारी ओर यह लौटकर नहीं आएगा.

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हमदर्द, बनने में कुछ नहीं जाता. कुछ नहीं मिलता. बस, जीवन की जड़ों को वह शक्ति मिलती है, जिससे जीवन आस्था गहरी होती है. एक भी आदमी का हमदर्द होना अपने आसपास प्रेम की मात्रा का बढ़ जाना है. आइए, हमदर्द बनकर देखते हैं !
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