#जीवनसंवाद: नाराज़गी और प्यार!

  • July 8, 2020, 12:38 am
नाराजगी और प्यार दोनों का एक साथ रहना इस बात पर निर्भर करता है कि जो लोग इस अनुभव से गुजर रहे हैं, उनके भीतर एक-दूसरे के लिए कितनी कोमलता है. आपने सूखते हुए तालाब देखे हैं! बाहर से जब वह सूख रहे होते हैं, तब भी उनके मध्य थोड़ा पानी बचा रहता है. वह पानी सूख जाता है तब भी कुछ दिनों तक वहां ज़रा सी खुदाई करने के बाद ही पानी निकलना आरंभ हो जाता है. बहुत कुछ सूखने के बाद भी थोड़ा बहुत बचा रहता है. हमारे रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं.

बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम भीतर से कैसे हैं. बाहर से प्रसन्नचित्त का अर्थ यह नहीं कि भीतर भी वैसा ही हो. कई बार यह भी हो सकता है कि कोई भीतर से बहुत आनंदित हो, लेकिन बाहर उसका प्रगटीकरण न होता हो. लेकिन ऐसी संभावना कम होती है क्योंकि जो भीतर से भरा हुआ है उसका आनंद बाहर तक न आए, यह कम ही देखने को मिलता है. फूल तब खिलता है, जब वह भीतर से प्रफुल्लित और आनंदित होता है. वह खूबसूरत है, इसलिए नहीं खिला. बल्कि इसलिए खिला और प्रसन्न है, क्योंकि उसके भीतर रस है! रस एकदम आंतरिक अनुभव है!

जयपुर से 'जीवन संवाद' के पाठक विशाल गोस्वामी बताते हैं कि उनके और बेटे के बीच दो बरस से संवाद बंद है. बेटा अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाहता था. जबकि विशाल घर में अपनी पसंद की बहू लाना चाहते थे. परिवार के बड़े बुजुर्गों की तमााम कोशिशों के बाद भी बात नहीं बनी और बेटे ने अपने चुनाव पर आगे बढ़ने का फैसला किया. जिस लड़की को उसने जीवनसाथी बनाना तय किया, उससे परिवार पहले से परिचित था. लेकिन सारा मतभेद केवल इस बात को लेकर था कि पिता यह फैसला अपने पास सुरक्षित रखना चाहते थे. इसलिए, क्योंकि परिवार में यह परंपरा अनेक वर्षों से चली आ रही थी.

बेटे को शादी के बाद परिवार के साथ रहने की अनुमति नहीं मिली. उसने जयपुर छोड़कर जोधपुर बसने का फैसला कर लिया. पिता तो पिता हैं. लेकिन घर में मां भी तो होती है! वह लगातार पति और बेटे के बीच पुल बनाने का काम करती रही. अंततः दो बरस बाद किसी तरह पिता को मनाया जा सका. लेकिन जीवन आसान नहीं है. जीवन अनेक रहस्य अपने भीतर छुपाए बैठा रहता है. जैसे ही पिता माने, कोरोना का संकट जीवन में खड़ा हो गया. जोधपुर में बेटे को कोरोना ने घेर लिया. अब वह ठीक है. लेकिन इस संकट में विशाल को एक ही बात सताती रही कि काश! उन्होंने स्वयं को पहले समझा लिया होता. बेटे के निर्णय को नाराज़गी से न जोड़ा होता.


हम अक्सर यही तो करते हैं, किसी के भी निर्णय को हम अपनी अवहेलना मान बैठते हैं. उसे अपनी अनदेखी से जोड़ लेते हैं. किसी दूसरे से प्रेम करना, उसके जीवन में प्रवेश करना, इसका अर्थ यह कभी नहीं होता कि जो पहले से है उसके प्रति मन में अनादर है. इसका अर्थ केवल इतना है कि जीवन में कुछ नया घटित है. मुझे माली की जीवन शैली कमाल की लगती है. माली हर पौधे को एक सरीखा स्नेह देता है. जो पौधा फूल दे रहा है उसका ध्यान रखते हुए वह जल्दी खिलने वाली कली का भी ख्याल रखता है. वह खिलते हुए फूलों, खिल चुके फूलों और अलग-अलग पड़ाव पर पहुंचे पौधों के बीच अंतर नहीं करता. हां, सबकी देखभाल जरूरत के मुताबिक करता है.
हमारी जिंदगी में अलग-अलग मोड़ पर अलग-अलग लोग जुड़ते हैं. बच्चा जब छोटा होता है, तो उसके जीवन में माता-पिता और भाई-बहन ही होते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि आगे चलते जीवन में नए लोग नहीं जुड़ेंगे. समय आने पर नए लोग जुड़ेंगे ही. ऐसे में जरूरी होता है कि जो पहले से जुड़े हैं, नए के आगमन के समय उनके प्रेम का भी खास ख्याल रखा जाए.


इससे संतुलन बना रहता है. हमारे जीवन में तीन चीज़ों का बड़ा महत्व है. गति, बाधा और संतुलन. जीवन गतिशील है लेकिन उसने बाधाएं भी आएंगी. तरह-तरह की. मुश्किल का कोई एक स्वभाव नहीं! वह रूप बदलकर आती है. ऐसे में संतुलन ही स्वभाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. नाराज़़गी के साथ प्रेम बनाए रखने की ज़रूरत केवल बड़े निर्णय के समय ही नहीं है, बल्कि जिंदगी के छोटे-छोटे फैसले में, हर दिन की जिंदगी में इसे संभालनेे की जरूरत है. अगर किसी से नाराज हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि प्यार भी खत्म हुआ. जैसे प्यार को बोया नहीं जा सकता, वैसे ही उसे काटा भी नहीं जा सकता. वह आता भी धीरे-धीरे हैं, और जाता तो उससे भी धीमे है!

दयाशंकर मिश्र
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