#जीवन संवाद : बस आज!

  • July 9, 2020, 11:47 pm
इन दिनों बहुत से ऐसे मित्रों से भी बात करने के अवसर मिल रहे हैं, जिनसे पहले बात करना सुलभ नहीं था. ऐसे मित्र जो पुलिस, डॉक्टर, पत्रकार नहीं हैं, उनके पास पहले के मुकाबले थोड़ा अधिक समय है. उनके पास इस समय अतीत के आंगन में झांकने और भविष्य के प्रति चिंतित होने के लिए पर्याप्त अवसर हैं. कोरोना हमारे जीवन पर इतनी संपूर्णता और व्यापकता से असर कर रहा है कि जो बच्चे हैं, यह उनकी स्मृति में स्थाई छाप, बड़ों के जीवन में भरपूर उथल-पुथल करके ही मानेगा.

ऐसे समय में जब सब तरफ नकारात्मकता पसरी हो जीवन को दिशा कैसे मिलेगी. बहुत ध्यान से देखने पर पाते हैं कि हम खुद को कितना निर्मल, दूसरों के हितैषी के रूप में देखते हैं. कोरोना हमें एहसास दिलाने के लिए पर्याप्त है कि अंततः हमारे हाथ बहुत छोटे हैं. मैं जिसे प्रकृति कहता हूं, आप उसे ईश्वर, अल्लाह, जिस किसी में आपकी आस्था हो, वह मान सकते हैं. यह प्रकृति अपने नियमों से बिल्कुल भी पीछे नहीं हटती. महाभारत का प्रसंग तो आपको याद ही होगा, जब अर्जुन के प्रश्न को नए आयाम देते हुए महानायक कृष्ण समझाते हैं कि मैं स्वयं भी प्रकृति के नियमों से बंधा हूं. मेरे लिए यह महाभारत के चुनिंदा जीवन दृष्टि से भरे वाक्य में से एक है. और बहुत प्रिय भी!

इंदौर से 'जीवन संवाद' के एक पाठक पेशे से बिजनेसमैन हैं. टेलीकॉम सेक्टर में हैं. कोरोना पर हमारी बहुत पहले से बात हो रही है. उनकी केवल चिंता इतनी है कि भविष्य क्या होगा. कल क्या होगा!. हम कितना पीछे छूट जाएंगे. हमारा जीवन स्तर कहीं दूसरों के मुकाबले पिछड़ ना जाए.

क्षमा कीजिएगा! लेकिन मुझे लगता है यह कैसी चिंता है जो आपके मन को नुकसान पहुंचाने के अलावा और कोई दूसरा काम नहीं करती. अतीत की जुगाली और अनदेखे भविष्य की चिंता दोनों ही मन को बीमार करने वाली हैं! केवल आज में रहना ही सबसे प्रसन्न चित्त जीवन शैली है. बीते हुए कल और आने वाले दोनों पर ही हमारा नियंत्रण नहीं हैं. नियंत्रण का दावा करने वालों के लिए कोरोना सबसे प्रासंगिक उदाहरण है.


एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं. सुरेश त्रिपाठी, इसलिए दुखी हैं क्योंकि उनको लगता है उनका पत्नी और बच्चों के प्रति व्यवहार ठीक नहीं. हर दिन वह अपने दोस्तों को यही कहानी सुनाते. एक दिन उनका एक दोस्त कहता है- आज तुम घर पर कुछ मत कहना. किसी भी बहाने चुप रहना. सुरेश ने कहा कि बहुत मुश्किल है, फिर भी तुम कहते हो तो करके देखता हूं. सुरेश के लिए मुश्किल था. शादी को पांच बरस हो गए थेे. जैसे हर दिन लड़ने की आदत हो गई थी. लेकिन सुरेश ने किसी तरह बात मान ली. अगले दिन जब वह ऑफिस आया तो उसके पास सुनाने को कोई झगड़ा नहीं था. केवल मौन का किस्सा था. उन्होंने अपना अतीत सुधार लिया क्योंकि अपने वर्तमान पर ध्यान दिया था. अगलेे दिन फिर इसी क्रम को जारी रखने का फैसला किया. वर्तमान (यानी केवल आज) पर ध्यान देने से उनके दोनोंं कल सुधरने लगे.

यह उदाहरण जानबूझकर ऐसे संबंध का दिया गया है, जिससे हम इसके महत्व को थोड़ी सरलता से समझ सकें. इसके अतिरिक्त इसे किसी दूसरे संदर्भ में समझने की कोशिश न करें. मैं आपको गौतम बुद्ध की कुछ बहुत खूबसूरत पंक्तियों के साथ छोड़कर जा रहा हूं. अतीत की गलियों में मत भटकिए, स्वयं को भविष्य की चिंता में मत गलाइए. अतीत का कोई अर्थ नहीं, कल किसी ने देखा नहीं!


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दयाशंकर मिश्र
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    चिंता के विचार आपकी ख़ुशी को बर्बाद कर सकते हैं। ऐसा न होने दें, क्योंकि इनमें अच्छी चीज़ों को ख़त्म करने की और समझदारी में निराशा का ज़हरीला बीज बोने की क्षमता होती है। ख़ुद को हमेशा अच्छा परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करें और ख़राब हालात में भी कुछ-न-कुछ अच्छा देखने का गुण विकसित करें। ख़ास लोग ऐसी किसी भी योजना में रुपये लगाने के लिए तैयार होंगे, जिसमें संभावना नज़र आए और विशेष हो। भूमि से जुड़ा विवाद लड़ाई में बदल सकता है। मामले को सुलझाने के लिए अपने माता-पिता की मदद लें। उनकी सलाह से काम करें, तो आप निश्चित तौर पर मुश्किल का हल ढूंढने में क़ामयाब रहेंगे। किसी से अचानक हुई रुमानी मुलाक़ात आपका दिन बना देगी। काम के लिए समर्पित पेशेवर लोग रुपये-पैसे और करिअर के मोर्चे पर फ़ायदे में रहेंगे। सफ़र के लिए दिन ज़्यादा अच्छा नहीं है। जीवनसाथी के ख़राब व्यवहार का नकारात्मक असर आपके ऊपर पड़ सकता है। स्वयंसेवी कार्य या किसी की मदद करना आपकी मानसिक शांति के लिए अच्छे टॉनिक का काम कर सकता है। परेशान? आप पंडित जी से प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
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