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अशोक वाजपेयी जन्मदिन विशेष: तीन कविताएं

  • January 16, 2021, 11:30 am
दोस्तों आज अशोक वाजपेयी का जन्मदिन है. प्रतीकों और बिंबो के मार्फत प्रेम, पीड़ा, इंतजार और परिणति की गहरी संवेदनाओं को अद्भुत तरीके से शब्दों में पिरो देने वाले अशोक वाजपेयी की हर कविता अपने अंत के साथ एक शुरुआत छोड़ जाती है. आइए आज उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं सुनें. मैं पूजा प्रसाद, न्यूज18 हिन्दी के लिए आज के पॉडकास्ट में आपका स्वागत करती हूं.

उनकी पहली कविता का शीर्षक है, थोड़ा-सा आदमी

अगर बच सका
तो वही बचेगा
हम सबमें थोड़ा-सा आदमी–

जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर,

जो रास्ते पर पड़े घायल को सब काम छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गवाही देने से नहीं हिचकिचाता–

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो धोखा खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को थिगड़े पहनने पर मजबूर नहीं करता,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

वही थोड़ा-सा आदमी–
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बचाता है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बना देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता

वही थोड़ा-सा आदमी–
जिसे ख़बर है कि
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण

वही थोड़ा-सा आदमी–
अगर बच सका तो
वही बचेगा।

कवि, साहित्यकार और स्तंभकार अशोक वाजपेयी के नाम कई कविता संग्रह दर्ज हैं. जैसे, शहर अब भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, अगर इतने से, जो नहीं हैं, तत्पुरुष, कहीं नहीं वहीं, घास में दुबका आकाश, तिनका तिनका, उजाला एक मंदिर बनाता है. वहीं, समय से बाहर, कविता का गल्प, पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज जैसे आलोचनाएं भी उनके नाम दर्ज हैं. उन्होंने कविता एशिया, तीसरा साक्ष्य, कुमार गंधर्व, मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कविताएँ जैसे कई संपादन कार्य भी दर्ज हैं. पोलिश कवि तादेऊष रूजेविच की कविताओं का अनुवाद उन्होंने जीवन के बीचोंबीच नाम से किया है. देश ही नहीं पोलिश और फ्रांसीस सरकार द्वारा भी वे सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं.

उनकी जिस दूसरी कविता को मैं पढ़ने जा रही हूं, उसका नाम है - तुम जहाँ कहो

तुम जहाँ कहो
वहाँ चले जायेंगे
दूसरे मकान में
अँधेरे भविष्य में
न कहीं पहुँचने वाली ट्रेन में

अपना बसता-बोरिया उठाकर
रद्दी के बोझ सा
जीवन को पीठ पर लादकर
जहाँ कहो वहाँ चले जायेंगे
वापस इस शहर
इस चौगान, इस आँगन में नहीं आयेंगे

वहीं पक्षी बनेंगे, वृक्ष बनेंगे
फूल या शब्द बन जायेंगे
जहाँ तुम कभी खुद नहीं आना चाहोगे
वहाँ तुम कहो तो
चले जायेंगे

दोस्तो, कवि की कविताएं अपने आप में एक पूरा संसार होती हैं. ऐसा ही एक संसार अशोक वाजपेयी इस कविता के मार्फत रचते हैं.

कोई नहीं सुनता चीख

कोई नहीं सुनता चीख
कोई नहीं सुनता चीख --
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाए पेड़ पर अचानक आ गई नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं कि यह चीख है
या कि आवाजों के तुमुल में से एक और आवाज।
कोई नहीं सुनता प्रार्थना --
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुँही बच्ची,
जो आदिम अँधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतनी भौचक है
कि उसके लिए अभी आवाज
होने, न होने के बीच का सुनसान है।

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