बुरे वक्त में हिम्मत देतीं ग़ज़लें और कविताएं: आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है...

  • May 8, 2021, 6:07 pm

संघर्ष के रास्ते भले अलग हों, लेकिन इन रास्तों की मंजिल एक ही है. इस मंजिल तक पहुंचने में जाहिर तौर पर कई मोड़ आएंगे, कई पड़ाव आएंगे. और ऐसे ही किसी पड़ाव या किसी मोड़ पर हम जरूर मिलेंगे.



दोस्तों, वक्त मुश्किलों से भरा है. लेकिन इन्हीं मुश्किलों के बीच से रास्ता निकालना एकमात्र विकल्प है. और इंसान की पहचान बाकी प्राणियों से अलग इसीलिए तो है कि वह हर मुश्किल से जूझने वाला है, समर्पण करने वाला नहीं. तो ऐसे ही जूझते वक्त में मैं पूजा प्रसाद कविताएं और ग़ज़लों को हथियार की तरह लेकर आई हूं, जो इस मुश्किल वक्त पर जूझने का हौसला देता है, रास्ता सुझाता है. पहली कविता है प्रश्न

प्रश्न

आमने-सामने बैठे थे
रामदास मनुष्य और मानवेन्द्र मंत्री
रामदास बोले आप लोगों को मार क्यों रहे हैं ?
मानवेन्द्र भौंचक सुनते रहे
थोड़ी देर बाद रामदास को लगा
कि मंत्री कुछ समझ नहीं पा रहे हैं
और उसने निडर होकर कहा
आप जनता की जान नहीं ले सकते
सहसा बहुत से सिपाही वहाँ आ गए ।

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रघुवीर सहाय की यह कविता कसैला सा स्वाद भर देती है. खासतौर से ऐसे समय में जब हमारे अपने, हमारे साथी, हमवतन इंसान- लोग एक के बाद एक कोरोना के हाथों मारे जा रहे हैं. जाहिर है यह कसैला स्वाद हममें आक्रोश भरता है और याद आ जाते हैं दुष्यंत कुमार, जिन्होंने कहा था

कहां तो तय था चराग़ां हर एक घर के लिये
कहां चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो पांवों से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूं आवाज़ में असर के लिये

इस बेकरारी को राहत मिलेगी कैफी आजमी के पास जाकर. उनकी यह कविता आवाज में असर पैदा करती हुई सी लगती है. सुनें कैफी आजमी की यह कविता

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थी,
पांव जब टूटती शाखों से उतारे हमने,
इन मकानों को ख़बर है न, मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हमने।

हाथ ढलते गए सांचों में तो थकते कैसे,
नक़्श के बाद नए नक़्श निखारे हमने,
की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,
बाम-ओ-दर और ज़रा और निखारे हमने।

आंधियां तोड़ लिया करती थीं शामों की लौएं,
जड़ दिए इसलिए बिजली के सितारे हमने,
बन गया कस्र तो पहरे पे कोई बैठ गया,
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिए।

अपनी नस-नस में लिए मेहनत-ए-पैहम की थकन,
बन्द आँखों में इसी कस्र की तस्वीर लिए,
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,
रात आँखों में खटकती है सियाह तीर लिए।

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूं, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।

उम्मीद का जो दिया कैफी आजमी जलाने की कोशिश करते हैं, उसे कुछ और तेज़ हवा देकर बुलंद करते हैं खलील जिब्रान अपनी कविता जियो मुकम्मल जिन्दगी में. इसका हिन्दी में अनुवाद किया है लेखक, पत्रकार और कवि भुवेन्द्र त्यागी ने.

जियो मत कभी आधी जिंदगी
और न ही मरो मौत आधी
मौन रहना चाहो, तो रहो मौन ही
जब बोलो, तो बोलो फना होने तक
रजामंद हो, तो बेखौफ करो इजहार
उस पर न हो मुखौटा कोई
इनकार करने में भी हो साफगोई
कई मायनों वाला इनकार
बनता अक्सर कमजोर इजहार
मत करो मंजूर आधा हल
कभी मत मानो आधा सच
आधी उम्मीदों का न आए ख्वाब
आधी राह की कोई मंज़िल नहीं
आधी नहीं,
मुकम्मल ज़िन्दगी जीने का है वजूद तुम्हारा।

मगर दर्द से निजात पाना उतना भी आसान नहीं... भवानी प्रसाद मिश्र अपनी कविता में कहते हैं-

मैंने निचोड़कर दर्द
मन को
मानो सूखने के ख्याल से
रस्सी पर डाल दिया है
और मन
सूख रहा है
बचा-खुचा दर्द
जब उड़ जायेगा
तब फिर पहन लूँगा मैं उसे
माँग जो रहा है मेरा
बेवकूफ तन
बिना दर्द का मन !

भवानी प्रसाद की कविता के इस तन की बेवकूफी और मन के दर्द को निचोड़ने की पहल को आगे तक ले जाते हैं कवि कुंवर नारायण. वह समझाते हैं कि जीवन के रास्ते आसान नहीं होते. अनगढ़ रास्ते हमें ही गढ़ने हैं, उन्हीं पर बढ़ना है और मंजिल पाने तक पूरी शिद्दत से चलते जाना है. कुंवर नारायण कहते हैं
कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब
अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं,
हमारे चारों ओर नहीं।
कितना आसान होता चलते चले जाना
यदि केवल हम चलते होते
बाक़ी सब रुका होता।
मैंने अक्सर इस ऊलजलूल दुनिया को
दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में
अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।
शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं
कि सब कुछ शुरू से शुरू हो,
लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं।
हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती
कि वह सब कैसे समाप्त होता है
जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था
हमारे चाहने पर।
दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए
जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे—
जब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में
जिन्हें तुमने जीता है—
जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ़ का पहला तूफ़ान झेलोगे
और काँपोगे नहीं—
तब तुम पाओगे कि कोई फ़र्क़ नहीं
सब कुछ जीत लेने में
और अंत तक हिम्मत न हारने में।

कुंवर नारायण यह जो हिम्मत न हारने और सब कुछ जीत लेने का मंत्र हमें देते हैं, वह सचमुच मजबूती देती है. फिर भी हम आने वाले वक्त के लिए दुआ करेंगे.. आने वाली पीढ़ी के लिए प्रार्थनाएं करेंगे और चाहेंगे कि जो गलतियां हमने कीं, वे उनसे न हों. जो हमने भोगा, वह वे न भोगें. बशीर बद्र की यह कविता सही ही तो कहती है...

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी
नए लोग होंगे नई बात होगी

मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी

चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी

परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी
चलो मय-कदे में वहीं बात होगी

चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी

जहाँ वादियों में नए फूल आए
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी

सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी

मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी

इसे भी पढ़ेंः Podcast: दुष्यंत कुमार की 5 ग़ज़लें- मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूंं वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूंं...

हां दोस्तो, संघर्ष के रास्ते भले अलग हों, लेकिन इन रास्तों की मंजिल एक ही है. इस मंजिल तक पहुंचने में जाहिर तौर पर कई मोड़ आएंगे, कई पड़ाव आएंगे. और ऐसे ही किसी पड़ाव या किसी मोड़ पर हम जरूर मिलेंगे. फिलहाल चलिए हम अपने-अपने संघर्ष के रास्तों पर पूरे हिम्मत के साथ आगे बढ़ें, फिर अगले चौराहे पर मिलती हूं किसी और रचनाकार के साथ, तब तक के लिए पूजा को दें विदा. नमस्कार.

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    चिंता के विचार आपकी ख़ुशी को बर्बाद कर सकते हैं। ऐसा न होने दें, क्योंकि इनमें अच्छी चीज़ों को ख़त्म करने की और समझदारी में निराशा का ज़हरीला बीज बोने की क्षमता होती है। ख़ुद को हमेशा अच्छा परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करें और ख़राब हालात में भी कुछ-न-कुछ अच्छा देखने का गुण विकसित करें। ख़ास लोग ऐसी किसी भी योजना में रुपये लगाने के लिए तैयार होंगे, जिसमें संभावना नज़र आए और विशेष हो। भूमि से जुड़ा विवाद लड़ाई में बदल सकता है। मामले को सुलझाने के लिए अपने माता-पिता की मदद लें। उनकी सलाह से काम करें, तो आप निश्चित तौर पर मुश्किल का हल ढूंढने में क़ामयाब रहेंगे। किसी से अचानक हुई रुमानी मुलाक़ात आपका दिन बना देगी। काम के लिए समर्पित पेशेवर लोग रुपये-पैसे और करिअर के मोर्चे पर फ़ायदे में रहेंगे। सफ़र के लिए दिन ज़्यादा अच्छा नहीं है। जीवनसाथी के ख़राब व्यवहार का नकारात्मक असर आपके ऊपर पड़ सकता है। स्वयंसेवी कार्य या किसी की मदद करना आपकी मानसिक शांति के लिए अच्छे टॉनिक का काम कर सकता है। परेशान? आप पंडित जी से प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
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