रघुवीर सहाय की कविताएं: सभी लुजलुजे हैं, पढ़िए गीता, गुलामी, अधिनायक

  • December 7, 2021, 3:27 pm

रघुवीर सहाय साहब अपनी कविताओं के ज़रिए चाहते थे कि स्त्रियां जगें और खिसका दे तमाम मर्दों के पांव तले की ज़मीन. लेकिन उन्होंने समाज की नब्ज़ पकड़ी थी, वे इस समाज की तमाम बुराइयों से परिचित थे. जीवन में उन्होंने ठाठ भी भोगे और मुफलिसी भी झेली थी. विद्रोह की अपनी जो ज्वाला लोग उनके सामने दिखाते थे, उनके मुड़ते ही वह ज्वाला कैसे हवा हो जाती थी



पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सब में लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घर-बार बसाइए..

होंय कँटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली, तबीयत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइए…

पढ़ने और सुनने में रघुवीर सहाय की यह कविता तुकांत लग सकती है, लेकिन सच तो यह है कि समाज में बेतुके तरीके से हाशिये पर ठेली गई आधी आबादी को जगाने की यह एक गंभीर और ज़रूरी कोशिश है. न्यूज 18 हिन्दी के स्पेशल पॉडकास्ट में मैं पूजा प्रसाद आपका स्वागत करती हूं. आज हम बात करेंगे रघुवीर सहाय की कविताओं की. मुझे नहीं लगता कि कभी आपकी मुलाकात किसी ऐसे कवि से हुई होगी जो समाज में स्त्रियों की स्थिति, उसकी शिक्षा की गति और उसकी नियति को महसूस करके दुनिया-जहान के प्रति क्षोभ से भर उठा हो. ऐसा कवि जो स्त्रियों को संघर्ष के रास्ते पर खींचकर लाने के लिए खीझकर कहने लगे कि पढ़िए गीता, बनिए सीता के पाठ को भूल जा!

रघुवीर सहाय अपनी इस कविता में बताना चाहते हैं कि स्त्रियां सिर्फ चावल पकाने या फिर बच्चा जनने की मशीन नहीं होतीं. वह भी पुरुषों की तरह हाड़-मांस की बनी होती हैं, जिसमें धड़कता हुआ दिल भी होता है. यह दिल भी अपने दिल की करना चाहता है. लेकिन इस मर्दवादी समाज में उसे धड़कने के लिए अवसर चुराना पड़ता है, इस चुराने के लिए कई कई बार लड़ना पड़ता है, और लड़कर अगर थोड़ा धड़क भी लिए तो पता नहीं कितने पांवों तले ज़मीन खिसकने लगती है.

रघुवीर सहाय साहब अपनी कविताओं के ज़रिए चाहते थे कि स्त्रियां जगें और खिसका दे तमाम मर्दों के पांव तले की ज़मीन. लेकिन उन्होंने समाज की नब्ज़ पकड़ी थी, वे इस समाज की तमाम बुराइयों से परिचित थे. जीवन में उन्होंने ठाठ भी भोगे और मुफलिसी भी झेली थी. विद्रोह की अपनी जो ज्वाला लोग उनके सामने दिखाते थे, उनके मुड़ते ही वह ज्वाला कैसे हवा हो जाती थी – इसे वह बखूबी समझते थे. तभी तो उन्होंने लिखा न – ‘सभी लुजलुजे हैं’.. आइए सुनें…

खोंखियाते हैं, किंकियाते हैं, घुन्‍नाते हैं
चुल्‍लु में उल्‍लू हो जाते हैं

मिनमिनाते हैं, कुड़कुड़ाते हैं
सो जाते हैं, बैठ जाते हैं, बुत्ता दे जाते हैं

झांय झांय करते है, रिरियाते हैं,
टांय टांय करते हैं, हिनहिनाते हैं
गरजते हैं, घिघियाते हैं
ठीक वक़्त पर चीं बोल जाते हैं

सभी लुजलुजे हैं, थुलथुल है, लिब लिब हैं,
पिलपिल हैं,
सबमें पोल है, सब में झोल है, सभी लुजलुजे हैं।

इस नकली चेहरे की पहचान रघुवीर सहाय को अच्छी खासी थी. उन्होंने यह भी जाना था कि किसी इनसान को कमजोर बनाने के लिए समाज का एक तबका कैसे-कैसे कुचक्र रचता है. यह खास तबका दिखाना चाहता है कि वह भलाई कर रहा है, लेकिन कई बार सचाई तो कुछ और होती है. कभी कभी यह कल्याण नहीं, शोषण होता है. इस शोषण करने वाले का जो नकली दंभ है, उसकी भी परतें उघाड़ देते हैं रघुवीर सहाय. वह बतलाते हैं कि जो शख्स तुम्हें गुलाम बना रहा, दरअसल वह भी किसी की गुलामी कर रहा है. रघुवरी सहाय को पढ़ते हुए जाना जा सकता है कि स्त्री हो या पुरुष – वह किसी को भी गुलाम बने देखना स्वीकार नहीं सकते थे. उनकी अगली कविता का शीर्षक है ‘गुलामी’

मनुष्य के कल्याण के लिए
पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह और कुछ
सोच न पाए
फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली ज़रूरत रोटी है
जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंज़ूर करेगा
फिर तो उसे यह बताना रह जाएगा कि
अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है
और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों
जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी क्या बुरी है
तुम्हें रोटी तो मिल रही है एक जून।

मनुष्य की पोसी हुई गुलामी पर इतना तीखा व्यंग्य वही कर सकता है जिसने समाज की नस को बारीकी से पकड़ा हो. आज हम जिस रचनाकार से रूबरू हो रहे हैं, वह संपादक होने के साथ-साथ एक ऐसे कवि भी थे जिन्हें पढ़ने के बाद अंधरे में रोशनी की लकीर दिखने लगती थी. रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर 1929 को हुआ था और निधन 30 दिसंबर 1990 को. लेकिन सच है कि रघुवीर सहाय की कविताओं से गुजरते हुए जो संवेदना हाथ लगती है, वह अहसास कराती है कि यह कवि तो पल-पल तिल-तिल कर मरता रहा होगा! अपने मरने के दौरान कविता लिखता होगा… और फिर कविताओं की जड़ी-बूटी से ही खुद का इलाज करता होगा… खुद को झाड़-पोंछ कर खड़ा होता होगा… फिर से किसी संवेदनशील मुद्दे पर लड़ने और विचारते हुए मरने के लिए. अब देखिए न उनके चिंतन का फैलाव इस ‘अधिनायक’ शीर्षक की कविता में…

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है

पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा
उनके
तमगे कौन लगाता है

कौन-कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है

फटा सुथन्ना पहनने वाले किसी हरचरणा की चिंता में डूबे किसी और कवि को देखा है क्या आपने? जी हां दोस्तो, अपने आसपास देखें, और हो सके तो खुद में भी देखें . कहीं कोई झोल या लुजलुजापन दिखे तो उसे जितनी जल्दी हो दूर कर सकें दूर कर लें. रघुवीर सहाय को पढ़ने की सार्थकता भी तब ही है, जब आप अपने साथ साथ दूसरों को भी उनकी कमजोरियों से बाहर निकाल लाएं. हम्म.. तो दोस्तो फिलहाल तो घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही हैं… और मुझे ही एक इशारा कर रही हैं, तो दोस्तो विदा दें पूजा प्रसाद को. फिर मिलूंगी अगले पॉडकास्ट में एक और रचनाकर के साथ. नमस्कार

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