स्मृति शेष: मंगलेश डबराल, जिन्होंने कहा था 'मैं चाहता हूं,' 'पहाड़ पर लालटेन...'

  • December 21, 2020, 4:30 pm
नई दिल्ली. ​न्यूज18 के पॉडकास्ट में आज हम आपके लिए लाए हैं किताबों की दुनिया के, एक नायाब हीरे की चमक का, एक छोटा सा हिस्सा... वह हीरा, जिसे हमने वक्त से बहुत पहले खो दिया है, लेकिन जिसकी चौंध हम आज भी महसूस कर रहे हैं. 9 दिसबर 2020 को चर्चित और आदरणीय साहित्यकार मंगलेश डबराल हम सबको छोड़कर चले गए... अपने पीछे छोड़ गए हैं वे कुछ अनूठी रचनाएं जो जेहन में लगातार गूंज रही हैं... हम भूल ही नहीं पा रहे एक शानदार पत्रकार और एक संवेदनशील कवि को... उनके सरल सहज व्यक्तित्व और कविताओं पर पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है, लेकिन हर बार कुछ न कुछ अनकहा रह ही जाता है..

न भूले जा सकने वाले 72 साल के मंगलेश डबराल जी की दो कविताएं (Manglesh Dabral)आज हम आपको पढ़ा रहे हैं..

पहाड़ पर लालटेन

जंगल में औरतें हैं
लकड़ियों के गट्ठर के नीचे बेहोश
जंगल में बच्चे हैं
असमय दफ़नाये जाते हुए
जंगल में नंगे पैर चलते बूढ़े हैं
डरते खांसते अंत में ग़ायब हो जाते हुए
जंगल में लगातार कुल्हाड़ियां चल रही हैं
जंगल में सोया है रक्त

धूप में तपती हुई चट्टानों के पीछे
वर्षों के आर्त्तनाद हैं
और थोड़ी-सी घास है
पानी में हिलती हुई
अगले मौसम के जबड़े तक पहुंचते पेड़
रातोंरात नंगे होते हैं
सुई की नोंक जैसे सन्नाटे में
जली हुई धरती करवट लेती है
और विशाल चक्के की तरह घूमता है आसमान

जिसे तुम्हारे पूर्वज लाये थे यहां तक
वह पहाड़ दुख की तरह टूटता आता है हर साल
सारे वर्ष सारी सदियां
बर्फ़ की तरह जमती जाती है निःस्वप्न आंखों में
तुम्हारी आत्मा में
चूल्हों के पास पारिवारिक अंधकार में
बिखरे हैं तुम्हारे लाचार शब्द
अकाल में बटोरे गये दानों जैसे शब्द

दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज आंख की तरह
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गये गहने
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आये हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ़ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।



उनकी दूसरी कविता का शीर्षक है- मैं चाहता हूं
मैं चाहता हूं कि स्पर्श बचा रहे
वह नहीं जो कंधे छीलता हुआ
आततायी की तरह गुज़रता है
बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद
धरती के किसी छोर पर पहुंचने जैसा होता है

मैं चाहता हूं स्वाद बचा रहे
मिठास और कड़वाहट से दूर
जो चीज़ों को खाता नहीं है
बल्कि उन्हें बचाए रखने की कोशिश का
एक नाम है

एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है
मसलन यह कि हम इंसान हैं
मैं चाहता हूं इस वाक्य की सचाई बची रहे
सड़क पर जो नारा सुनाई दे रहा है
वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ

मैं चाहता हूं निराशा बची रहे
जो फिर से एक उम्मीद
पैदा करती है अपने लिए

शब्द बचे रहें
जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते
प्रेम में बचकानापन बचा रहे
कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा.

साथियो, एक और साल खत्म होने को है और एक और साल आने को है.. हम आने वाले समय में आपसे बांटेगे कुछ और खूबसूरत रचनाएं, कुछ और संवेदनशील लेकिन संजीदा व्याख्यान... जल्द ही आपसे फिर मुलाकात होगी, एक नए विषय और जरूरी जानकारियों के साथ.

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