कमला दास उर्फ कमला सुरैया की कविताएं: कीड़े, उन्माद एक ऐसा देश है, आईना

  • September 24, 2021, 8:04 am

महिलाओं पर बंदिशों, पुरुष प्रधान समाज के नियमों, यौनिकता, रजोनिवृत्ति जैसे कई टैबू समझे जाने वाले विषयों पर कमला दास लगातार लिखती रहीं और आलोचना की शिकार होती रहीं.



नमस्कार दोस्तों, न्यूज18 हिन्दी के स्पेशल पॉडकास्ट में मैं पूजा प्रसाद आपका स्वागत करती हूं. दोस्तो आज बात एक बेबाक विद्रोही लेखिका की जिनकी आत्मकथा ‘एंते कढा’ ने देशभर में हंगामा बरपा दिया था. बाद में माई स्टोरी नाम से इनकी आत्मकथा का अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ. इनके जीवन पर आमी नाम से एक फिल्म भी बनाने की घोषणा हुई लेकिन यह भी विवादों में घिरी और मामला केरल हाई कोर्ट तक जा पहुंचा. 1999 में जब इन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया तब भी बहुत हंगामा हुआ. उन्होंने धर्मांतरण के बाद कहा था- मैंने अपने कृष्ण को अल्लाह में रुपांतरित कर दिया.

इनके बारे में कुछ और जानने से पहले आइए, बांचते हैं कविता-कीड़े

साँझ ढले, नदी के तट पर
कृष्ण ने आख़िरी बार उसे प्रेम किया
और चले गए फिर उसे छोड़कर

उस रात अपने पति की बाँहों में
ऐसी निष्चेष्ट पड़ी थी राधा
कि जब उसने पूछा
‘क्या परेशानी है ?
क्या बुरा लग रहा है तुम्हें मेरा चूमना, मेरा प्रेम’

तो उसने कहा
‘नहीं…बिल्कुल नहीं’

लेकिन सोचा —
‘क्या फ़र्क पड़ता है किसी लाश को
किसी कीड़े के काटने से !

महिलाओं पर बंदिशों, पुरुष प्रधान समाज के नियमों, यौनिकता, रजोनिवृत्ति जैसे कई टैबू समझे जाने वाले विषयों पर कमला दास लगातार लिखती रहीं और आलोचना की शिकार होती रहीं, मगर आरोप-प्रत्यारोपों से उनकी कलम रुकी नहीं. आइए सुनते हैं इनकी अगली कविता- उन्माद एक ऐसा देश है

उन्माद एक ऐसा देश है
यहीं कहीं तुम्हारे आस-पास ही
जिसके कगार सदा अन्धियारे रहते हैं

पर जब कभी निराशा की नौका
तुम्हें ठेलकर अन्धेरे कगारों तक ले जाती है
तो उन कगारों पर तैनात पहरेदार
पहले तो तुम्हें निर्वसन होने का आदेश देते हैं
तुम कपड़े उतार देते हो
तो वे कहते हैं, अपना माँस भी उघाड़ो

और तुम त्वचा उतारकर
अपना माँस भी उघाड़ देते हो
फिर वे कहते हैं कि हडिड्याँ तक उघाड़ दो
और तब तुम अपना माँस नोच-नोच फेंकने लगते हो
और नोचते-फेंकते चले जाते हो
जब तक कि हड्डियाँ पूरी तरह नंगी नहीं हो जातीं

उन्माद के इस देश का तो एकमात्र नियम है उन्मुक्तता
और वे उन्मुक्त हो
न केवल तुम्हारा शरीर
बल्कि आत्मा तक कुतर-कुतर खा डालते हैं

पर फिर भी
मैं कहूँगी कि
यदि तुम कभी उस अन्धेरे कगार तक जा ही पहुँचो
तो फिर लौटना मत
कभी मत लौटना ।

इनका जन्म 1934 में केरल के त्रिसूर जिले में हुआ था. प्रबंधन विशेषज्ञ वीएम नायर और जानी मानी कवयित्री बालामणियम्मा की बेटी थीं कमला. उनका नाम रखा गया माधवी कुट्टी. इस नाम से उनकी कई लघुकथाएं भी पब्लिश हुईं. छह वर्ष की आयु से ही लिखती आ रहीं कमला दास का महज 15 साल की उम्र में ही विवाह हो गया था. ‘समर इन कलकत्ता’ नामक कविता संग्रह से वह चर्चा में आईं. इनकी कई दीगर कृतियों में से कुछ हैं- द डिसेंडेंट, अल्फ़ाबेट ऑफ़ लस्ट, ऐन इंट्रोडक्शन, ओनली सोल नोज़ हाऊ टु सिंग. सुनते हैं कमला दास की कविता- आईना
आसान है एक मर्द की तलाश जो तुम्हें प्यार करे
बस, तुम ईमानदार रहो कि एक औरत के रूप में तुम चाहती क्या हो
आईने के सामने उसके साथ नग्न खड़ी हो
ताकि वह देख सके कि वह है तुमसे ज़्यादा मजबूत
और इस पर भरोसा करे
और तुम और ज्यादा कोमल जवान प्यारी दिखो
स्वीकृति दो अपनी प्रशंसा को ।

उसके अंगों की पूर्णता पर ध्यान दो
झरने के नीचे लाल होती उसकी आँखें
बाथरूम की फ़र्श पर वही शर्माती चाल
तौलिये को गिराना, और उसका हिला कर पेशाब करने का तरीका
उन सभी बातों का प्रशंसनीय ब्यौरा जो उसे मर्द बनाती है
तुम्हारा इकलौता मर्द ।

उसे सब सौंप दो
वह सब सौंप दो जो तुम्हें औरत बनाती है
बड़े बालों की ख़ुशबू
स्तनों के बीच पसीने की कस्तूरी
तुम्हारी माहवारी के लहू की गर्म झनझनाहट
और तुम्हारी वे सब स्त्री भूख ।

हाँ, आसान है एक मर्द पाना जिसे तुम प्यार कर सको
लेकिन उसके बाद उसके बिना रहने का सामना करना पड़ सकता है ।

ज़िन्दगी के बिना ज़िन्दा रहना
जब तुम आसपास घूमती हो
अजनबियों से मिलती हो
उन आँखों के साथ जिन्होंने अपनी तलाश छोड़ दी है
कान जो बस उसकी अन्तिम आवाज़ सुनते हैं कि वह पुकारता है तुम्हारा नाम
और तुम्हारी देह जो कभी उसके स्पर्श से चमकते पीतल-सा जगमगाती थी
जो अब फीकी और बेसहारा है ।

कमला दास को अपनी रचनाओं के लिए कई पुरस्कार और सम्मान मिले. इनमें साहित्य अकादमी और केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा एसियन पोएट्री प्राइज़, केंड अवार्ड फ़ॉर इंग्लिश राइटिंग फ़्रॉम एसियन कंट्रीज भी शामिल हैं. किसी लेखिका को पढ़ना, उसे जानना और समझना.. एक बहती हुई नदी को जीना है. एक ऐसी यात्रा पर निकल पड़ना है जो बहुत लंबी है. लेकिन हमारे पास तो समय सीमित है न. तो दोस्तो पूजा प्रसाद को दीजिए विदा. जल्दी ही फिर मिलूंगी आपसे एक और रचनाकार के साथ.

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