प्रेमचंद की कहानी 'त्रिया चरित्र' का दूसरा और आखिरी भाग

  • May 12, 2022, 2:51 pm

त्रिया चरित्र जैसे विवादास्पद शब्द का प्रेमचंद ने खूबसूरती से इस्तेमाल किया और एक मार्मिक ताना बाना बुन दिया जिसने हमें बताया कि दुनिया बहुत छोटी है और हमारी मुलाकात कभी भी किसी से भी हो सकती है.



न्यूज 18 हिन्दी के पॉडकास्ट में एक बार फिर से आपका स्वागत है. आप सुन रहे हैं प्रेमचंद की कहानी त्रिया चरित्र. अब तक की कहानी में आपने यह जाना कि सेठ लगनदास जी के गोद लिए बेटे मगनदास के जीवन में एक तूफान अचानक आया, जिसने उसे एक अलग ही रास्ते पर ला पटका है… आइए सुनते हैं त्रिया चरित्र का अगला हिस्सा.

यहां क्लिक करके ​सुनें प्रेमचंद की कहानी त्रिया चरित्र का पहला भाग

एक रोज जब शाम के वक्त वह अंधेरे में खाट पर पड़ा हुआ था, एक औरत उसके दरवाजे पर आकर भीख मांगने लगी. मगनदास को आवाज परिचित जान पड़ी. बाहर आकर देखा तो वही चम्पा मालिन थी. कपड़े तार–तार, मुसीबत की रोती हुई तस्वीर. बोला-मालिन? तुम्हारी यह क्या हालत है. मुझे पहचानती हो?

मालिन ने चौंककर देखा और पहचान गई. रोकर बोली –बेटा, अब बताओ मेरा कहां ठिकाना लगे? तुमने मेरा बना बनाया घर उजाड़ दिया न उसे दिन तुमसे बात करती ने मुझे पर यह बिपत पड़ती. बाई ने तुम्हें बैठे देख लिया, बातें भी सुनी सुबह होते ही मुझे बुलाया और बरस पड़ी नाक कटवा लूंगी, मुंह में कालिख लगवा दूंगी, चुड़ैल, कुटनी, तू मेरी बात किसी गैर आदमी से क्यों चलाये? तू दूसरों से मेरी चर्चा करे? वह क्या तेरा दामाद था, जो तू उससे मेरा दुखड़ा रोती थी? जो कुछ मुंह मे आया बकती रही मुझसे भी न सहा गया. रानी रुठेंगी अपना सुहाग लेंगी! बोली-बाई जी, मुझसे कसूर हुआ, लीजिए अब जाती हूँ छींकते नाक कटती है तो मेरा निबाह यहाँ न होगा. ईश्वर ने मुंह दिया है तो आहार भी देगा चार घर से मांगूंगी तो मेरे पेट को हो जाऐगा.. उस छोकरी ने मुझे खड़े-खड़े निकलवा दिया. बताओ मैंने तुमसे उसकी कौन सी शिकायत की थी? उसकी क्या चर्चा की थी? मै तो उसका बखान कर रही थी. मगर बड़े आदमियों का गुस्सा भी बड़ा होता है. अब बताओ मै किसकी होकर रहूं? आठ दिन इसी दिन तरह टुकड़े माँगते हो गये है. एक भतीजी उन्हीं के यहाँ लौंडियों में नौकर थी, उसी दिन उसे भी निकाल दिया. तुम्हारी बदौलत, जो कभी न किया था, वह करना पड़ा तुम्हें कहो का दोष लगाऊं किस्मत में जो कुछ लिखा था, देखना पड़ा.

सुनें निर्मल वर्मा की कहानी परिंदे- भाग एक
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मगनदास सन्नाटे में जो कुछ लिखा था. आह मिजाज का यह हाल है, यह घमण्ड, यह शान! मालिन का इत्मीनन दिलाया उसके पास अगर दौलत होती तो उसे मालामाल कर देता सेठ मक्खनलाल की बेटी को भी मालूम हो जाता कि रोजी की कूंजी उसी के हाथ में नहीं है. बोला-तुम फिक्र न करो, मेरे घर मे आराम से रहो अकेले मेरा जी भी नहीं लगता. सच कहो तो मुझे तुम्हारी तरह एक औरत की तलाश थी, अच्छा हुआ तुम आ गयीं.
मालिन ने आंचल फैलाकर असीम दिया– बेटा तुम जुग-जुग जियों बड़ी उम्र हो यहां कोई घर मिले तो मुझे दिलवा दो. मैं यही रहूंगी तो मेरी भतीजी कहाँ जाएगी. वह बेचारी शहर में किसके आसरे रहेगी.

मगनलाल के खून में जोश आया. उसके स्वाभिमान को चोट लगी. उन पर यह आफत मेरी लायी हुई है. उनकी इस आवारागर्दी का जिम्मेदार मैं हूं. बोला–कोई हर्ज न हो तो उसे भी यहीं ले आओ. मैं दिन को यहाँ बहुत कम रहता हूँ. रात को बाहर चारपाई डालकर पड़ रहा करुँगा. मेरी वजह से तुम लोगों को कोई तकलीफ न होगी. यहाँ दूसरा मकान मिलना मुश्किल है यही झोपड़ा बड़ी मुश्किलों से मिला है. यह अंधेरनगरी है जब तुम्हरी सुभीता कहीं लग जाय तो चली जाना.

मगनदास को क्या मालूम था कि हजरते इश्क उसकी जबान पर बैठे हुए उससे यह बात कहला रहे है. क्या यह ठीक है कि इश्क पहले माशूक के दिल में पैदा होता है?
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देखा न आपने त्रिया चरित्र जैसे विवादास्पद शब्द का प्रेमचंद ने कितनी खूबसूरती से इस्तेमाल किया. और एक मार्मिक ताना बाना बुन दिया जिसने हमें बताया कि दुनिया बहुत छोटी है और हमारी मुलाकात कभी भी किसी से भी हो सकती है. जी हां दोस्तों हमारी आपकी भी मुलाकात होगी एक बार फिर, अगले पॉडकास्ट में, एक नई रचना के साथ. तब तक के लिए विदा.

कहानी साभार- https://epustakalay.com/​

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