Savitribai Phule Poems Podcast: मराठी कवयित्री, समाजसुधारक व देश की पहली अध्यापिका सावित्रीबाई फुले की कविताएं

  • January 23, 2022, 12:57 pm

Savitribai Phule Poems Podcast: भारत की पहली अध्यापिका और सामाजिक क्रांति की अगुआ सावित्रीबाई फुले (Savitribai Phule) के साहित्य में केवल कविताएं ही नहीं हैं बल्कि पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि भी शामिल हैं. काव्य रचना की बात करें तो उन्होंने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना कीं. पहला संग्रह 1854 में छपा दूसरा काव्य-संग्रह बावनकशी सुबोधरत्नाकर 1991 में आया.



मारे जानी दुश्मन का नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो, मजबूत पकड़कर पीटो

इन पंक्तियों की रचयिता हैं भारतीय स्त्री आंदोलन की अगुआ, कवयित्री, चिंतक, भारत की पहली अध्यापिका और सामाजिक क्रांति की अगुआ सावित्रीबाई फुले. 18वीं सदी में लगभग 48 बरस तक महिलाओं और वंचित समाज के लोगों के लिए वे अनथक काम करती रहीं. इस कविता को तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में रखकर सुनेंगे तो पाएंगे कि इनमें अपने समय का चित्रण भी है और एक बिगुल भी… जिसने तब के सोए हुए समाज को बुरी तरह झकझोरा था. न्यूज18 हिन्दी के इस स्पेशल पॉडकास्ट में आइए आज बांचें सावित्रीबाई फुले की कविताएं. सबसे पहले सुनते हैं उनकी कविता – उसे कैसे इन्सान कहें?

उसे कैसे इन्सान कहें ?

ज्ञान नहीं, विद्या नहीं
पढ़-लिखकर शिक्षित होने की मंशा नहीं
दिमाग होकर भी उसे व्यर्थ गवाएं
उसे कैसे इन्सान कहें ?

दे हरि खाट पर बैठे-बैठे,
पशु भी ऐसा कभी करे नहीं
विचार नहीं, आचार नहीं
उसे कैसे इन्सान कहें ?

घर में बच्चों की भरमार
उनकी परवरिश और खाने-पीने के हाल
काम-चोर आलसी बना कंगाल
उसे कैसे इन्सान कहें?

सहानुभूति न देता कोई
सहायता न करे कोई
बेपरवाह न करे किसी की
उसे कैसे इन्सान कहें?

ज्योतिष, पंचाग, हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग-नरक की कल्पना करे
पशु जीवन की हकीकत देखे नहीं
उसे कैसे इन्सान कहें?

पत्नी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खावे
पशुओं में ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहें?

घर-संसार में कंगाली छाई रहे
जिसका कोइ पड़ोसी नहीं
धिक्कार करे सभी रिश्तेदार
उसे कैसे इन्सान कहें?

लिख-पढ़ न पावे,
अनसुनी करे भलाई की बात
पशु को भी बात समझ में आवे
उसे कैसे इन्सान कहें?

पशुता की शर्म नहीं
उस बेशर्मी को ही माने सुख
पशु जीवन की जो राह चले
उसे इन्सान कैसे कहें?

दूसरों की कभी मदद न करे
सेवा त्याग दया ममता से रहे हमेशा परे
जिसे सद्गुण सदाचार खले
उसे इन्सान कैसे कहें?

गुलामी का न जिसे रंज हो
न कभी उन्नति का संकल्प करे
मानवता को जो कहे मेरी ठोकर तले
उसे इन्सान कैसे कहें?

पशु-पक्षी, कीड़े-मकौड़े, बन्दर, इन्सान
जन्म-मृत्यु सभी चराचर को एक समान
जीवन का इतना सा सच जिसे समझ न आए
उसे इन्सान कैसे कहें?

दोस्तो, ज़रा कल्पना करें 18वीं शताब्दी का, उस दौर की किसी महिला का, उसके सामाजिक परिवेश का और उस परिवेश में उस स्त्री के अस्तित्व का. जब स्त्रियों को देहरी से बाहर निकलने की आजादी नहीं थी, वैसे समय में सावित्रीबाई फुले अपनी पुरजोर आवाज में मर्दवादी और जातिवादी समाज के ठेकेदारों के खिलाफ बिगुल फूंक रही थीं. वैसे तो यह कविता आज भी क्रांति की मिसाल की तरह है, पर उस वक्त निश्चित तौर पर इस कविता ने मशाल का काम किया. 18वीं सदी में सावित्रीबाई फुले ने हर तरफ बाल-विवाह, सती प्रथा, बेटियों की हत्या, विधवा स्त्रियों पर जुल्म जैसी तमाम बुराइयां देखीं. 1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के बीच महज तीन सालों में, अपने पति और सामाजिक क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लगातार एक के बाद एक लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलकर इतिहास रच दिया. सावित्रीबाई फुले ने पहला स्कूल भी पुणे, महाराष्ट्र में खोला और अठारहवां स्कूल भी पूणे में ही खोला. आइए सुनें सावित्रीबाई फुले की एक बाल कविता. शीर्षक है – श्रेष्ठ धन.

सुबह-सवेरे उठे जो बच्चा,
शौच आदि मुखमार्जन करे
हो जाए नहा-धोकर तैयार
और करे माता-पिता को अभिवादन।

स्मरण करके गुरू का
मन लगाकर करे पढ़ाई
लाभकारी है दिन जीवन के व्यर्थ ना गवाएं।

करे नित पढ़ाई ज्ञान पाने के लिए
विद्या को समझकर सर्वोच्च
लीजिए लाभ विद्या का
मन के एकाग्र करते हुए।

विद्या ही धन है
सभी धन-दौलत से सर्वश्रेष्ठ अच्छा
जिसके पास है ज्ञान का भण्डार
है वह ज्ञानी जनता की नजरों में सच्चा।

सावित्रीबाई फुले के साहित्य में केवल कविताएं ही नहीं हैं बल्कि पत्र, भाषण, लेख, पुस्तकें आदि भी शामिल हैं. काव्य रचना की बात करें तो उन्होंने अपने जीवन काल में दो काव्य पुस्तकों की रचना कीं. पहला संग्रह 1854 में छपा दूसरा काव्य-संग्रह बावनकशी सुबोधरत्नाकर 1991 में आया. इसे उन्होंने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद जीवनी रूप में लिखा था. सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1931 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था.

9 साल की उम्र में 11 साल के ज्योतिबा के साथ उनका विवाह हुआ. महज 17 साल की उम्र में ही वह बच्चियों के एक स्कूल की अध्यापिका और प्रधानाचार्या, दोनों की भूमिका में आ चुकी थीं! लेकिन उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें अपने समाज की पीड़ा से गहरा परिचय हो चुका था और वे इस पीड़ा से दो-दो हाथ करने को तैयार थी. इसी महसूसी हुई पीड़ा को उन्होंने कविता के रूप में ढाल दिया. आइए सुनें अगली कविता. शीर्षक है – शूद्रों का दुख.

दो हजार वर्ष पुराना
शूद्रों से जुड़ा एक दुख।
ब्राह्मणों की सेवा की आज्ञा देकर
झूठे-मक्कार स्वयं घोषित
धरती के देवताओं ने उसे पछाड़ा।

शुद्रों की बदहाली, लाचारी देखकर
हाय उद्गार होठों से फूट पड़े
मुक्ति का सुलभ उपाय, राह कौन सी
सोच-विचार के मति रिक्त-खाली हुई।

शूद्रों के लिए कहने योग्य
है शिक्षा की राह प्रकाशित
शिक्षा प्राप्ति से मिले इंसानियत
पशुता कभी आती नहीं निकट।

वक्त कम है, लेकिन सावित्रीबाई फुले की कविताएं जरूरी. इसलिए बस उनकी परंपराभंजक कविताओं का पाठ करती चलूंगी. भाव इतने सुगम हैं कि बहुत विस्तार में जाने की जरूरत महसूस नहीं हुई. देखिए ईश्वर के प्रति फुले का विद्रोह. शीर्षक है – मन्नत

पत्थर को सिंदूर लगाकर
और तेल में डुबोकर
जिसे समझा जाता है देवता
वह असल में होता है पत्थर।

म्हसोबा, खेसोबा,
भयंकर विकराल विद्रूप देवता
पत्थरों पर आस्था, श्रद्धा छिड़क कर।

मन्नत माँगे, काटे बकरा
करे हलाल
चढ़ावा चढ़ावें पत्थरों को, पुत्र जन्म पर।

यदि पत्थर पूजने से होते बच्चे
तो फिर व्यर्थ शादी क्यों रचावे, नर-नारी।

सावित्री कहे,
सोच-विचार करने के बाद
जीवन को समृद्ध बनाइए
विवेक के साथ।

यह सब लिखते हुए सावित्रीबाई फुले कई-कई बार मिटती और बनती रही होंगी. इसी पीड़ा को, इसी मिटने और बनने को उन्होंने स्वर दिया है – कवि और कविता में.

कवि करता है कविता का सृजन
कल्पना के सहारे
सुख-दुख की वह बातें करता
कभी स्वर्ग का अनुभव
तो कभी नरक का अनुभव करता है वह।

कवि पल में स्वयं रोता, रुलाता
कभी नाचने लगता, कभी गाता है
कभी देवता आराधना करता दिखाई देता है।

कवि अघटित घटना का सृजनहार
कवि अद्भुत-भव्य लय में गाता है
नजरों के सामने खड़ी करता है काल्पनिक परियाँ
किन्तु कवि से प्रेम, परी ना करें कभी।

गालों में मुस्कुराकर
मीठी-मीठी बातें कर
बहकावे कल्पनालोक की परियाँ
बाहों में भर कर लेती है चुम्बन
कवि के मन में ऐसा चित्र दिखाई दे !

साल 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग की महामारी फैली. इस दौरान भी निडर-निर्भीक सावित्रीबाई फुले प्लेग-पीड़ितों की मदद करती रहीं. एक प्लेग पीड़ित बच्चे को बचाते हुए खुद भी प्लेग पीड़ित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उन्होंने देह त्याग दी. मित्रो, आपको बता दूं कि सावित्रीबाई फुले की मूल कविताएं मराठी में हैं. इन्हें हिन्दी में अनूदित किया है शेखर पवार और फ़ारूक शाह ने. इनका संकलन संपादन किया है प्रख्यात लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अनिता भारती ने. इन तीनों महानुभावों का शुक्रिया कि इतिहास के गर्भ में पहुंचकर हमें सावित्रीबाई फुले की रचनाओं और उनकी रचनाशीलता से मिलवाया. हमें भरोसा है कि यह यात्रा आपको पसंद आई होगी. जल्द ही एक और रचनाकार से करेंगे मुलाकात. तब तक के लिए दें पूजा प्रसाद को विदा. नमस्कार.

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    चिंता के विचार आपकी ख़ुशी को बर्बाद कर सकते हैं। ऐसा न होने दें, क्योंकि इनमें अच्छी चीज़ों को ख़त्म करने की और समझदारी में निराशा का ज़हरीला बीज बोने की क्षमता होती है। ख़ुद को हमेशा अच्छा परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करें और ख़राब हालात में भी कुछ-न-कुछ अच्छा देखने का गुण विकसित करें। ख़ास लोग ऐसी किसी भी योजना में रुपये लगाने के लिए तैयार होंगे, जिसमें संभावना नज़र आए और विशेष हो। भूमि से जुड़ा विवाद लड़ाई में बदल सकता है। मामले को सुलझाने के लिए अपने माता-पिता की मदद लें। उनकी सलाह से काम करें, तो आप निश्चित तौर पर मुश्किल का हल ढूंढने में क़ामयाब रहेंगे। किसी से अचानक हुई रुमानी मुलाक़ात आपका दिन बना देगी। काम के लिए समर्पित पेशेवर लोग रुपये-पैसे और करिअर के मोर्चे पर फ़ायदे में रहेंगे। सफ़र के लिए दिन ज़्यादा अच्छा नहीं है। जीवनसाथी के ख़राब व्यवहार का नकारात्मक असर आपके ऊपर पड़ सकता है। स्वयंसेवी कार्य या किसी की मदद करना आपकी मानसिक शांति के लिए अच्छे टॉनिक का काम कर सकता है। परेशान? आप पंडित जी से प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
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