छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की विविधता समेटे कविताएं

  • January 12, 2022, 12:16 pm

Suryakant Tripathi Nirala Poems: हम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (Suryakant Tripathi Nirala) को छायावादी कवियों जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ चौथे कवि के रूप में देखने के आदी रहे हैं. निराला की प्रेम कविताएं जमीन से जुड़ी रहीं. निराला की कविताओं में स्त्री और पुरुष का संग-साथ ही उन्हें संपूर्णता प्रदान करता रहा. स्त्री-पुरुष को उन्होंने एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा.



अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

आखिर किसी कवि को ऐसा उद्घोष क्यों करना पड़ता है? और वह भी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला (Suryakant Tripathi Nirala) जैसे कवि को? जी हां, ये पंक्तियां सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की ही हैं, जिन्हें हम छायावादी कवियों जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ चौथे कवि के रूप में देखने के आदी रहे हैं. लेकिन क्या निराला को सिर्फ छायावाद तक सीमित कर देना उनकी रचनाओं के साथ अन्याय करने जैसा नहीं होगा? जी हां, आज ऐसे ही सवालों की पड़ताल करेंगे आज के इस स्पेशल पॉडकास्ट में. मैं पूजा प्रसाद अपने सुनने वाले तमाम श्रोताओं का स्वागत करती हूं. आइए आज के पॉडकास्ट में चलें सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के संग.

वह आता-
दो टूक कलेजे को करता, पछताता
पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता —
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

जी हां, कविता की ये पंक्तियां निराला की बहुचर्चित कविता भिक्षुक की हैं. याद करें कि छायावादी दौर जब सुमित्रानंदन पंत प्रकृति प्रेम में डूब रहे थे, महादेवी वर्मा की कविताओं से वायवीय प्रेम छलक रहा था और जयशंकर प्रसाद की कामायनी एक अलग बौद्धिकता रच रही थी. उस समय उनके बीच रहते हुए भी निराला की प्रेम कविताएं जमीन से जुड़ी रहीं. स्त्री-पुरुष को उन्होंने एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा. एक के बिना दूसरा बिल्कुल अधूरा. निराला की कविताओं में स्त्री और पुरुष का संग-साथ ही उन्हें संपूर्णता प्रदान करता रहा. निराला की ऐसी ही एक कविता है – तुम और मैं

तुम तुंग – हिमालय – शृंग
और मैं चंचल-गति सुर-सरिता

तुम विमल हृदय उच्छवास
और मैं कांत-कामिनी-कविता

तुम प्रेम और मैं शान्ति
तुम सुरा – पान – घन अन्धकार
मैं हूँ मतवाली भ्रान्ति

तुम दिनकर के खर किरण-जाल
मैं सरसिज की मुस्कान
तुम वर्षों के बीते वियोग
मैं हूँ पिछली पहचान

तुम योग और मैं सिद्धि
तुम हो रागानुग के निश्छल तप
मैं शुचिता सरल समृद्धि

तुम मृदु मानस के भाव
और मैं मनोरंजिनी भाषा
तुम नन्दन – वन – घन विटप
और मैं सुख -शीतल-तल शाखा

तुम प्राण और मैं काया
तुम शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म
मैं मनोमोहिनी माया।

तुम प्रेममयी के कण्ठहार
मैं वेणी काल-नागिनी
तुम कर-पल्लव-झंकृत सितार
मैं व्याकुल विरह – रागिनी

तुम पथ हो, मैं हूँ रेणु
तुम हो राधा के मनमोहन
मैं उन अधरों की वेणु

तुम पथिक दूर के श्रान्त
और मैं बाट – जोहती आशा
तुम भवसागर दुस्तर
पार जाने की मैं अभिलाषा

तुम नभ हो, मैं नीलिमा
तुम शरत – काल के बाल-इन्दु
मैं हूँ निशीथ – मधुरिमा

तुम गन्ध-कुसुम-कोमल पराग
मैं मृदुगति मलय-समीर
तुम स्वेच्छाचारी मुक्त पुरुष
मैं प्रकृति, प्रेम – जंजीर

तुम शिव हो, मैं हूँ शक्ति
तुम रघुकुल – गौरव रामचन्द्र
मैं सीता अचला भक्ति

तुम आशा के मधुमास
और मैं पिक-कल-कूजन तान
तुम मदन – पंच – शर – हस्त
और मैं हूँ मुग्धा अनजान

तुम अम्बर, मैं दिग्वसना
तुम चित्रकार, घन-पटल-श्याम
मैं तड़ित् तूलिका रचना

तुम रण-ताण्डव-उन्माद नृत्य
मैं मुखर मधुर नूपुर-ध्वनि
तुम नाद – वेद ओंकार – सार
मैं कवि – शृंगार शिरोमणि

तुम यश हो, मैं हूँ प्राप्ति
तुम कुन्द – इन्दु – अरविन्द-शुभ्र
तो मैं हूँ निर्मल व्याप्ति

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