Birthday Special: उदय प्रकाश जब कहते हैं, ‘मैं मिसरी घुला दूध हूं मीठा’

  • January 1, 2021, 11:26 am

उदय प्रकाश (Uday Prakash) हमारे प्रिय कवि (Poet), कथाकार और फिल्मकार हैं. आज एक जनवरी को उनका जन्मदिन है. News18 इस मौके पर आपके लिए तीन खूबसूरत और संवेदनशील कविताएं लेकर आया है. 68 साल के उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार, मुक्तिबोध सम्मान और भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं.




आदमी


मरने के बाद

कुछ नहीं सोचता.


आदमी

मरने के बाद

कुछ नहीं बोलता.


कुछ नहीं सोचने

और कुछ नहीं बोलने पर

आदमी

मर जाता है.


दोस्तो मेरी शुभकामना है कि इस नए वर्ष में आप खूब सोंचे और खूब बोलें. वैसे आपको यह बता दूं कि नए साल की मंगलकामनाएं देने के लिए जिस कवि की लिखी पंक्तियां मैंने अभी पढ़ी हैं, आज उनका जन्मदिन भी है. वह हैं मध्य प्रदेश में जन्मे हमारे प्रिय कवि, कथाकार और फिल्मकार उदय प्रकाश.


साहित्य अकादमी पुरस्कार, मुक्तिबोध सम्मान और भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से नवाजे जा चुके उदय प्रकाश की एक और चर्चित कविता है कुछ बन जाते हैं


तुम मिसरी की डली बन जाओ

मैं दूध बन जाता हूं

तुम मुझमें

घुल जाओ.


तुम ढाई साल की बच्ची बन जाओ

मैं मिसरी घुला दूध हूं मीठा

मुझे एक सांस में पी जाओ


अब मैं मैदान हूं

तुम्हारे सामने दूर तक फैला हुआ

मुझमें दौड़ो.


मैं पहाड़ हूं.

मेरे कंधों पर चढ़ो और फिसलो.


मैं सेमल का पेड़ हूं

मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और

मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में

बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह

उड़ जाने दो.


ऐसा करता हूं कि मैं

अखरोट बन जाता हूं

तुम उसे चुरा लो

और किसी कोने में छुपकर

उसे तोड़ो.


गेहूं का दाना बन जाता हूं मैं,

तुम धूप बन जाओ

मिट्टी-हवा-पानी बनकर

मुझे उगाओ


मेरे भीतर के रिक्त कोषों में

लुका-छिपी खेलो या कोपल होकर

मेरी किसी भी गांठ से

कहीं से भी

तुरंत फूट जाओ.


तुम अंधेरा बन जाओ

मैं बिल्ली बनकर दबे पांव

चलूंगा चोरी-चोरी


क्यों न ऐसा करें

कि मैं चीनी मिट्टी का प्याला बन जाता हूं

और तुम तश्तरी

और हम कहीं से

गिरकर एक साथ

टूट जाते हैं सुबह-सुबह.


या मैं गुब्बारा बनता हूं

नीले रंग का

तुम उसके भीतर की हवा बनकर

फैलो और

बीच आकाश में

मेरे साथ फूट जाओ.


या फिर

ऐसा करते हैं

कि हम कुछ और बन जाते हैं…


साहित्य की दुनिया का बहुत प्यारा और बहुत ही संवदेनशील नाम हैं उदय प्रकाश. उनकी तीसरी कविता तिब्बत सुनिए...


तिब्बत से आये हुए

लामा घूमते रहते हैं

आजकल मंत्र बुदबुदाते


उनके खच्चरों के झुंड

बगीचों में उतरते हैं

गेंदे के पौधों को नहीं चरते


गेंदे के एक फूल में

कितने फूल होते हैं

पापा?


तिब्बत में बरसात

जब होती है

तब हम किस मौसम में

होते हैं?


तिब्बत में जब

तीन बजते हैं

तब हम किस समय में

होते हैं?


तिब्बत में

गेंदे के फूल होते हैं

क्या पापा?


लामा शंख बजाते है पापा?


पापा लामाओं को

कंबल ओढ़ कर

अंधेरे में

तेज़-तेज़ चलते हुए देखा है

कभी?


जब लोग मर जाते हैं

तब उनकी कब्रों के चारों ओर

सिर झुका कर

खड़े हो जाते हैं लामा


वे मंत्र नहीं पढ़ते।


वे फुसफुसाते हैं ….तिब्बत

..तिब्बत …

तिब्बत - तिब्बत

….तिब्बत - तिब्बत - तिब्बत

तिब्बत-तिब्बत ..

..तिब्बत …..

….. तिब्बत -तिब्बत

तिब्बत …….


और रोते रहते हैं

रात-रात भर।


क्या लामा

हमारी तरह ही

रोते हैं

पापा?


दोस्तो, अपनी कविताओं से वह हमें झकझोरते भी हैं, यथार्थ का आईना भी दिखाते हैं और अपने गिरेबान में देखने को विवश भी करते हैं, खासतौर से तब, जब वह कहते हैं....


आदमी

मरने के बाद

कुछ नहीं सोचता.


आदमी

मरने के बाद

कुछ नहीं बोलता.


कुछ नहीं सोचने

और कुछ नहीं बोलने पर

आदमी

मर जाता है.


साल 2021 में हम खूब बोलेंगे और खूब सोचेंगे... इसी संकल्प के साथ मुझे, पूजा प्रसाद, को विदा दीजिए. अगली बार, फिर मिलेंगे, एक नए रचनाकार के साथ, न्यूज 18 हिन्दी के पॉडकॉस्ट में. नमस्कार.

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