प्रियदर्शन की कविताएं: तोड़ना और बनाना, नष्ट कुछ भी नहीं होता, गुस्सा और चुप्पी

  • October 5, 2021, 2:39 pm

बिखरते हुए हौसले की सांसों में फिर से हवा भरने वाली यह कविता प्रियदर्शन ने रची है. पेशे से पत्रकार हैं प्रियदर्शन, पर स्वभावतः साहित्यकार. इसलिए उनकी कविताएं, कहानियां और उपन्यास मानवीय संवेदनाओं से लबरेज हैं.



न्यूज18 हिन्दी के आज के स्पेशल पॉडकास्ट में मैं पूजा प्रसाद आपका स्वागत करती हूं. नमस्कार. दोस्तो, यह सच है कि रचने में बहुत मेहनत लगती है. बहुत ऊर्जा लगती है, बहुत वक्त लगता है. मगर, बिगाड़ने में नहीं. दोस्तो,आज मैं आपको एक ऐसे रचनाकार से मिलवाने जा रही हूं जिन्होंने तोड़ने और बनाने के बीच के फर्क बखूबी अंडरलाइन किया है. एक एक पंक्ति, एक एक परत खोलती चलती है. इस रचनाकार का नाम है प्रियदर्शन. आइए सुनें प्रियदर्शन की कविता – तोड़ना और बनाना

बनाने में कुछ जाता है
नष्ट करने में नहीं
बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है
तोड़ने में बस थोड़ी सी ताकत
और थोड़े से मंसूबे लगते हैं।
इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं
वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,
उससे कहीं ज्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।
कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती
पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,
खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है।

लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहरा
आपने ध्यान से देखा है?
वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता है
जिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,
उससे कहीं ज्यादा अपने आप से।

असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलता
कि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैं
जबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।
दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता है
तोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।

तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी किताबें जलाईं
लेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदास और होमर बचे रहे।
अगर तोड़ दी गई चीजों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती है
दिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीजें खत्म होती चली गईं-
कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,
कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गए

लेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाई
कि फिर भी चीजें बची रहीं
बनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछ
नई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएं
और दुनिया में टूटी हुई चीजों को फिर से बनाने का सिलसिला।

ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,
इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगे
और बार-बार बताते रहेंगे
कि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।

बिखरते हुए हौसले की सांसों में फिर से हवा भरने वाली यह कविता प्रियदर्शन ने रची है. पेशे से पत्रकार हैं प्रियदर्शन, पर स्वभावतः साहित्यकार. इसलिए उनकी कविताएं, कहानियां और उपन्यास मानवीय संवेदनाओं से लबरेज हैं. अपने ब्लॉग भरोसा में उन्होंने अपने परिचय में लिखा है – ‘रांची में जन्म और पढ़ाई. लिखने की शुरुआत भी. बहुत लिखा. डूब कर लिखा, ऊब कर लिखा, मस्ती में लिखा, पस्ती में लिखा. नौकरी के लिए लिखा. अपनी मर्ज़ी से लिखा. मजबूरी में लिखा, उनींदेपन में लिखा. लिखते हुए लिखने का आनंद लिया. लिख कर खुश हुआ. लिखना अब भी आह्लालित करता है. भरोसे से लिखा, संशय से लिखा. यह भरोसा और संशय दोनों आप सबके साथ साझा कर रहा हूं.’ लेकिन अब उनकी जो कविता मैं पढ़ने जा रही हूं वह निश्चित रूप से संशय की नहीं बल्कि भरोसे की कविता है. शीर्षक है – नष्ट कुछ भी नहीं होता

नष्ट कुछ भी नहीं होता,
धूल का एक कण भी नहीं,
जल की एक बूंद भी नहीं
बस सब बदल लेते हैं रूप

उम्र की भारी चट्टान के नीचे
प्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकर
और अनुभव के खारे समंदर में
घृणा बची रहती है राख की तरह

गुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है,
बात-बात पर चला आता है,
दुख अतल में छुपा रहता है,
बहुत छेड़ने से नहीं,
हल्के से छू लेने से बाहर आता है,

याद बादल बनकर आती है
जिसमें तैरता है बीते हुए समय का इंद्रधनुष
डर अंधेरा बनकर आता है
जिसमें टहलती हैं हमारी गोपन इच्छाओं की छायाएं

कभी-कभी सुख भी चला आता है
अचरज के कपड़े पहन कर
कि सबकुछ के बावजूद अजब-अनूठी है ज़िंदगी
क्योंकि नष्ट कुछ भी नहीं होता
धूल भी नहीं, जल भी नहीं,
जीवन भी नहीं
मृत्यु के बावजूद

सचमुच, मनुष्य के स्वभाव का कोई भी अंश कभी नष्ट नहीं होता. इसी तरह मनुष्य का गुस्सा हो या उसकी चुप्पी हो – दोनों के अपने-अपने मायने होते हैं. जीवन में उनकी उपस्थिति भी बेहद जरूरी होती है. गुस्सा और चुप्पी को लेकर एक बेहद संवेदनशील कविता प्रियदर्शन ने रची है. तो सुनिए अगली कविता – गुस्सा और चुप्पी

बहुत सारी चीज़ों पर आता है गुस्सा
सबकुछ तोड़फोड़ देने, तहस-नहस कर देने की एक आदिम इच्छा उबलती है
जिस पर विवेक धीरे-धीरे डालता है ठंडा पानी
कुछ देर बचा रहता है धुआं इस गुस्से का
तुम बेचैन से भटकते हो,
देखते हुए कि दुनिया कितनी ग़लत है, ज़िंदगी कितनी बेमानी,

एक तरह से देखो तो अच्छा ही करते हो
क्योंकि तुम्हारे गुस्से का कोई फ़ायदा नहीं
जो तुम तोड़ना चाहते हो वह नहीं टूटेगा
और बहुत सारी दूसरी चीजें दरक जाएंगी
हमेशा-हमेशा के लिए

लेकिन गुस्सा ख़त्म हो जाने से
क्या गुस्से की वजह भी ख़त्म हो जाती है?
क्या है सही- नासमझ गुस्सा या समझदारी भरी चुप्पी?
क्या कोई समझदारी भरा गुस्सा हो सकता है?
ऐसा गुस्सा जिसमें तुम्हारे मुंह से बिल्कुल सही शब्द निकलें
तुम्हारे हाथ से फेंकी गई कोई चीज बिल्कुल सही निशाने पर लगे
और सिर्फ वही टूटे जो तुम तोड़ना चाहते हो?

लेकिन तब वह गुस्सा कहां रहेगा?
उसमें योजना शामिल होगी, सतर्कता शामिल होगी
सही निशाने पर चोट करने का संतुलन शामिल होगा
कई लोगों को आता भी है ऐसा शातिर गुस्सा
उनके चेहरे पर देखो तो कहीं से गुस्सा नहीं दिखेगा
हो सकता है, उनके शब्दों में तब भी बरस रहा हो मधु
जब उनके दिल में सुलग रही हो आग।

तुम्हें पता भी नहीं चलेगा
और तुम उनके गुस्से के शिकार हो जाओगे
उसके बाद कोसते रहने के लिए अपनी क़िस्मत या दूसरों की फितरत
लेकिन कई लोगों के गुस्से की तरह
कई लोगों की चुप्पी भी होती है ख़तरनाक
तब भी तुम्हें पता नहीं चलता
कि मौन के इस सागर के नीचे धधक रही है कैसी बड़वाग्नि
उन लोगों को अपनी सीमा का अहसास रहता है
और शायद अपने समय का इंतज़ार भी।
कायदे से देखो
तो एक हद के बाद गुस्से और चुप्पी में ज़्यादा फर्क नहीं रह जाता
कई बार गुस्से से भी पैदा होती है चुप्पी
और चुप्पी से भी पैदा होता है गुस्सा

कुल मिलाकर समझ में यही आता है
कुछ लोग गुस्से का भी इस्तेमाल करना जानते हैं और चुप्पी का भी
उनके लिए गुस्सा भी मुद्रा है, चुप्पी भी
वे बहुत तेजी से चीखते हैं और उससे भी तेजी से ख़ामोश हो जाते हैं
उन्हें अपने हथियारों की तराश और उनके निशाने तुमसे ज्यादा बेहतर मालूम हैं

तुमसे न गुस्सा सधता है न चुप्पी
लेकिन इससे न तुम्हारा गुस्सा बांझ हो जाता है न तुम्हारी चुप्पी नाजायज़
बस थोड़ा सा गुस्सा अपने भीतर बचाए रखो और थोड़ी सी चुप्पी भी
मुद्रा की तरह नहीं, प्रकृति की तरह
क्योंकि गुस्सा भी कुछ रचता है और चुप्पी भी
हो सकता है, दोनों तुम्हारे काम न आते हों,
लेकिन दूसरों को उससे बल मिलता है
जैसे तुम्हें उन दूसरों से,
कभी जिनका गुस्सा तुम्हें लुभाता है, कभी जिनकी चुप्पी तुम्हें डराती है।

मनुष्य स्वभाव के गुस्से और चुप्पी के इस छुपमछुपाई के खेल के बीच आपको छोड़कर विदा लेती हूं. फिर मिलूंगी अगले पॉडकास्ट में किसी और रचनाकार के साथ. तब तक के लिए पूजा प्रसाद को दें विदा. नमस्कार.

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