OMG! बच्चों का भी है अपना अखबार

OMG09:00 AM IST Sep 09, 2017

“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो. भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन. वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी”. सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी इन लाइनों से बीते हुए बचपन को बखूबी समझा जा सकता है. बचपन यानी बच्चों की अपनी दुनिया. बच्चों की दुनिया में उनकी सोच हर पल उड़ान भरती रहती है. उनकी नजर में क्या खास है और क्या बेकार, इसका अंदाजा लगाना बड़ा ही मुश्किल होता है. बच्चे कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर वो उसे अपनी जुबान, अपनी भाषा में बयां करना चाहते हैं. ‘बालकनामा’ यानी बच्चों की कहानी, बच्चों की जुबानी. दिल्ली के गौतम नगर में कुछ बच्चे अपना खुद का अखबार चलाते हैं. इस अखबार की शुरुआत साल 2003 में हुई थी. बालकनामा स्ट्रीट किड्स द्वारा, स्ट्रीट किड्स के लिए चलाया जाने वाला मासिक अखबार है. इस अखबार में कोई भी पेशेवर पत्रकार काम नहीं करता है. रिपोर्टर, फोटोजर्नलिस्ट से लेकर एडिटर तक की भूमिका में स्ट्रीट किड्स ही होते हैं. बच्चे खबरें खोजकर राइटर्स के पास लाते हैं और कुछ राइटर्स बच्चो की लाई गई उन खबरों को लिखते हैं. उसके बाद वो खबरें हर महीने की 25 तारीख को बालकनामा की एडिटोरियल मीटिंग में जाती हैं. एडिटोरियल मीटिंग में किसी भी अन्य अखबार की तरह इन सब बातों पर चर्चा होती है कि कौन सी खबर मुखपृष्ठ पर छपेगी? मुखपृष्ठ कैसा दिखेगा? किस खबर को रोका जा सकता है? किस खबर को कितनी जगह देनी है. वगैरह-वगैरह. बालकनामा स्ट्रीट किड्स की परेशानियों, उनके दिक्कतों की बात करता है. ये अखबार पूरी तरह से बच्चों के सरोकार से वास्ता रखता है. इसका मिशन है बच्चों के द्वारा-बच्चों के लिए. उनके हक और अधिकार की लड़ाई है बालकनामा.

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“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो. भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन. वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी”. सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी इन लाइनों से बीते हुए बचपन को बखूबी समझा जा सकता है. बचपन यानी बच्चों की अपनी दुनिया. बच्चों की दुनिया में उनकी सोच हर पल उड़ान भरती रहती है. उनकी नजर में क्या खास है और क्या बेकार, इसका अंदाजा लगाना बड़ा ही मुश्किल होता है. बच्चे कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं, पर वो उसे अपनी जुबान, अपनी भाषा में बयां करना चाहते हैं. ‘बालकनामा’ यानी बच्चों की कहानी, बच्चों की जुबानी. दिल्ली के गौतम नगर में कुछ बच्चे अपना खुद का अखबार चलाते हैं. इस अखबार की शुरुआत साल 2003 में हुई थी. बालकनामा स्ट्रीट किड्स द्वारा, स्ट्रीट किड्स के लिए चलाया जाने वाला मासिक अखबार है. इस अखबार में कोई भी पेशेवर पत्रकार काम नहीं करता है. रिपोर्टर, फोटोजर्नलिस्ट से लेकर एडिटर तक की भूमिका में स्ट्रीट किड्स ही होते हैं. बच्चे खबरें खोजकर राइटर्स के पास लाते हैं और कुछ राइटर्स बच्चो की लाई गई उन खबरों को लिखते हैं. उसके बाद वो खबरें हर महीने की 25 तारीख को बालकनामा की एडिटोरियल मीटिंग में जाती हैं. एडिटोरियल मीटिंग में किसी भी अन्य अखबार की तरह इन सब बातों पर चर्चा होती है कि कौन सी खबर मुखपृष्ठ पर छपेगी? मुखपृष्ठ कैसा दिखेगा? किस खबर को रोका जा सकता है? किस खबर को कितनी जगह देनी है. वगैरह-वगैरह. बालकनामा स्ट्रीट किड्स की परेशानियों, उनके दिक्कतों की बात करता है. ये अखबार पूरी तरह से बच्चों के सरोकार से वास्ता रखता है. इसका मिशन है बच्चों के द्वारा-बच्चों के लिए. उनके हक और अधिकार की लड़ाई है बालकनामा.

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