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VIDEO: ऐसा देश, जहां लाखों डालर में नहीं मिलता ब्रेड का एक टुकड़ा

दुनिया News18Hindi| November 27, 2017, 6:31 PM IST

रॉबर्ट मुगाबे का राजनीतिक सफर जितना नाटकीय है, उससे भी ज्यादा नाटकीय उसका अंत है. 37 साल तक सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ रही. लेकिन अचानक ही मुगाबे की सारी सियासत ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. 37 साल के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान मुगाबे ने देश की आर्थिक हालात लगभग चौपट कर दी. इकॉनॉमिस्ट बताते है कि जिम्बाब्वे की सरकार के पास अच्छी नीतियों की कमी रही. उस समय वहां की सरकार ने बिना किसी प्लानिंग के बस नोट छापने शुरू कर दिए. जिसकी वजह से लोगों के पास काफी पैसे आ गए. किसी भी कामयाब देश की इकॉनमी में फ्लो होना जरुरी है. सरकार ने अगर ज्यादा नोट छापने की जगह अनाज उगाने के लिए किसानों को सही ट्रेनिंग दी होती, तो शायद इस देश में इतनी महंगाई नहीं होती. यहां लोगों के पास पैसे तो आ गए, लेकिन खाने-पीने की चीजें कम होने के कारण काफी महंगे हो गए. मुगाबे लंबी लंबी छुट्टियां लेते थे. इन छुट्टियों के दौरान कभी उनकी गद्दी नहीं हिली. 93 साल की उम्र में भी सत्ताधारी पार्टी की कमान उन्होंने मजबूती से जकड़े रखी. लेकिन तभी अचानक सब कुछ रेत की तरह हाथ से फिसल गया. 1980 में आजादी के साथ ही देश की बागडोर संभालने वाले मुगाबे अचानक अर्श से फर्श पर आ गये. 19 नवंबर 2017 को उनको पार्टी नेता पद से हटा दिया गया और राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने को कहा गया. उनके सामने सोमवार दोपहर तक इस्तीफा देने या महाभियोग के लिए तैयार रहने का अल्टीमेटम था. रविवार को उन्होंने जनता को टेलिविजन के माध्यम से संबोधित किया लेकिन इस्तीफा नहीं दिया. वे अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा का दांव खेल रहे लगते हैं. असल में मुगाबे का राजनीतिक महल ताश के पत्तों की तरह ढहा. छह नवंबर को उन्होंने सेना के करीबी उपराष्ट्रपति को बर्खास्त किया. इसके फौरन बाद मुगाबे के हाथ सेना प्रमुख की ओर बढ़े. जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले डगलस माहिया कहते हैं, "उन्होंने लाल लकीर पार कर दी और हम ऐसा स्वीकार नहीं कर सकते थे." बर्खास्तगी के कुछ ही घंटों बाद उपराष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा पड़ोसी देश मोजाम्बिक पहुंचे. मोजाम्बिक की सेना के साथ उनके गहरे रिश्ते थे. फिर वह एक और भरोसेमंद साथी कहे जाने वाले दक्षिण अफ्रीका पहुंचे. असल में उपराष्ट्रपति को अपनी बर्खास्तगी का अंदाजा था और उन्होंने पलटवार की पूरी योजना बना रखी थी. लंबे समय तक दूसरों को फंदे में फंसाने वाले मुगाबे को इसकी भनक नहीं थी. वह उपराष्ट्रपति के ट्रैप में फंस गए. रंगीन मिज़ाज के मुगाबे के राजनीतिक पतन में क्या उनकी पत्नी की भी कोई भूमिका है? कुछ आलोचक इसे भी एक बड़ी वजह बताते हैं. 52 साल की ग्रेस मुगाबे की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पति पर भारी पड़ीं. 2014 में ग्रेस मुगाबे ने एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने की कोशिश की. आर्थिक संकट और महंगाई से कराह रहे देश की प्रथम महिला ग्रेस की छवि जिम्बाब्वे में खराब है. उन्हें महंगी खरीदारी करने वाली और विलासिता से भरी जीवनशैली वाली महिला माना जाता है. मुगाबे के राष्ट्रपति कार्यालय में ग्रेस एक टाइपिस्ट थी. शादीशुदा मुगाबे से उनका अफेयर हुआ, वो भी ऐसे वक्त में जब मुगाबे की पहली पत्नी कैंसर से मर रही थीं. मुगाबे की पहली पत्नी सैली से जनता जितनी मुहब्बत करती थी, उतनी ही नफरत दूसरी पत्नी ग्रेस ने बटोरी. राजनीति में ग्रेस के दखल से मुगाबे के खिलाफ जनमानस और शासक वर्ग में असंतोष भड़क गया. बारूद तैयार था, बस चिंगारी का इंतजार था. और 6 नवंबर से 8 नवंबर के बीच के 37 घंटों ने इसी चिंगारी का काम किया.

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First published: November 27, 2017, 6:20 PM IST

रॉबर्ट मुगाबे का राजनीतिक सफर जितना नाटकीय है, उससे भी ज्यादा नाटकीय उसका अंत है. 37 साल तक सत्ता पर उनकी मजबूत पकड़ रही. लेकिन अचानक ही मुगाबे की सारी सियासत ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. 37 साल के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान मुगाबे ने देश की आर्थिक हालात लगभग चौपट कर दी. इकॉनॉमिस्ट बताते है कि जिम्बाब्वे की सरकार के पास अच्छी नीतियों की कमी रही. उस समय वहां की सरकार ने बिना किसी प्लानिंग के बस नोट छापने शुरू कर दिए. जिसकी वजह से लोगों के पास काफी पैसे आ गए. किसी भी कामयाब देश की इकॉनमी में फ्लो होना जरुरी है. सरकार ने अगर ज्यादा नोट छापने की जगह अनाज उगाने के लिए किसानों को सही ट्रेनिंग दी होती, तो शायद इस देश में इतनी महंगाई नहीं होती. यहां लोगों के पास पैसे तो आ गए, लेकिन खाने-पीने की चीजें कम होने के कारण काफी महंगे हो गए. मुगाबे लंबी लंबी छुट्टियां लेते थे. इन छुट्टियों के दौरान कभी उनकी गद्दी नहीं हिली. 93 साल की उम्र में भी सत्ताधारी पार्टी की कमान उन्होंने मजबूती से जकड़े रखी. लेकिन तभी अचानक सब कुछ रेत की तरह हाथ से फिसल गया. 1980 में आजादी के साथ ही देश की बागडोर संभालने वाले मुगाबे अचानक अर्श से फर्श पर आ गये. 19 नवंबर 2017 को उनको पार्टी नेता पद से हटा दिया गया और राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने को कहा गया. उनके सामने सोमवार दोपहर तक इस्तीफा देने या महाभियोग के लिए तैयार रहने का अल्टीमेटम था. रविवार को उन्होंने जनता को टेलिविजन के माध्यम से संबोधित किया लेकिन इस्तीफा नहीं दिया. वे अपने और अपने परिवार के लिए सुरक्षा का दांव खेल रहे लगते हैं. असल में मुगाबे का राजनीतिक महल ताश के पत्तों की तरह ढहा. छह नवंबर को उन्होंने सेना के करीबी उपराष्ट्रपति को बर्खास्त किया. इसके फौरन बाद मुगाबे के हाथ सेना प्रमुख की ओर बढ़े. जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले डगलस माहिया कहते हैं, "उन्होंने लाल लकीर पार कर दी और हम ऐसा स्वीकार नहीं कर सकते थे." बर्खास्तगी के कुछ ही घंटों बाद उपराष्ट्रपति एमर्सन मनांगाग्वा पड़ोसी देश मोजाम्बिक पहुंचे. मोजाम्बिक की सेना के साथ उनके गहरे रिश्ते थे. फिर वह एक और भरोसेमंद साथी कहे जाने वाले दक्षिण अफ्रीका पहुंचे. असल में उपराष्ट्रपति को अपनी बर्खास्तगी का अंदाजा था और उन्होंने पलटवार की पूरी योजना बना रखी थी. लंबे समय तक दूसरों को फंदे में फंसाने वाले मुगाबे को इसकी भनक नहीं थी. वह उपराष्ट्रपति के ट्रैप में फंस गए. रंगीन मिज़ाज के मुगाबे के राजनीतिक पतन में क्या उनकी पत्नी की भी कोई भूमिका है? कुछ आलोचक इसे भी एक बड़ी वजह बताते हैं. 52 साल की ग्रेस मुगाबे की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पति पर भारी पड़ीं. 2014 में ग्रेस मुगाबे ने एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने की कोशिश की. आर्थिक संकट और महंगाई से कराह रहे देश की प्रथम महिला ग्रेस की छवि जिम्बाब्वे में खराब है. उन्हें महंगी खरीदारी करने वाली और विलासिता से भरी जीवनशैली वाली महिला माना जाता है. मुगाबे के राष्ट्रपति कार्यालय में ग्रेस एक टाइपिस्ट थी. शादीशुदा मुगाबे से उनका अफेयर हुआ, वो भी ऐसे वक्त में जब मुगाबे की पहली पत्नी कैंसर से मर रही थीं. मुगाबे की पहली पत्नी सैली से जनता जितनी मुहब्बत करती थी, उतनी ही नफरत दूसरी पत्नी ग्रेस ने बटोरी. राजनीति में ग्रेस के दखल से मुगाबे के खिलाफ जनमानस और शासक वर्ग में असंतोष भड़क गया. बारूद तैयार था, बस चिंगारी का इंतजार था. और 6 नवंबर से 8 नवंबर के बीच के 37 घंटों ने इसी चिंगारी का काम किया.

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