
पंडित जसराज ने हवेली संगीत को लोकप्रियता और गरिमापूर्ण स्थान दिलाया है. जब वे -‘गोविंदम गोकुलानंदम् गोपालम् गोपिकावल्लभम्’, ‘हनुमान लला मेरे प्यारे लाल’, ‘श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी’, ‘हे नाथ नारायण वासुदेवा’ जैसी रचनाओं को अपनी आवाज में गाते हैं, तो उसके प्रभाव-प्रसार, अनुभूति को शब्दों में बता पाना कठिन ही नहीं असंभव हो जाता है. उनकी खनकती, रसीली और मधुर आवाज के जादू ने देश के ही नहीं, सात समंदर पार के श्रोताओं को आनंद सागर में आकंठ डुबोया है. संगीत मार्तंड पंडित जसराज के सुर अब ब्रम्हाण्ड में विलीन हो गए हैं.
पंडित जसराज जी इस बार न्यूजर्सी गए, तो फिर वापस नहीं आए. दरअसल, उनसे बात करने और उनसे बातचीत करने की इच्छा हुई. उनका फोन नहीं लगा तो मैंने उनकी सुपुत्री दुर्गा जसराज को फोन किया. उन्होंने बताया कि पंडित जसराज जी के साथ वह भी अमेरिका में हैं. इन दिनों उनका स्वास्थ्य ठीक है. लेकिन, बातचीत कम कर रहे हैं. संयोग से अप्रैल में संकटमोचन संगीत समारोह का आयोजन हुआ. कोविड-19 और लॉकडाउन की वजह से यह समारोह ऑनलाइन हुआ. सो, पंडित जसराज ने न्यूजर्सी से ही ऑनलाइन गायन पेश किया. किसको पता था कि उन्हें हम अंतिम बार लाइव गाते हुए सुन रहे हैं.
मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे पंडित जसराज का स्नेह और प्रेम हमेशा मिलता रहा. दिल्ली के अलावा, देश के अनेक शहरों में उन्हें कई समारोह में गाते हुए सुनने का अवसर मिला. और कभी सामने बैठकर और कभी फोन पर अलग-अलग विषयों पर बात करने का अवसर भी मिला. पंडित जसराज जीवन को पूर्णता और समग्रता में देखते थे. एक बार उन्होंने कहा था कि संगीत हमारे विश्वास को जगाता है. वह धर्म है. वह कर्म है. एक गायक का धर्म और कर्म दोनों ही संगीत है. संगीत और संगीतकार दोनों ही भगवान को अति प्रिय हैं. वास्तव में, संगीत आनंद और अनुभूति की चीज है. इसे चाहे तो भगवान के लिए गा लीजिए या श्रोताओं के लिए गा लीजिए. दोनों स्थिति में यह आनंद रस का संचार करती है. संगीत और अध्यात्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. वह कहते हैं कि सृष्टि में दैवीय शक्ति तो है. कुछ लोग भगवान पर थोड़ा बहुत विश्वास करते हैं. पर मैं पूरी तरह से उनके अस्तित्व में विश्वास करता हूं. क्योंकि, हमने देखा है कि ऐसी चमत्कारी शक्ति होती है. स्कूल के बजाय संगीत के सुर में ही डूबा रहना अच्छा लगने लगा. शुरू में तो बड़े भाई साहब गाते थे और मैं उनके साथ तबला बजाया करता था. धीरे-धीरे लगन लगी और मेरा झुकाव गायन की ओर होता गया.
पंडित जसराज को घूमने का शौक था. उनका कहना था कि खासतौर पर तीर्थ स्थानों पर जाना मुझे अच्छा लगता है. वहां रहने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है. उससे खुशियां बढ़ती हैं. इससे संगीत में अपने आप आपके व्यवहार में तलखी कम होती जाती है. हर आदमी में थोड़ी बहुत तलखी होती है. मंदिरों में बहुत आनंद आता है. मैंने सन् 1960 में पैदल घूम-घूम कर चारों धाम की यात्राएं की हैं. गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ, गुप्तकाशी, उत्तरकाशी, देवप्रयाग, रूद्रप्रयाग के बहुत सारे मंदिरों के दर्शन किए. उस दौरान मेरे मित्र मुकंद लाठ मेरे साथ थे. उन तीर्थ की स्मृतियां मन को आज भी खुशी देती हैं.
पंडित जसराज का कहना था कि शास्त्रीय संगीत हर-एक के बस की बात नहीं है. वही गा-बजा सकता है, जिसका मन बहुत शुद्ध हो, जो सेवाभावी हो. खूब रियाज करने की शक्ति हो. वैसे बच्चे 125 करोड़ में शायद 125 ही होंगे. पर जो युवा कलाकार आजकल गा-बजा रहे हैं, उनसे मैं बहुत आशावान हूं. वो लोग बहुत अच्छा गा रहे हैं. मुझे राशिद खां, जयतीर्थ मेवंडी, संजीव अभ्यंकर, रतनमोहन शर्मा वगैरह अच्छा कर रहे हैं. मालिनी राजुरकर को और आगे जाना चाहिए था, पर पता नहीं क्यों रुक गईं. वैसे कुछ लोग कहते है कि मेरे बच्चे क्यों नहीं गाते? यह सही नहीं है. मैं तो खुश हूं कि दुर्गा बहुत कुछ संगीत के लिए कर रही है. सारंग देव भी संगीत से जुड़े हुए हैं. वह अच्छे म्यूजिक कम्पोजर हैं. मुझे महसूस होता है कि शास्त्रीय गायन में दुर्गा उतर सकती थी. फिर, सोचता हूं कि वह शास्त्रीय संगीत के आयोजनों से जुड़कर भी तो इसी के प्रोमोशन में लगी हुई है. वह भी शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार के लिए जरूरी है.
मेवाती घराने के पंडित जसराज के सांगीतिक जीवन यात्रा अनंत की यात्रा थी. इस मौके पर मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय की ओर से भारत भवन में पंडित जसराज के ऊपर बनी लघु फिल्में और चित्र प्रदर्शनी प्रदर्शित की गई. पंडित जसराज को पिछले वर्ष संगीत नाटक अकादमी की ओर से अकादमी रत्न से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, उन्हें पद्मभूषण, संगीत कला रत्न, मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड, महाराष्ट्र गौरव, मारवाड़ संगीत रत्न अवार्ड से नवाजा गया. पद्मभूषण पंडित जसराज का जन्म फतेहाबाद जिले के पीलीमंदौरी गांव में हुआ था. 28 जनवरी वर्ष 2014 में वह अपने जन्मदिन पर अपने गांव गए थे. तब उनके पिता पंडित मोतीराम जी के नाम से पुस्तकालय का उद्घाटन किया गया था. नब्बे वसंत को जीने वाले संगीत मार्तंड पंडित जसराज सुर प्रभात थे. सुरों का यह सुनहरा सूर्य हर सुबह जागता था और जगाता रहेगा. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)