मुजफ्फरपुर शेल्टर होम : लड़कियां जो घर नहीं, 'कार्यक्रम' में जाती हैं

मुजफ्फरपुर बालिका गृह का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि किस तरह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तमाम दिशा निर्देशों के बीच कुछ ऐसी अनकही बातें भी हैं जिसे इन शेल्टर होम में रहने वाले ही समझ सकते हैं.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 3:04 AM IST
मुजफ्फरपुर शेल्टर होम : लड़कियां जो घर नहीं, 'कार्यक्रम' में जाती हैं
शेल्टर होम्स में यौन उत्पीड़न के लिए कोड शब्द का इस्तेमाल किया जाता है
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 3:04 AM IST
'तू कहां से आई है' - सुनीता के इस सवाल के जवाब में लक्ष्मी ने जगह का नाम बताया. एक महीने से शेल्टर होम में रह रही इन दोनों लड़कियों के बीच आज खुल कर बात हो पाई थी. बातचीत को आगे बढ़ाते हुए सोनम ने सुनीता से पूछ लिया कि क्या उसकी शादी हो गई है. इस सवाल के पूछते ही सुनीता थोड़ी देर के लिए चुप हो गई. फिर उसने कुछ सोच कर हां में गर्दन हिला दी. सोनम ने उसके कंधे पर सांत्वना का हाथ रखते हुए उसे बताया कि उसकी भी शादी करवाई जा चुकी है. अब दोनों चुप थी. लेकिन शेल्टर होम की दीवारों के कान बहुत तेज होते हैं.

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आप सोच रहे होंगे कि शादी के बारे में पता लगने में आखिर बुराई क्या है. दरअसल शेल्टर होम में 'शादी' शब्द का इस्तेमाल एक कोड वर्ड के तौर पर किया जाता है. इसका मतलब लड़की के यौन शोषण से है. जब हम 'शोषण' शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो वहां पर मजबूरी इच्छा के ऊपर हो जाती है. जब यह लड़कियांं किसी भी शेल्टर होम में लाई जाती हैं, तो वहां पर इन्हें रहने से लेकर खाने तक कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. और भूख या बेहतर खाना एक ऐसी मजबूरी है जिसके आगे अच्छे अच्छे घुटने टेक देते हैं तो फिर इन लड़कियों की क्या बिसात है.  इसलिए कई बार अपनी मजबूरी के चलते, ये लड़कियां शादी के लिए यानि यौन शोषण के लिए राजी हो जाती है या यू कहिए राज़ी करवा ली जाती हैं.



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ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ एनजीओ द्वारा संचालित शेल्टर होम्स में होता है. पटना के एनजीओ सर्कल में इस वक्त दबे स्वर में कहा जा रहा है कि सरकार द्वारा संचालित होम्स जैसे निशांत गृह में भी ऐसा ही कुछ होता आ रहा है. ऐसे शेल्टर होम्स में काउंसलिंग के लिए जाने वाली एक विशेषज्ञ ने नाम न बताने की शर्त पर हमें इस बात की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि किस तरह शेल्टर होम्स के नाम पर जो यौन शोषण का कारोबार चल रहा है वो किसी बड़े नेक्सस की तरह ही कोड वर्ड का इस्तेमाल करते हैं.

muzaffarpur shelter home
कई बार शेल्टर होम में आई लड़कियों के लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं

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मसलन इस जगह की देखरेख करने वाले या इसे तथाकथित रूप से पोसने वाले एक और शब्द का इस्तेमाल करते हैं - कार्यक्रम या प्रोग्राम. शेल्टर होम में रहने वाली लड़कियां भी इस शब्द से वाबस्ता हैं. जो नई आती है वो भी कुछ दिनों के बाद इस शब्द को सुनने की आदी हो जाती हैं. तो अगर उनके सामने  इस शब्द का इस्तेमाल होता है या उन्हें कोई लड़की नज़र नहीं आती है तो वो समझ लिया जाता है कि फलां लड़की ज़रूर किसी 'प्रोग्राम' में भेजी गई है. यहां प्रोग्राम के क्या मायने है उसे शायद समझाने की ज़रूरत नहीं है.

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और ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ सिर्फ लड़कियों के स्टे होम में ही हो रहा है. इस पूरे प्रकरण पर से पर्दा उठाने वाली टाटा इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट को देखने पर पता चलता है कि मुंगेर, अररिया में लड़कों के स्टे होम में भी यौन उत्पीड़न के मामले हैं. शेल्टर होम्स के अंदर हो रहे इस तरह की गतिविधियों में गार्ड से लेकर केयरटेकर तक सभी शामिल होते हैं. मोतीहारी में 'निर्देश' नाम के एनजीओ द्वारा चलाए जाने वाले बाल गृह में स्टाफ के एक सदस्य का लड़कों के साथ शारीरिक उत्पीड़न और यौन शोषण में शामिल होने का मामला सामने आया है.



ब्लॉग- पीछे छूट रही हैं मुजफ्फरपुर की बच्चियां

ऊपर जिस महिला काउंसलर का ज़िक्र किया गया है, उन्होंने हमें बताया कि क्योंकि यह जरूरतमंद बच्चे होते हैं और बेहद ही बुरे हाल में शेल्टर होम तक पहुंचते हैं, ऐसे में उन्हें इस तरह की गतिविधि में शामिल करने के लिए राज़ी करना आसान हो जाता है. उन्हें बेहतर खाना, बेहतर कपड़े, बेहतर सुविधा का लालच दिया जाता है. यह ऐसी उम्र में होते हैं जहां इन्हें सही-गलत की पहचान नहीं होती, ऐसे में यह सबसे आसान शिकार होते हैं. यही वजह है कि टाटा की रिपोर्ट में जिन स्टे होम पर सबसे ज्यादा ध्यान दिए जाने के लिए कहा गया है, उनमें से ज्यादातर होम्स छोटे लड़के और लड़कियों से जुड़े हुए हैं.

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शेल्टर होम के केयरटेकर बच्चियों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए नज़र आए


चोरी छिपे कोड वर्ड के सहारे शेल्टर होम्स में अवैध काम हो रहे हैं और उस 300 पन्ने के दिशा निर्देश का मज़ाक बनाया जा रहा है जिसे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने किशोर न्याय (बालक की देखरेख और संरक्षण)  नियम, 2016 के नाम से जारी किया है. इस नियमावली में स्टे होम मे बच्चों की देखरेख करने वालों को 'हाउज़ मदर और हाउज़ फादर' का दर्जा दिया गया है.

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हाउज़ मदर या हाउज़ फादर को अलग अलग जिम्मेदारियों का निर्वाहन करना होता है. उसमें कुछ इस प्रकार हैं -

  • हर बच्चे की प्यार और दुलार से देखरेख करना

  • बच्चे का ख्याल रखना और उसके कल्याण को सुनिश्चित करना

  • हर बच्चे को उसकी जरूरत के हिसाब से कपड़े, टॉयलेट का सामान और रोज़मर्रा का सामान उपलब्ध करवाना

  • मांग और जरूरत के हिसाब से सामान को भरना

  • बच्चों में अनुशासन बनाए रखना

  • बच्चा, सफाई और स्वच्छता का ख्याल रखे

  • बच्चे की सुरक्षा का ध्यान रखे


जिन स्टे होम में गड़बड़ियां सामने आई हैं, वहां कमोबेश इन्चार्ज या हाउस मदर/फादर की भूमिका शक के घेरे में है. जहां तक मुजफ्फरपुर की बात है तो वहां काम करने वाले 8 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें गार्ड से लेकर केयरटेकर तक सब शामिल हैं. वहीं बच्चियों ने अपने बयान में 'हेड सर' शब्द का इस्तेमाल भी किया था. जांच के बाद सामने आया था कि 'हेड सर' दरअसल जिला के बाल कल्याण समिति के चेयरपर्सन दिलीप कुमार वर्मा है जो कि फिलहाल फरार है. बच्चियों ने अपने बयान में कहा था कि हेड सर उन्हें निजी अंगों पर लोहे की रॉड से मारते थे.

(सभी इलस्ट्रेशन्स - प्रशांत)
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