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नीतीश सरकार में चारा घोटाले से 70 गुना बड़ा गड़बड़झाला! क्या है CAG रिपोर्ट?

Bihar News: नीतीश सरकार में चारा घोटाले से 70 गुना बड़ा गड़बड़झाला! क्या है CAG की वो रिपोर्ट जिसपर बिहार में मचा है बवाल

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Bihar Scam CAG Report : कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बिहार सरकार पर 70,000 करोड़ रुपये के घोटाले का गंभीर आरोप लगाया है और इसका आधार कैग की रिपोर्ट को बताया है. उनका दावा है कि विभिन्न विभागों ने पैसों की उपयोगिता रिपोर्ट नहीं दी जो बिहार के बजट का एक तिहाई है. तेजस्वी यादव भी पहले इस मुद्दे पर सरकार को घेर चुके हैं. ऐसे में सवाल यह कि क्या सचमुच इतना बड़ा घोटाला हुआ है? सरकार क्या कह रही है और जानकार क्या कहते हैं?

नीतीश सरकार में चारा घोटाले से 70 गुना बड़ा गड़बड़झाला! क्या है CAG रिपोर्ट?Zoom
बिहार में कैग रिपोर्ट पर गरमाई राजनीति, क्या नीतीश सरकार में सचमुच घोटाला हुआ?
पटना. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने बिहार सरकार पर 70,000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले का सनसनीखेज आरोप लगाया है. उन्होंने 2023-24 के लिए कैग (कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि विभिन्न विभागों ने फंड की उपयोगिता रिपोर्ट (यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट) नहीं जमा की. खेड़ा का दावा है कि यह राशि बिहार के सालाना बजट का एक तिहाई है और अगर इसे रोका नहीं गया तो अगली बार 1.40 लाख करोड़ रुपये का घोटाला हो सकता है. बता दें कि यह घोटाला लालू यादव के शासनकाल में हुए 903 करोड़ रुपये के चारा घोटाला से 70 गुना से भी अधिक कहा जा रहा है.  इससे पहले बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और बिहार सरकार पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए थे. उन्होंने कहा था कि सरकार फंड का सही इस्तेमाल नहीं कर रही और जनता के पैसे का दुरुपयोग हो रहा है. तेजस्वी ने हाल के विधानसभा सत्र में भी इस मुद्दे को उठाया था.दोनों नेताओं का निशाना नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार पर है जो 2025 के चुनाव से पहले विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन सकता है. आइये आगे जानते हैं यह पूरा मामला क्या है और इसपर क्यों सवाल उठ रहे हैं.

बिहार में हाल ही में 70,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया गया है जिस पर विपक्ष नीतीश सरकार को घेर रहा है. यह आरोप कैग (CAG) रिपोर्ट के आधार पर लगाया गया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार सरकार ने 70,877 करोड़ रुपये की परियोजनाओं के उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किए हैं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार सरकार ने कई विभागों को दी गई राशि की उपयोगिता रिपोर्ट 18 महीने के भीतर जमा नहीं की जो नियमों के खिलाफ है. पवन खेड़ा का कहना है कि यह पैसा विभिन्न योजनाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए था, लेकिन इसका हिसाब-किताब गायब है. अगर यह सच है तो यह बिहार के विकास बजट पर गहरा असर डाल सकता है. विपक्ष इसे भ्रष्टाचार का सबूत बता रहा है, जबकि सरकार इसे प्रक्रियात्मक कमी कह रही है.
– पंचायती राज विभाग में 28,154 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित है.
– शिक्षा विभाग में 12,623 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित है.
– शहरी विकास विभाग में 11,065 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित है.
– ग्रामीण विकास विभाग में 7,800 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित है.
– कृषि विभाग में 2,107 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित है.
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि नीतीश सरकार ने घोटाले को छिपाने की कोशिश की है और जनता के पैसे का दुरुपयोग किया है. राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि पहले ये लोग घोटाला करते हैं और फिर लोगों को मछली-मटन-मुसलमान में फंसाने लगते हैं. जबकि, सरकार ने आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो सभी राज्यों में लागू होती है. वित्त विभाग के प्रधान सचिव आनंद किशोर ने कहा है कि यह कोई गबन या वित्तीय गड़बड़ी का मामला नहीं है.
बिहार सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे ‘नॉर्मल अकाउंटिंग प्रोसेस’ बताया है. उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हालिया विधानसभा सत्र में कहा कि 2022-23 में 1.09 लाख करोड़ रुपये की उपयोगिता रिपोर्ट साफ की गई और 2023-24 में 51,750 करोड़ रुपये और जोड़े गए. सरकार का दावा है कि यह प्रक्रिया में देरी का मामला है न कि घोटाला. सम्राट चौधरी ने कहा कि पिछले पांच सालों में यूसी पेंडेंसी सबसे कम है जो इस सरकार की पारदर्शिता को बताता है.
जानकारों का मानना है कि यह घोटाला साबित करना मुश्किल होगा, क्योंकि उपयोगिता रिपोर्ट न जमा करना तकनीकी कमी हो सकती है न कि सीधा भ्रष्टाचार. एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने कहा कि अगर फंड का दुरुपयोग हुआ तो इसका असर योजनाओं पर दिखना चाहिए, जिसकी जांच जरूरी है. वहीं, राजनीति के जानकार मानते हैं कि विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाना चाहता है, लेकिन बिना ठोस सबूत के यह दावा हवा-हवाई लगता है. कैग की रिपोर्ट सवाल उठाती है, लेकिन नतीजा जांच पर निर्भर करेगा.
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार सचमुच लापरवाह रही या यह विपक्ष का सियासी वार है? अगर 70,000 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं दिया गया तो इससे बिहार की जनता पर क्या असर पड़ेगा? दूसरी ओर सरकार का दावा है कि प्रक्रिया सुधारी जा रही है, लेकिन देरी क्यों हुई, इसका जवाब नहीं मिल रहा. जानकारों का कहना है कि अगर यह घोटाला साबित हुआ तो यह बिहार के वित्तीय प्रबंधन पर गहरा दाग होगा.

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Vijay jha
पत्रकारिता क्षेत्र में 22 वर्षों से कार्यरत. प्रिंट, इलेट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन. नेटवर्क 18, ईटीवी, मौर्य टीवी, फोकस टीवी, न्यूज वर्ल्ड इंडिया, हमार टीवी, ब्लूक्राफ्ट डिजिट...और पढ़ें
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