...जब CM नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को फ्लैट से जबरन निकलवा दिया था
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...जब CM नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को फ्लैट से जबरन निकलवा दिया था
पटना में सीएम नीतीश से मुलकात करते उपेंद्र कुशवाहा (फाइल फोटो)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री और रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बीच बीच लव-हेट रिलेशनशिप का इतिहास काफी पुराना रहा है.

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केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को सीएम कुर्सी छोड़ कोई नया चेहरा प्रोजेक्ट करने की सलाह देकर बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया है.

ये इस चर्चा को भी हवा देती है कि कुशवाहा और नीतीश एक साथ रह ही नहीं सकते. दोनों के रिश्तों में आई दरार कभी खत्म हुई नहीं थी. कुशवाहा बीजेपी के साथ और नीतीश आरजेडी के साथ जुदा राहों पर चल रहे थे, लेकिन 27 जुलाई, 2017 को अचानक नीतीश और बीजेपी के बीच की दीवार ढह गई.
इसी के साथ नीतीश एनडीए में वापस आए और कुशवाहा के साथ दोस्ती थोप दी गई. लेकिन दोनों के बीच लव-हेट रिलेशनशिप का इतिहास काफी पुराना रहा है.

ऐसा विरले ही होता है कि कोई पहली बार विधायक बने और विधानसभा में विरोधी दल का नेता बन जाए. उपेंद्र कुशवाहा को 2004 में ये मौका दिया नीतीश कुमार ने जब बिहार विधानसभा के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष सुशील मोदी लोकसभा के लिए चुन लिए गए.



नीतीश कुमार को उपेंद्र कुशवाहा पर ऐसा भरोसा था. इससे पहले कुशवाहा 1994 से 2002 के बीच समता पार्टी के महासचिव रहे और नीतीश के साथ खूब निभी, लेकिन 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का 15 साल से जारी विजयी अभियान थामने के बाद जब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली उसके बाद दोनों के रिश्तों में दूरियां आनी शुरू हो गई.



कुर्सी के खेल में नीतीश को आगे निकलता देख कुशवाहा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया. वो बिहार में पार्टी के अध्यक्ष भी रहे, लेकिन इस पार्टी की राजनीतिक हैसियत को जल्दी भांप कर दोबारा जेडीयू में आ गए. नीतीश ने उन्हें फिर ईनाम दिया. इस बार कुशवाहा को पार्टी ने राज्यसभा भेजा.

उसी साल आखिर में हुए विधानसभा चुनाव में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने आरजेडी को महज 22 सीटों पर समेट दिया और नीतीश कुमार दोबारा गद्दी पर बैठे. कुशवाहा ने इस बार अपने समर्थकों के साथ दुर्व्यवहार की आड़ में पार्टी के राजगीर सम्मेलन में नीतीश को जमकर कोसा जिसके बाद वो पार्टी से निलंबित कर दिए गए.

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एक साल बाद सात दिसंबर 2011 को राज्यसभा में यूपीए सरकार ने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई की अनुमति वाला विधेयक पेश किया. भाजपा और जेडीयू समेत एनडीए एकमत से इसके विरोध में था, लेकिन कुशवाहा ने यूपीए के पक्ष में वोट कर दिया. कुशवाहा ने नीतीश कुमार को तानाशाह बताते हुए कहा कि पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो चुका है. उन्होंने 9 दिसंबर को पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया और तीन मार्च, 2013 को गांधी मैदान में रालोसपा के गठन की घोषणा कर दी.

इसके बाद नीतीश सरकार ने कुशवाहा से पटना स्थित सरकारी आवास तुरंत खाली करने को कहा. उनका आवास भाजपा कार्यालय के ठीक सामने था. कोई जवाब नहीं मिलने पर भारी पुलिस बल की मौजूदगी में कुशवाहा को बलपूर्वक बेदखल किया गया. घर के बाहर बिखरे सामान के साथ उनकी तस्वीर तब सुर्खियां बनी थीं.

यह कुशवाहा की किस्मत थी कि 2013 से ही नरेंद्र मोदी के सवाल पर बीजेपी और जेडीयू के बीच दूरियां बढ़ने लगी थी. आखिरकार 17 साल पुरानी यह दोस्ती टूट गई. इसने कुशवाहा को बीजेपी के साथ आने का मौका दिया और 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले रालोसपा एनडीए का हिस्सा हो गई.

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उधर नीतीश ने लालू की ओर हाथ बढ़ाया और महागठबंधन ने 2015 के विधानसभा चुनाव में बाजी मार ली. इससे दोनों के बीच रिश्तों में कोई फर्क नहीं पड़ा. क्योंकि कुशवाहा केंद्र में मंत्री बनाए गए थे और बीजेपी के साथ दोस्ती अटूट मानी जा रही थी. इसके बाद नीतीश के रातोंरात पासा पलट कर एनडीए में वापस आ जाने के बाद से ही कुशवाहा असहज महसूस करने लगे. एनडीए के मदद से बनी नीतीश सरकार में कुशवाहा की पार्टी से कोई मंत्री नहीं बनाया गया.

जेडीयू की एनडीए में वापसी से महज दस दिन पहले कुशवाहा ने कहा था कि नीतीश जिस नाव पर बैठेंगे उसका डूबना तय है. हाल ही में जब न्यूज 18 ने उनको इस बयान की याद दिलाई तो उन्होंने कहा कि नाव के खेवनहार नरेंद्र मोदी हैं न कि नीतीश कुमार, इसलिए नाव नहीं डूबेगी.

नीतीश के खिलाफ कुशवाहा की मुहीम रूकी नहीं. उन्होंने नीतीश पर बिहार की शिक्षा व्यवस्था चौपट करने का आरोप लगाया. जनवरी में इसको लेकर मानव श्रृंखला बनाई और आरजेडी के नेताओं के साथ गलबहियां करते दिखे. जून में एनडीए के डिनर में भी उन्होंने हिस्सा नहीं लिया और इफ्तार पार्टियों में भी दोनों ने एक-दूजे से दूरी बनाए रखी. इन परिस्थितियों में अगर कुशवाहा ने नीतीश को गद्दी छोड़ने की सलाह दी है तो ये चौंकाने वाला नहीं है. दरअसल वो रास्ते अलग करना चाहते हैं और जद्दोजहद मौका ढूंढने की हो रही है.

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