यहां सातों फेरों में आगे चलती है दुल्हन, छत्तीसगढ़ की विवाह परंपरा में छिपी अनकही कहानी
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Raipur News: यहां विवाह में सात फेरे लेना अनिवार्य माना जाता है और खास बात यह है कि सभी सात फेरों में दुल्हन ही आगे चलती है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक विशिष्टता को दर्शाता है.
रायपुर. छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर अपनी विशेष विवाह परंपराओं और लोकाचार के कारण देशभर में अलग पहचान रखती है. यहां की शादियों में कई ऐसी रस्में निभाई जाती हैं, जो शास्त्रीय परंपराओं से अलग होते हुए भी वर्षों से जनमानस में गहरी आस्था और सम्मान के साथ निभाई जाती हैं. इन्हीं में से एक है सात फेरे लेने की परंपरा, जो छत्तीसगढ़ के समाज में विशेष महत्व रखती है. पंडित मनोज शुक्ला ने लोकल 18 से कहा कि धार्मिक ग्रंथों में सामान्यतः विवाह संस्कार में चार फेरे बताए गए हैं. इसमें तीन फेरों में कन्या आगे चलती है और चौथे फेरे में वर आगे होकर कन्या को अपने साथ लेकर चलता है. इस चौथे फेरे को कई स्थानों पर लाजा होम और शिलारोहण से भी जोड़ा गया है. शिलारोहण का भाव यह माना जाता है कि दाम्पत्य जीवन में आगे चलकर पहाड़ जैसी कठिनाइयां आ सकती हैं और जीवनसाथी के साथ मिलकर उन्हें पार करें. यही संदेश इस रस्म के माध्यम से दिया जाता है.
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की विवाह परंपरा अपनी लोक-आस्था और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के आधार पर विकसित हुई है. यहां की शादी में सात फेरे लेना अनिवार्य माना जाता है और खास बात यह है कि सभी सात फेरों में कन्या ही आगे चलती है, जो इस क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाता है. सात फेरों का तात्पर्य केवल एक विधि-विधान नहीं बल्कि पति-पत्नी के बीच सात जन्मों के शुभ बंधन की कामना है. इस दौरान अग्नि देवता, आवाहित देवी–देवताओं, पितृगणों और उपस्थित अतिथियों को साक्षी मानकर यह वचन लिया जाता है कि दोनों जीवनसंगी की तरह साथ निभाएंगे, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनेंगे और परिवार और समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाएंगे.
लोकाचार पर आधारित परंपरा
स्थानीय विद्वानों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में सात फेरों की यह परंपरा लोकाचार पर आधारित है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. जनमानस में यह मान्यता है कि सात फेरे जीवन के सात मूल स्तंभ धार्मिक आस्था, निष्ठा, समर्पण, प्रेम, सुरक्षा, संतोष और सात्विक जीवन का प्रतीक हैं, इसलिए यहां की शादियों में इन फेरों को अत्यंत पवित्र माना जाता है.
स्थानीय विद्वानों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में सात फेरों की यह परंपरा लोकाचार पर आधारित है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. जनमानस में यह मान्यता है कि सात फेरे जीवन के सात मूल स्तंभ धार्मिक आस्था, निष्ठा, समर्पण, प्रेम, सुरक्षा, संतोष और सात्विक जीवन का प्रतीक हैं, इसलिए यहां की शादियों में इन फेरों को अत्यंत पवित्र माना जाता है.
सात फेरों की परंपरा अटल
रात के समय लिया जाने वाला यह फेरा विवाह समारोह की गरिमा बढ़ाता है. आमतौर पर अग्नि कुंड की रोशनी, मंत्रोच्चार और वर-कन्या के धीमे कदमों के बीच यह रस्म पूरी होती है, जहां पूरा परिवार और समाज उनके नए जीवन की मंगलकामनाएं करता है. आज भी छत्तीसगढ़ में चाहें आधुनिकता कितनी भी बढ़ जाए, सात फेरों की यह परंपरा अटल है. यह केवल विवाह का संस्कार नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक जीवंत प्रतीक है, जिसे जनसामान्य पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाता आ रहा है.
रात के समय लिया जाने वाला यह फेरा विवाह समारोह की गरिमा बढ़ाता है. आमतौर पर अग्नि कुंड की रोशनी, मंत्रोच्चार और वर-कन्या के धीमे कदमों के बीच यह रस्म पूरी होती है, जहां पूरा परिवार और समाज उनके नए जीवन की मंगलकामनाएं करता है. आज भी छत्तीसगढ़ में चाहें आधुनिकता कितनी भी बढ़ जाए, सात फेरों की यह परंपरा अटल है. यह केवल विवाह का संस्कार नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक जीवंत प्रतीक है, जिसे जनसामान्य पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाता आ रहा है.
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Rahul Singh
राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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