Mahabharat Katha: महाभारत का सच्चा नायक, युधिष्ठिर या अर्जुन नहीं, जिनके वचन थे जीवन से भी ऊपर, स्वर्ग की अप्सरा थी दीवानी
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Mahabharat Katha: एक महान योद्धा ने सत्य और वचन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. उन्होंने राजगद्दी और विवाह का त्याग कर आजीवन ब्रह्मचर्य निभाया. स्वर्ग की अप्सरा भी उसे नहीं डिगा सकी. उन्होंने जो कहा, उसे निभाया चाहे उसका मूल्य अकेलापन हो, युद्ध हो या मृत्यु. शायद इसलिए उनका नाम युगों तक अमर रहेगा.

Mahabharat Story: महाभारत की कथा जितनी विराट है, उतनी ही गूढ़ भी. इस महागाथा में हर पात्र किसी विशेष गुण का प्रतीक है. जैसे- कृष्ण नीति और युक्ति के, अर्जुन वीरता के, युधिष्ठिर धर्म के. लेकिन अगर बात केवल सत्य की करें, तो महाभारत का सबसे बड़ा सच बोलने वाला कोई और नहीं, बल्कि भीष्म पितामह थे. उन्हें कभी झूठ बोलते नहीं पाया गया. वह न केवल वचनबद्ध थे, बल्कि अपने वचन के लिए जीवनभर अकेलेपन और कष्ट को भी गले लगाया. यही नहीं, जब स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी खुद उनके प्रेम में पागल हो गईं, तब भी वह अडिग रहे. भीष्म का जन्म नाम देवव्रत था. वे गंगा और शांतनु के पुत्र थे. बचपन से ही वे अद्भुत प्रतिभा के धनी थे. जब उनके पिता ने दूसरी शादी की इच्छा जाहिर की और सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि उसकी संतान ही गद्दी पर बैठेगी, तब देवव्रत ने अपने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया. उनके इस त्याग को देखकर देवताओं ने उन्हें भीष्म की उपाधि दी.
भीष्म का जीवन न केवल युद्ध कौशल का उदाहरण है, बल्कि अडिग सिद्धांतों और सत्य पर टिके रहने का प्रतीक भी है. वे तीन पीढ़ियों तक कुरु वंश के रक्षक बने रहे, लेकिन कभी अपनी मर्यादा से नहीं डिगे.
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जब उर्वशी भी हो गईं दीवानी
भीष्म के तेजस्वी रूप और अद्वितीय व्यक्तित्व से हर कोई प्रभावित था. जब वे युवा थे, तब स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तक उनके आकर्षण में बंध गईं. उर्वशी, जो अपने सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध थीं, यह मान बैठीं कि वह किसी को भी अपने रूप से वश में कर सकती हैं. उन्होंने धरती पर आकर भीष्म को रिझाने की कोशिश की. उन्होंने नृत्य, वेशभूषा, मोहक भाषा हर हथकंडा अपनाया. लेकिन भीष्म अडिग रहे.
भीष्म के तेजस्वी रूप और अद्वितीय व्यक्तित्व से हर कोई प्रभावित था. जब वे युवा थे, तब स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी तक उनके आकर्षण में बंध गईं. उर्वशी, जो अपने सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध थीं, यह मान बैठीं कि वह किसी को भी अपने रूप से वश में कर सकती हैं. उन्होंने धरती पर आकर भीष्म को रिझाने की कोशिश की. उन्होंने नृत्य, वेशभूषा, मोहक भाषा हर हथकंडा अपनाया. लेकिन भीष्म अडिग रहे.
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उर्वशी ने उन्हें प्रेम और विवाह का प्रस्ताव दिया, पर भीष्म ने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहा कि उनका जीवन एक व्रत है, जिसमें किसी स्त्री के लिए कोई स्थान नहीं. उर्वशी को समझ आ गया कि भीष्म को न झुकाया जा सकता है, न तोड़ा जा सकता है. उन्होंने जाते-जाते उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनका नाम युगों तक अमर रहेगा.
अंबा की अधूरी चाहत
भीष्म के जीवन में दूसरी महिला थीं अंबा. काशी नरेश की बेटी. भीष्म ने अंबा सहित तीन बहनों का हरण किया था ताकि उनका विवाह अपने भाइयों से कर सकें. लेकिन अंबा पहले से किसी और से प्रेम करती थीं. जब भीष्म को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने उन्हें लौटने दिया, लेकिन अंबा का प्रेमी उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ. निराश अंबा ने भीष्म से विवाह की मांग की. भीष्म ने फिर मना कर दिया अपने व्रत के कारण.अंबा ने प्रतिज्ञा ली कि वह भीष्म का अंत करेंगी. अगली जन्म में शिखंडी बनकर उन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध में अपनी प्रतिज्ञा पूरी की.
भीष्म के जीवन में दूसरी महिला थीं अंबा. काशी नरेश की बेटी. भीष्म ने अंबा सहित तीन बहनों का हरण किया था ताकि उनका विवाह अपने भाइयों से कर सकें. लेकिन अंबा पहले से किसी और से प्रेम करती थीं. जब भीष्म को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने उन्हें लौटने दिया, लेकिन अंबा का प्रेमी उन्हें अपनाने को तैयार नहीं हुआ. निराश अंबा ने भीष्म से विवाह की मांग की. भीष्म ने फिर मना कर दिया अपने व्रत के कारण.अंबा ने प्रतिज्ञा ली कि वह भीष्म का अंत करेंगी. अगली जन्म में शिखंडी बनकर उन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध में अपनी प्रतिज्ञा पूरी की.
सत्य के चार बड़े उदाहरण
1. ब्रह्मचर्य का संकल्प: गद्दी त्याग कर आजीवन अकेले रहना किसी राजकुमार के लिए आसान नहीं था.
2. कौरवों का साथ, लेकिन पांडवों को रास्ता बताया: युद्ध में उन्होंने अपने वचन के कारण कौरवों का साथ दिया, पर सत्य कहकर बताया कि शिखंडी ही उनका अंत कर सकता है.
3. द्रौपदी की लाज का सच: उन्होंने माना कि जो सभा में हुआ वह अधर्म था और युधिष्ठिर को ऐसा करने का अधिकार नहीं था.
4. मृत्यु शैय्या पर ज्ञान: जब जीवन छोड़ने का समय आया तब भी उन्होंने युधिष्ठिर को नीति, धर्म और जीवन की गहराई समझाई.
1. ब्रह्मचर्य का संकल्प: गद्दी त्याग कर आजीवन अकेले रहना किसी राजकुमार के लिए आसान नहीं था.
2. कौरवों का साथ, लेकिन पांडवों को रास्ता बताया: युद्ध में उन्होंने अपने वचन के कारण कौरवों का साथ दिया, पर सत्य कहकर बताया कि शिखंडी ही उनका अंत कर सकता है.
3. द्रौपदी की लाज का सच: उन्होंने माना कि जो सभा में हुआ वह अधर्म था और युधिष्ठिर को ऐसा करने का अधिकार नहीं था.
4. मृत्यु शैय्या पर ज्ञान: जब जीवन छोड़ने का समय आया तब भी उन्होंने युधिष्ठिर को नीति, धर्म और जीवन की गहराई समझाई.
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