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जां निसार पार्ट-1 : जो जीवन में सुलझे और गजलों में अनसुलझे ही रह गए

News18Hindi
Updated: February 4, 2020, 5:42 PM IST
जां निसार पार्ट-1 : जो जीवन में सुलझे और गजलों में अनसुलझे ही रह गए
20वीं सदी के शायरों में जांनिसार अख़्तर की शायरी का मयार काफी बड़ा है.

संगीत की दुनिया में जां निसार अख्तर साहब का हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं था. गजलों के शहंशाह, अल्फ़ाज़ों की डिक्नशरी कहे जाने वाले जां निसार ने फिल्म रजिया सुल्तान में ऐ दिले नादां गीत के छह-छह मिसरों के लिए कम से कम सौ अंतरे लिखे थे.

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  • Last Updated: February 4, 2020, 5:42 PM IST
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उनके बारे में बात करने में कई बार परेशानी होती है. एक शायर या कवि के तौर पर उनके बारे में बात करें या लेखक के तौर पर या कहानियों के बादशाह के रूप में उनका जिक्र करें. शब्द कई हैं, रूप कई हैं, लेकिन शख्स सिर्फ एक ही है, जिनका नाम है जां निसार अख्तर. जां निसार अख्तर की लेखनी की तारीफों के जितने कसीदे पढ़ें जाए वो कम होंगे. जां निसार साहब को अगर एक तरक्की पसंद स्तंभकार, रूमानी लहजे का शायर कहा जाए तो ये गलत नहीं होगा. 18 फरवरी को जां निसार अख्तर साहब का जन्मदिन होता है. उनके जन्मदिन से पहले हम आपके लिए उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे पहलुओं को लेकर आए हैं, जो अनछुए हैं.

शायरी में रोमांस
जां निसार अख्तर साहब की शायरी में एक खास एहसास है, उनके रोमांस का असल पहलू है. जां निसार अख्तर कई बार रेडियो के कार्यक्रम में कहते थे, 'मेरी शायरी में रोमांस का पहलू ओढ़ने, बिछौने की तरह है, जिसके बिना नींद का आना असंभव है.' अलीगढ़ विश्व विद्यालय के दोस्त अगर, जां निसार अख्तर के बारे में कहा करते थे कि उन्हें जानना है तो उनकी साथिन साफिया अख्तर को लिखे गए खत को पढ़ लो, तुम्हें उनके एहसास के बारे में पता चल जाए. जां निसार अख्तर की शख्सियत का अंदाजा तुम्हें उन्हीं खतों से लग जाएगा.

अल्फ़ाज़ का ख़ज़ाना

संगीत की दुनिया में जां निसार अख्तर साहब का हाथ पकड़ने वाला कोई नहीं था. गजलों के शहंशाह, अल्फ़ाज़ों की डिक्नशरी कहे जाने वाले जां निसार ने फिल्म रजिया सुल्तान में ऐ दिले नादां गीत के छह-छह मिसरों के लिए कम से कम सौ अंतरे लिखे थे. जां निसार को जानने वाले लोग अक्सर कहते थे कि वह कई मुखड़ें लिखकर लाते थे. फिल्म के सेट पर वो बड़ी ही सादगी से अपने मुखड़ों और अंतरों को सुनाते थे. साथी कलाकारों, प्रोड्यूसर से सादगी से गुफ्तगू करते थे. एक फिल्म के सेट पर जां निसार ने कहा था...
सौ चांद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगीउन से यही कह आएं कि अब हम न मिलेंगे
आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी
ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूंद लहू की
कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी
ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें
ऐ इश्क़ हमारी न तिरे सात बनेगी
ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी

दशकों पुरानी कई फिल्में जैसे सीआईडी का गाना 'आंखों ही आंखों में इशारा हो गया' या फिर 'प्रेम परबत' का वह गीत 'ये दिल और उनकी निगाहों के साये'. मशहूर फिल्म 'नूरी' का गीत 'आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा' के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला.
फिल्मों से ज़्यादा उनकी शायरी मशहूर हुई.
अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़कत उनको सुनाने के लिए हैं

या फिर
जब ज़ख्म लगे तो क़ातिल को दुआ दी जाए
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए.
हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फन क्या
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

बकौल निदा फ़ाज़ली जां निसार अख्तर ने शायरी को पारंपरिक रूमानी दायरे से बाहर निकालकर यथार्थ की खुरदरी धरती पर लाकर खड़ा कर दिया था.

जीवन को समझने का अंदाज
जां निसार गजलों और नज्मों में बेशक उलझे हुए रहते थे, उनके शेर जीवन में सुख-दुख के तालमेल को खूबसूरती से बयां करते हैं. पर असल जीवन में जां निसार बहुत ही सुलझे हुए इंसान माने जाते थे. एक कविता में जां निसार साहब ने लिखा था...

‘अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द भुला दें,
कुछ जख्‍़म तो सीने से लगाने के लिए हैं.’

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First published: February 4, 2020, 4:51 PM IST
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