'अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें', पेश हैं 'दर्दे-जुदाई' पर अशआर

'अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें', पेश हैं 'दर्दे-जुदाई' पर अशआर
आज दर्दे-जुदाई की कसक...

उर्दू शायरी (Urdu Shayari) में दर्दे-जुदाई और इससे लबरेज़ जज्‍़बात (Emotion) को बहुत ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में पेश किया गया है...

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शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या किसी और मसले पर क़लम उठाई गई हो. शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ बयां किया गया है. फिर जिक्र चाहे 'दर्दे-जुदाई' का हो या दर्द से बोझिल शाम का, यहां पूरी तवज्‍जो मिली है. कहीं नाउम्‍मीदी के आंसू हैं, तो कहीं वस्‍ल की आस में अल्‍फ़ाज़ पिरोए गए हैं. आज हम शायरों के इसी बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख्‍़ता' के साभार से लेकर हाजिर हुए हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'जुदाई' की हो और दर्द की कसक भी हो, तो आप भी इसका लुत्‍़फ़ उठाइए...

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
अहमद फ़राज़
किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ


अहमद फ़राज़

आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती
अकबर इलाहाबादी

वो आ रहे हैं वो आते हैं आ रहे होंगे
शब-ए-फ़िराक़ ये कह कर गुज़ार दी हम ने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
निदा फ़ाज़ली

नया इक रिश्ता पैदा क्यों करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यों करें हम
जौन एलिया

यूं लगे दोस्त तेरा मुझ से ख़फ़ा हो जाना
जिस तरह फूल से ख़ुशबू का जुदा हो जाना
क़तील शिफ़ाई

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तेरी ख़्वाहिशों में हूं
अहमद फ़राज़

मैं ने समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले
तू ने जा कर तो जुदाई मेरी क़िस्मत कर दी
अहमद नदीम क़ासमी

ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में
ख़ुदा किसी को किसी से मगर जुदा न करे
क़तील शिफ़ाई

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए
तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया
नासिर काज़मी

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझ को रात भर रक्खा
कभी तकिया इधर रक्खा कभी तकिया उधर रक्खा
अमीर मीनाई

जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो
ये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
नज़ीर अकबराबादी

महीने वस्ल के घड़ियों की सूरत उड़ते जाते हैं
मगर घड़ियां जुदाई की गुज़रती हैं महीनों में
अल्लामा इक़बाल

थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब
मोमिन ख़ां मोमिन

तुझ से क़िस्मत में मेरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
मिर्ज़ा ग़ालिब

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हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
शहरयार
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