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आपके भीतर सुलगती आग है उसकी कविताओं में, कहीं खो गया है क्रांति का कवि दुष्यंत
आपके भीतर सुलगती आग है उसकी कविताओं में, कहीं खो गया है क्रांति का कवि दुष्यंत कुमार
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Agency:Local18
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Dushyant Kumar tyagi death anniversary: महान गजलकार और क्रांति के कवि दुष्यंत कुमार की आज 49वीं पुण्यतिथि है. उन्होंने बेहद आसान भाषा में उर्दू में गजलें लिखी हैं जो लोगों की जुबां पर आसानी से चढ़ जाता है. दुष्यंत को बदलाव वाला रचनाकार माना जाता है.

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!!
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!!
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए!!
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए!!
इन रचनाओं में ऐसा आक्रोश है, जो किसी व्यवस्था विरोधी आंदोलन का प्राण हो सकता है. इस गज़ल में वो चिंगारी है, जो परिवर्तन की ज्वाला को धधका सकती है. इसके रचनाकार को दुनिया क्रांति का कवि, आंदोलनों का शायर या फिर जनता की आवाज कहती है लेकिन साहित्य की दुनिया में हम और आप इन्हें दुष्यंत कुमार के नाम से जानते हैं. वही दुष्यंत कुमार जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान अपनी सरकारी नौकरी की परवाह ना करते हुए लिखा था-
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है!!
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है!!
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो
इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है!!
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है!!
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है!!
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो
इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है!!
ऐसा नहीं है कि दुष्यंत ने सिर्फ किसी को भड़काने के लिए या हंगामा खड़ा करने के लिए कविताएं लिखी थीं. उनका असंतोष व्यवस्था के खिलाफ था, उनका गुस्सा एक बेहतर भविष्य के लिए था और वो इन सबका समाधान खोजते थे, तभी तो उन्होंने लिखा है-
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सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए!!
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए!!
दुष्यंत को बदलाव वाला रचनाकार माना जाता है. वो जीवन की सहजता में विश्वास करने वाले साहित्यकार हैं. अपनी भावनाओं को पूरी ईमानदारी के साथ पेश करना इनकी खासियत मानी जाती है.
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है!!
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है!!
दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में बिजनौर के एक गांव में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था और आज़ादी के वक्त उनकी उम्र सिर्फ 14 साल थी. उस वक्त दिल-ओ-दिमाग में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, जिनका जवाब जानने के लिए उनका किशोर मन हमेशा परेशान रहा करता था. आज़ादी के बाद के सपनों, मुश्किल हालात, आज़ादी से मोहभंग और लोकतंत्र के विरोधाभासों, विसंगतियों से पैदा हुई इन्हीं परेशानियों को दुष्यंत ने शब्दों में पिरोकर कविता का रूप दिया है. यहीं पर दुष्यंत सवाल करते हैं-
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा!!
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा!!
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा!!
कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा!!
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा!!
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा!!
दुष्यंत का संवेदनशील मन इन सवालों से बेचैन हो उठता था. अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत से लेकर अपने अचानक निधन के बीच उनकी कविता में कई तरह के सपने, कई तरह की सच्चाई, कई तरह के हालात और कई तरह के अन्तर्विरोध एक साथ मिलते हैं. महज 17 साल की उम्र में लिखा उनका एक गीत है-
चाहे कितना कसकर बांधों यह तूफान न बंदी होगा
उठा आ रहा दूर एशिया की घाटी से विप्लव का स्वर
सोने-चांदी की दीवारें हो जाएंगी खण्डहर-खण्डहर
करते हो उपहास हमारा किस बूते पर किस बल पर
चमकीले सिक्कों के बंधन में ईमान न बंदी होगा!!
उठा आ रहा दूर एशिया की घाटी से विप्लव का स्वर
सोने-चांदी की दीवारें हो जाएंगी खण्डहर-खण्डहर
करते हो उपहास हमारा किस बूते पर किस बल पर
चमकीले सिक्कों के बंधन में ईमान न बंदी होगा!!
हिंदी भाषा में लोकप्रिय गज़ल लिखना और उन गज़लों को लोकप्रिय बनाना, इसका श्रेय दुष्यंत कुमार को ही जाता है. हिंदी भाषा में गज़लसराई करते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य में एक नई बयार बहाई. दुष्यंत से पहले भी कई रचनाकारों ने गज़लें लिखीं लेकिन उसे उर्दू से अलग नहीं कर पाए. दुष्यंत कुमार ने गज़ल को हिंदी कविता की मुख्य धारा में शामिल करने की पुरजोर कोशिश की और इसमें पूरी तरह कामयाब भी रहे. मसलन उनकी एक गज़ल का ये अंश देखिए-
कहां तो तय था चिराग़ां हर एक घर के लिए
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए!!
यहां दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए!!
न हो कमीज़ तो पांओं से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए!!
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए!!
कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए!!
यहां दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए!!
न हो कमीज़ तो पांओं से पेट ढंक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए!!
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए!!
बताते हैं कि दुष्यंत कुमार ने अपनी ज्यादातर लोकप्रिय गज़लें अंतिम समय में ही लिखीं. इन गज़लों ने हिंदी साहित्य में दुष्यंत कुमार को एक अलग और मुकम्मल जगह दिलाई. हालांकि इन गज़लों को पहले से स्थापित व्यवस्था का प्रचंड विरोध भी झेलना पड़ा. दुष्यंत की ग़ज़लें मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक चेतना का बेमिसाल नमूना थीं. लोगों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ती थीं.
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं!!
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार!!
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं!!
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं!!
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार!!
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं!!
42 साल की उम्र में ही दुष्यंत कुमार ने सूर्य का स्वागत, आवाज़ों के घेरे, जलते हुए वन का वसंत ना के काव्य-संग्रह लिख डाले. छोटे-छोटे सवाल, आंगन में एक वृक्ष और दुहरी ज़िंदगी के तौर पर तीन उपन्यास भी दुष्यंत कुमार के हिस्से में आते हैं. और मसीहा मर गया उनका मशहूर नाटक है, इसके अलावा उन्होंने एक एकांकी ‘मन के कोण’ भी लिखी है. एक कंठ विषपायी नाम से उन्होंने एक काव्य-नाटिका भी लिखी है. लेकिन अपने एकमात्र गज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली जिसकी कई गज़लें आज भी लोगों के रोजमर्रा के बोल-चाल में इस्तेमाल होती हैं. जैसे –
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों!!
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारों!!
हिंदी गज़ल में दुष्यंत की वही जगह है जो उर्दू में ग़ालिब या किसी और का हो सकता है! हालांकि, दुष्यंत ने उर्दू गज़ल के पारंपरिक दरबारी मिजाज़ के इतर व्यवस्था और सत्ता विरोधी गज़लें लिखीं. दुष्यंत ने गज़ल की पारंपरिक विषयवस्तु, शब्दावली, संवेदना, लय, उन्मान, प्रतीक जैसे बंधे-बंधाए ढाचों को तोड़ते हुए जब ग़ज़लें लिखीं तो वो भी लोकप्रिय हुईं. उनकी गज़लों की लोकप्रियता के पीछे हिंदी और उर्दू का फ़र्क नहीं बल्कि गज़लों का धारदार विषय रहा.
यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा!!
ये रोशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगों,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों!!
ये ज़ुबां हमसे सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती!!
बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,
और नदियों के किनारें घर बने हैं!!
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा!!
ये रोशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगों,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगों!!
ये ज़ुबां हमसे सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती!!
बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं,
और नदियों के किनारें घर बने हैं!!
आलोचकों की माने तो दुष्यंत की कविताओं और गज़लों में अलग-अलग स्वर दिखते हैं. एक स्वर स्वीकरोक्ति का है जो शांत और मद्धम है. दूसरा स्वर अस्वीकरोक्ति का है जो व्यापक तो है और उसमें बेचैनी, नाराजगी, असुरक्षा का डर, असमानता और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध भी है. तीसरा स्वर है प्रेम का स्वर, जो कहीं-कहीं दिखता है. दुष्यंत के रोमांटिक गज़ल का एक उदाहरण देखिए-
चांदनी छत पर चल रही होगी,
अब अकेली टहल रही होगी!!
फिर मेरा जिक्र आ गया होगा
वो बरफ़ सी पिघल रही होगी!!
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं!!
तुमको निहारता हूं, सुबह से ऋतंबरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा!!
अब अकेली टहल रही होगी!!
फिर मेरा जिक्र आ गया होगा
वो बरफ़ सी पिघल रही होगी!!
तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं!!
तुमको निहारता हूं, सुबह से ऋतंबरा
अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा!!
बतौर कवि, शायर दुष्यंत की चिंताओं में अपने समय के अन्याय, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न, दोगलापन हैं तो दूसरी तरफ समाज और लोगों पर एक विश्वास भी है. इसी विश्वास को जिक्र दुष्यंत अपनी इस गज़ल में करते हैं-
एक चिनगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तों,
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है!!
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है!!
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है!!
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश सी छाती तो है!!
अपनी ग़ज़लों में दुष्यंत अपने दौर की उस राजनीति के चरित्र पर प्रहार करते हैं जिसमें छल है, धोखा है, वादा ख़िलाफ़ी है. तभी तो सीना ठोंककर दुष्यंत लिखते हैं-
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है!!
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है!!
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है!!
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है!!
हालांकि, यहीं पर दुष्यंत की गज़लों में अफसोस भी दिखता है, संवेदनाओं की टूटन और हताशा के अनुभव दिखते हैं. कभी अपने हालात पर, कभी अपनी बेचारगी पर. इसी मुद्रा में वो लिखते हैं-
यहां तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा!!
रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अंधेरे में सफर होता है!!
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा!!
रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है
यातनाओं के अंधेरे में सफर होता है!!
महज 42 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह जाने वाले दुष्यंत कुमार ने इस तरह की ग़ज़लों में जैसे अपना प्राण उड़ेल दिया है. अपनी और समाज की पीड़ा को एकाकर कर उन्हें सरेआम कर दिया है. उनके शब्दों की तपिश और विश्वसनीयता हमें अपनी ओर खींचती है. उनकी गज़लों-कविताओं का डंका बजता है, उनकी गज़लों में आग बहती है और उसकी गर्मी हम सभी को प्रभावित करती है. आज क्रांति के इसी कवि की पुण्यतिथि है और उन्हीं के लिखे शब्दों से उन्हें श्रद्धांजलि –
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए!!
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए!!
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प्रभात पाण्डेयएडिटर,News 18 उत्तर प्रदेश- उत्तराखंड
प्रभात पाण्डेय अभी News18 उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में एडिटर (न्यूज़) हैं. डीडी न्यूज़ से पत्रकारिता का करियर शुरू करने वाले प्रभात पाण्डेय पिछले करीब 17 साल से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं. यूनिवार्ता, न्यूज़ 2...और पढ़ें
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