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फैज़ को जितना पढ़ेंगे,सुनेंगे उतनी ही बढ़ती जाएगी उनसे मोहब्बत!

लाजिम है कि हम भी देखेंगे...फैज़ को जितना पढ़ेंगे,सुनेंगे उतनी ही बढ़ती जाएगी उनसे मोहब्बत!

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महहूर शायर फैज अहमद फैज की आज 40वीं बरसी है. अपनी रचनाओं से आज भी फैज़ उतने ही प्रासंगिक है, जिनते उस दौर में थे.वे दरअसल, फैज़ ऐसे शायर हैं कि उन्हें कोई जितनी बार पढ़ेगा या सुनेगा उनकी रचनाओं से उसकी मोहब्बत उतनी ही बढ़ती जाएगी.

फैज़ को जितना पढ़ेंगे,सुनेंगे उतनी ही बढ़ती जाएगी उनसे मोहब्बत!Zoom
फैज अहमद फैज की आज 40वीं बरसी हैं.
नई दिल्ली. फैज अहमद फैज उर्दू साहित्य का एक ऐसा नाम जिसे उर्दू से ज्यादा हिंदी या अन्य भाषाओं को जानने-समझने वाले लोगों ने पढ़ा और सुना है. फैज आज भी उतने ही पढ़े और सुने जाते हैं, जितना 70 और 80 के दशक में लोग उन्हें पढ़ते और सुनते थे बल्कि मैं ये कह सकता हूं कि उससे कहीं ज्यादा. फैज के बारे में कुछ भी कहना या लिखना मुझ जैसे साधारण लेखक की हस्ती के बाहर की बात है लेकिन इतना कह सकता हूं कि फैज भारतीय उपमहाद्वीप के उन शायरों में शुमार हैं जिन्हें दुनिया भर में सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है.
फैज को लेकर मेरे मन में हमेशा एक जिज्ञासा रही है कि आखिर उनके व्यक्तित्व में ऐसा क्या था जो उन्हें अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय शायर बनाने के साथ साथ इतना बड़ा बनाता है. हमेशा शोषण, दमन और ज़ुल्म-ओ-सितम के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाला फैज का संजीदा और तरक्कीपसंद व्यक्तित्व उन्हें शायरों की फेहरिस्त में सबसे ऊपरी पायदान पर खड़ा करता है. फैज आवाम के शायर कहे जाते हैं. फैज को जानने वाले कहते हैं कि वो ‘वॉयस ऑफ वॉयसलेस’ थे, यानी जिनकी आवाज कोई ना उठाए उनकी आवाज फैज अपने शब्दों से गढ़ते थे. तभी तो दमन के खिलाफ फैज लिखते हैं-
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है हाजिर भी
जो मंजर भी है नाजिर भी
उट्ठेगा अनल-हक का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खल्क़-ए-खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
बगावत और ज़ुल्म के खिलाफ जंग की बातें फैज की नज्मों में दिखती हैं. नास्तिक का तमगा लगवा चुके फैज को कभी वामपंथी कहा गया तो कभी उन्हें इस्लाम विरोधी तक करार दिया गया. लेकिन एक शायर के तौर पर हर तोहमत को कबूल करते हुए फैज ने वही लिखा जो उनके दिल ने कहा. बात दमन के खिलाफ बगावत की हो या सिस्टम से अदावत की, इश्क-मोहब्बत की हो या फिर इंसानियत की पैरोकारी की हो, हर मीटर पर फिट एक ही नाम फैज अहमद फैज सबसे पहले जेहन में कौंधता है. फैज ने जितना अपनी शायरी में जुल्म के खिलाफ लिखा उतना ही मोहब्बत-इश्क के लिए भी. कुछ लोग उन्हें मोहब्बत का शायर भी मानते हैं. इश्क का जिक्र करते हुए फैज लिखते हैं-
कब तक दिल की खैर मनाएं कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
गर बाजी इश्क की बाजी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाजी मात नहीं
इश्क की दास्तां को ही आगे बढ़ाते हुए फैज लिखते हैं-
वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे 
जो इश्क को काम समझते थे 
या काम से आशिकी करते थे 
हम जीते जी मसरूफ रहे 
कुछ इश्क किया कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा 
और इश्क से काम उलझता रहा 
फिर आखिर तंग आकर हम ने 
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
कहा जाता है कि फैज उस किस्म के शायर थे जो मोहब्बत को इंकलाबी बना दे और इंकलाब को मोहब्बत बना दें. फैज को पढ़कर आपको सच में यकीं होता है कि उनकी नज्में आवाम की बातों में धड़कती हैं, जो उन्होंने उस वक्त लिखा वो आज भी मौजूं हैं. फैज की एक-एक नज्म को कहा जाता है कि वो हीरा हैं, सदियों तक चलने वाली हैं. उनकी शायरी का दौर काफी लंबा है. वो सिर्फ इश्क-मोहब्बत और इंकलाब की शायरी के दयार में बंध के नहीं रहे. इसलिए तो एक जगह लिखते हैं –
और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा.
उनके यहां इश्क है, क्रांति भी है तो असहमतियां भी हैं. उनकी शायरी के कई मुकाम हैं. कभी वो बहुत रूमानी अंदाज में सामने आते हैं और उस रूप में भी उनका अंदाज अलहदा है-
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के 
वो जा रहा है कोई शब-ए-गम गुजार के
वीरां है मय-कदा खुम-ओ-सागर उदास है
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
कहते हैं कि फैज की चर्चा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक इकबाल बानो का जिक्र ना हो. 1977 में फैज ने पाकिस्तान में तख्तापलट के बाद तत्कालीन हुक्मरान जिया-उल-हक के संदर्भ में एक नज्म लिखी ‘हम देखेंगे’. ये नज़्म उनकी सबसे चर्चित और विवादित नज्म रही. 1984 में फैज के निधन के बाद 1985 में जब जिया-उल-हक ने मार्शल लॉ लगा दिया, तब लाहौर के एक स्टेडियम में इकबाल बानो ने 50000 दर्शकों के सामने फैज की इस नज्म को गाया, जिसके बाद तो ये जैसे इंकलाब का गीत बन गया.
आज से ठीक 40 साल पहले फैज जिस्मानी तौर पर इस दुनिया को भले ही अलविदा कह गए, लेकिन अपने कलाम की बदौलत आज भी फैज हमारे बीच हैं. फैज की ही लिखी एक नज्म से उन्हें नमन.
कफस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले!!

About the Author

प्रभात पाण्डेयएडिटर,News 18 उत्तर प्रदेश- उत्तराखंड
प्रभात पाण्डेय अभी News18 उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में एडिटर (न्यूज़) हैं. डीडी न्यूज़ से पत्रकारिता का करियर शुरू करने वाले प्रभात पाण्डेय पिछले करीब 17 साल से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं. यूनिवार्ता, न्यूज़ 2...और पढ़ें
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